भारती
भारतीय संवेदना को चयनात्मक बनाया साम्यवाद जनित-पोषित वर्गवादी विचारधारा ने (2)

प्रसंग- चयनात्मक संवेदना पर विवेचन के दूसरे भाग में पढ़ें भारतीय लोकमन पर औपनिवेशिक, साम्राज्यवादी और साम्यवादी-समाजवादी विचारधाराओं का प्रभाव।

हम भूलते गए कि हमारी संस्कृति में ‘सामाजिक संघर्ष’ नहीं अपितु संतुलित-संघनित संबंध एवं सद्भावजनित संगमन और सत्संकल्पित सामंजस्य, समन्वय, सौहार्द, समरसता का स्वर पूरी स्पष्टता में उपस्थित रहा है। परंतु औपनिवेशिक साम्राज्यवादी दासता और आयातित वैचारिकी ने हमारी मानसिकता को इस प्रकार दूषित-कलुषित कर दिया कि हमारी चेतना भ्रांत अवधारणाओं की चपेट में भ्रष्ट होती गई।

हमने अपनी परिस्थिति के लिए अत्यंत सहजता से दूसरे को उत्तरदायी ठहराने के उपक्रम का अंधानुकरण ही किया। समाजवादी समाज का सपना बुनने-परोसने वाले ‘साम्यवाद’ में प्रस्तुत विभाजनकारी तत्व पर हमारा ध्यान ही नहीं गया कि इसने देखते-न देखते पहले दो वर्ग (समुदाय) और फिर नानाविध विमर्शों की आधारशिला रख कर हमें खंड-खंड कर दिया और एक-दूसरे का शत्रु बना दिया। हमारी संवेदना के ह्रास के संबंध में ऐसे अनगिनत तथ्य नित्य-चिंतन से उपजते हैं। 

ध्यातव्य है कि सामाजिक गतिरोध एवं विखंडन उत्पन्न करने वाला और कदापि साकार न होने वाला निस्सार साम्यवाद-समाजवाद ‘सामाजिक दर्शन’ के रूप में परोसा गया। नहीं भूलना चाहिए कि समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया ने “साम्यवाद तो पृथकतावाद है”, कहा था। (भारत विभाजन के गुनहगार, लोकभारती प्रकाशन, 2007 पृ 9)

औपनिवेशक साम्राज्यवादियों से अंतरित सत्ता हस्तगत करने वाले जवाहरलाल नेहरू ने भी कहा था– “मार्क्सवादी अर्थशास्त्र अनेक तरह से पुराना पड़ गया है और निश्‍चित रूप से उसने ‘हिंसक मार्ग के साथ’ अपना रिश्ता जोड़ लिया है। वह समझा–बुझाकर अथवा शांतिप्रिय लोकतंत्री दबाव डाल कर परिवर्तन लाना नहीं चाहता, बल्कि बल प्रयोग द्वारा और वस्तुतः विनाश और उन्मूलन के द्वारा परिवर्तन लाना चाहता है।… मैं इस तरीके को सर्वथा साम्राज्यवादी, अबुद्धिसंगत और असभ्यतापूर्ण मानता हूँ, चाहे उसका व्यवहार धार्मिक, आर्थिक सिद्धांत अथवा अन्य किसी भी क्षेत्र में क्यों न किया जाए!” (श्रीमन्नारायण, भारतीय संयोजन में समाजवाद, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली 1966, पृ 16) उल्लेखनीय है कि उक्त पुस्तक की भूमिका नेहरू ने लिखी है।

ऐसे विचारों के बावजूद साम्यवाद (समाजवाद) की निस्सारता पर प्रश्‍न उठाना जोखिम भरा काम था और जिन्होंने यह जोखिम उठाई उन्हें प्रतिगामी, रूढ़िवादी, अप्रगतिशील, अप्रामाणिक, अप्रमाणित और भारत व्याकुल माना-कहा गया। इसके विपरीत सामाजिक गतिरोध एवं भारतीय जनमानस को छिन्न-भिन्न करने वाले को आधुनिक, प्रगतिशील, अन्वेषक, सुधारक, मुक्तिवादी, वामपंथी, बुद्धिजीवी मानने-कहने का प्रचलन आरंभ हो गया।

राम मनोहर लोहिया ने ऐसी विभाजनकारी (पृथकतावादी) विचारधारा एवं उसके संवाहकों के संबंध में विस्तार से लिखा है– “संभवतः भारतीय कम्युनिस्टों ने विभाजन का समर्थन इस आशा से किया था कि नवजात राज्य पाकिस्तान पर उनका प्रभाव रहेगा, भारतीय मुसलमानों में असर रहेगा और हिंदू मन की दुर्बलता के कारण उनसे मन फटने का कोई भारी खतरा भी न रहेगा, लेकिन उनकी योजना गलत सिद्ध हुई, सिवा थोड़े क्षेत्र को छोड़कर, जहाँ कि उन्होंने भारतीय मुसलमानों में कुछ छिटपुट प्रभाव–स्थल बनाए और हिंदुओं में अपने लिए क्रोध न उभरने दिया। इस तरह उन्होंने अपने साथ अधिक धूर्तता नहीं की और साथ ही देश के लिए भी कोई लाभदायक काम नहीं किया।” (वही, पृ 9)

इस सत्य के होते हुए भी भारतीय शिक्षा-व्यवस्था में ऐसी विचारधारा को फलने-फूलने दिया गया। लोहिया के उक्त कथन के आलोक में इस आयातित वैचारिकी के घातक पक्षों को जन-जन तक पहुँचाने की आवश्यकता है। स्पष्ट है कि साम्यवाद जब सत्ता हस्तगत करता है तो वह अंततः साम्राज्यवाद में परिणत हो जाता है। इसका उत्तम एवं ज्वलंत उदाहरण विस्तारवादी उच्चाकांक्षाओं से भरा हमारा पड़ोसी राष्ट्र चीन है। 

अस्तु, येनकेनप्रकारेण इस साम्यवाद-समाजवाद जनित-पोषित वर्गवादी विचारधारा ने भारतीय लोकमन एवं संवेदना को चयनात्मक (सिलेक्टिव) बना दिया है। मानो-न मानो, इसका सर्वाधिक गंभीर आघात भारतीय मानवतावाद पर हुआ है।

ब्रिटिश और उनके उत्तराधिकारियों ने भारत की अखंडता को ध्वस्त करने के ऐसे अनगिनत उपाय-तंत्र-मंत्र न केवल खोजे अपितु उनका प्रचार-प्रसार एवं सतत विस्तार किया। दोहराने की आवश्यकता नहीं कि इसी विस्तार को आज हम ‘अस्मिता विमर्श’ के नाम से जानते हैं परंतु उनकी आड़ में रचे गए विभाजनकारी षड्यंत्र को पुनः न समझने की भूल हम कर ही रहे हैं। धर्मपाल ने उचित ही कहा है –

“बाहरी विचार और व्यवहार को किस रूप में लेना है, उसका सम्पूर्ण समाज पर क्या–क्या प्रभाव पड़ेगा, उस प्रभाव को कैसे संतुलित रखना तथा अर्थवान बनाना है, इस पर कोई शास्त्र-चिंतन, कोई सृजनात्मक प्रयास नहीं दिखते। जो ले रहा है, उत्साह से ले रहा है। वृहत् समाज तिरस्कार से यह देख रहा है। विखंडन की यह स्थिति स्पष्ट दिखती है।” (वही, पृ. 17) आयातित वैचारिकी का यह ऐसा अनुसरण और निर्वाह है, “मानो वह (अनुसरणकर्ता) बौद्धिक दारिद्र्य से ग्रस्त हो, उसके पास न अपनी प्रभा हो, न प्रतिभा, न प्रतिमान।” (वही, पृ 17)

आज समाज में विभिन्न अंगों के बीच ‘विमर्श’ के नाम पर जो विवाद, कलह और तांडव दिखाई देता है, उस पर विचार-चिंतन करते हुए स्वामी विवेकानंद द्वारा ‘जाति, संस्कृति और समाजवाद’ पर की हुई गंभीर विवेचना का स्मरण हो आता है– “वर्तमान जाति-भेद भारतवर्ष की उन्नति में बाधक है। वह संकीर्ण बनाता है, बाधा पहुँचाता है और अलग करता है। विचारों की प्रगति होने पर वह नष्ट हो जाएगा।” (पृ 66)

परंतु प्रगति की बात करते-करते विचार इतने उग्र होते गए कि समाज में अलग ही क़िस्म का विभाजन हुआ है। समाज विज्ञान एवं मानविकी शाखाओं में इस विभाजनकारी विचार को वैचारिक प्रगतिशीलता माना और प्रचारित किया गया। समय के अंतराल में यह विभाजन इतना उग्र होता गया कि उसने सशस्त्र और हिंसक रूप धारण कर लिया।

उपनिवेशवाद-जनित एवं पुरोहितवाद-पोषित जाति-भेद की प्रवंचना झेलने वालों के हृदय-बुद्धि में वर्गवादी-जातिवादी सोच का विषैला बीज इस प्रकार बोया और विकसित किया गया कि वे इस विष के भेद और प्रभाव को जाने बिना ही राजनीतिक हथकंडों का शिकार होते गए। स्वामी विवेकानंद ने ऐसी ही स्थिति के लिए सचेत किया था–

“रक्षा का एक ही उपाय, अपनी स्थिति सुधारने का एकमात्र मार्ग जो तुम निम्न जातिवालों को मैं बताता हूँ, वह है संस्कृत का अध्ययन। उच्च जातियों के साथ यह लड़ना-भिड़ना, उनके विरुद्ध लेख लिखना और कुड़कुड़ाना सब व्यर्थ है। उसमें कोई भलाई नहीं, उससे तो लड़ाई-झगड़े ही पैदा होते हैं; और इस राष्ट्र में, जहाँ दुर्भाग्यवश पहले से ही फूट फैली हुई है, और भी अधिक फूट फैल जाएगी। जातियों को समतल करने का एक ही मार्ग है– उस संस्कृति को, उस शिक्षा को अपनाना, जो उच्चतर जातियों का बल है।” (वही, पृ 69)

परंतु जातिवाद का विरोध करते-करते जातिवादिता का नया रूप एवं विमर्श विकसित हुआ है। इस विमर्श में संस्कार, संस्कृत, संस्कृति, भारत और भारतीय ज्ञान-परंपरा का घनघोर तिरस्कार देखने को मिलता है। विगत 60-70 वर्षों में इसी तिरस्कार के परिणामस्वरूप ‘पश्‍चिमी चिंतकों का अनुगत समाज’ रचा-गढ़ा गया। इसकी परिणति भारतीय शिक्षा में अंग्रेज़ीकरण के रूप में हुई। यहाँ तक कि भारतीय इतिहास भी उसी औपनिवेशिक प्रभाव में लिखा गया। इस उपक्रम में ‘स्मृतिभ्रंशता’ एवं ‘सृजनात्मक बुद्धि के अभाव’ की भी उतनी ही महती भूमिका है।

इसी विकासक्रम में आज एक-दूसरे के विरुद्ध ‘स्पीच’ और ‘पिच’ करने का उपक्रम इन अस्मिता विमर्शों के माध्यम से तीव्रतर हो गया है। ऐसी मनोदशा के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि भारत विभाजन पर विभाजन, विभाजन दर विभाजन झेलने के लिए अभिशप्त हो चुका है। इन विभाजनकारी विचारधाराओं के कारण एक राष्ट्र के रूप में राष्ट्रैक्य की दृष्टि से हममें स्वरैक्य नहीं बन पाता है। तिस पर राजनीतिक दलों का विभाजनकारी एजेंडा अग्नि में घी का काम करने से नहीं चूकता।

हमने हमारी विभिन्नता को सृजन का आधार बनाने के स्थान पर उसे विखंडन एवं विध्वंस वृत्ति में परिवर्तित कर दिया है। विखंडनवादी भलीभाँति परिचित थे कि एक धारी में बंधी लाठियों को तोड़ने हो तो उन्हें अनिवार्यतः अलग-थलग करना होगा और उस उपक्रम में उन्हें समुचित सफलता भी मिली।

ऐसी स्थिति में सभी नूतन विमर्शकारों को स्वामी विवेकानंद के वैचारिक पक्ष का अध्ययन करना चाहिए। पुरोहितवाद एवं ब्रिटिश औपनिवेशवाद और स्वातंत्र्योत्तर सत्ता हस्तांतरण से उपजे विभेद के कारण राष्ट्र को हिंसा, विध्वंस, विखंडन एवं पतन के गर्त में धकेलना कितना उचित है? सहज ही देखा-समझा जा सकता है कि वर्तमान नूतन विमर्शों के भेद-अभेदों से समाज में विध्वंस का स्थान अत्यंत गहरा होता जा रहा है।

वास्तव में हमारी संस्कृति और ज्ञान-परंपरा में सृजन के विविध आयाम प्रस्तुत हैं। हमारी संस्कृति, ज्ञान-परंपरा पाश्‍चात्य राष्ट्रों की भाँति खंडित-विखंडित और भ्रामक नहीं है। पुनः, इस संबंध में विवेकानंद के विचार उल्लेखनीय हैं–

“वह संस्कृति ही है– न केवल ज्ञान की राशि– जो आघात का प्रतिरोध कर सकती है।… आधुनिक काल में ज्ञान राशि से संपन्न राष्ट्रों के विषय में हम सभी जानते हैं; पर उनकी दशा क्या है? वे तो व्याघ्र के समान हैं, बर्बरों के सदृश हैं। क्योंकि उनमें संस्कृति नहीं है। ज्ञान केवल ऊपरी चर्म की सतह तक ही सीमित है और उतनी ही उथली सभ्यता भी है, जिसमें थोड़ा खरोंच लगते ही पुरानी राक्षसी वृत्ति प्रकट हो जाती है।” (वही, पृ 69)

इसलिए विवेकानंद ने उन्हें ज्ञान एवं शिक्षा देने के साथ-साथ ‘संस्कृति’ देने का आग्रह किया था। (विस्तार के लिए देखिए, वही, पृ 69) धर्मपाल ने भी कहा है –

“हमें अपनी पराजय के त्रास से अब मुक्त होना होगा। पराजय के बार–बार स्मरण से मन की हीनता बढ़ती है और बुद्धि तथा चित्त स्वस्थ नहीं रहते। इस हीनता के प्रभाव से भरपूर पराजय का स्मरण करते रहने के कारण ही विगत 150-200 वर्षों में हम में इतनी अधिक स्मृतिभ्रंशता आ गई कि विदेशियों द्वारा हमारे बारे में जो अवधारणाएँ और गाथाएँ गढ़ी गईं, उन्हें ही हमने अपना ऐतिहासिक यथार्थ मान लिया।…

विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कृषि, जीवन-स्तर, समाज-व्यवस्था, मानवीय संबंध एवं मानवीय सद्गुणों में दूसरों से कम न होने पर भी, हार के बाद हमारे नवप्रबुद्ध वर्ग को अपने समाज के परम्परागत जीवन में सभी प्रकार की कमियाँ ही कमियाँ दिखने लगीं। स्मृतिभ्रंशता का यह दारुण रूप है।” (भारत का स्वधर्म, वाग्देवी प्रकाशन, 2019, पृ 75) 

इस ‘स्मृतिभ्रंशता’ को हम प्रकारांतर से अनेकानेक संदर्भ एवं प्रसंगों में देख-समझ सकते हैं। धर्मपाल ने इसीलिए आग्रह किया है– “एक स्वाधीन समाज के रूप में हमें अब भविष्य की अपनी सम्भाव्यताओं का विचार करना होगा। इसके लिए अपने इतिहास, समाज और परम्परा का गहरा बोध एवं प्रशान्त विश्लेषण आवश्यक है।” (वही, पृ 75)

यद्यपि धर्मपाल के उपरोक्त वक्तव्य पराधीनता और पराजय की हीन भावना से उपजी स्मृतिभ्रंशता के संबंध में हैं परंतु हमें यह जानना-समझना होगा कि उसी स्मृतिभ्रंशता के कारण नवप्रबुद्ध वर्ग ने अपने ‘सुविधाजनक’ पाठ (विमर्श) रच-गढ़ लिए हैं। ध्यान दें कि उन पाठों से प्रमाद, विरोध-भाव, समाजिक भेद-अभेद, गतिरोध और सृजन-विमुखता का उद्भव और विकास हुआ है। उपरोक्त विवेचन में प्रकारांतर से इसका परिपाक प्रस्तुत हुआ है। ‘इतिहास, समाज और परंपरा का गहरा बोध एवं प्रशान्त विश्लेषण’ से ही हम भारत का वर्तमान और भविष्य सुदृढ़ एवं संपन्न बना सकते हैं। 

कहना न होगा कि वर्तमान विमर्शों से समाज में एक विचित्र प्रकार का विघटन घटित हो रहा है। कुछ हद तक स्मृतिभ्रंशता का दोष है तो बहुत हद तक साम्यवादी बौद्धिक चातुर्य का! इस चातुर्य ने स्थिति का सहारा लेकर जो रचा-गढ़ा उससे भारतीय समाज में पराजय से उत्पन्न वैचारिक दुर्बलता ने आक्रामकता को जन्म दिया।

वर्तमान विमर्शों की नींव में वैचारिक संवाद के स्थान पर स्मृतिभ्रंशता और उससे उपजा वैर-भाव है। इन विमर्शों से भारतीय सांस्कृतिक-केंद्र और विद्या-केंद्रों को ध्वस्त करने का कार्य पूरी शिद्दत के साथ जारी है। वैचारिक संवाद, सृजनधर्मिता आधारित परंपरा में जो संसक्ति, संश्रय, संदर्शन, समानुभूति, सहजानुभूति, सहानुसरण, साझेदारी के साथ-साथ सर्वोदय, सर्वास्तिवादिता और सर्वपंथ-मान्यता की भावना थी, उसे कुछ-कुछ स्मृतिभ्रंशता के कारण तो कुछ-कुछ सुनियोजित रूप में ध्वस्त करने का उपक्रम हुआ है और हो रहा है। यह औपनिवेशिक सत्ता में यूरोपीय हितों की दृष्टि से बोये-रचे गए षड्यंत्र का ही प्रतिफल प्रतीत होता है। धर्मपाल ने उचित ही लिखा है–

“रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी सृजनात्मक प्रतिभाओं ने एक विचित्र आत्मग्लानि, आत्मदैन्य और उसी के साथ यूरोपीय लक्ष्यों की पूर्ति में ही भारत का आत्मगौरव देखने का बौद्धिक परिवेश रचा, उसमें ही जवाहरलाल नेहरू जैसे पश्‍चिमीकृत व्यक्तित्वों का उभरना और प्रतिष्ठित होना संभव हुआ। चेतना-विकासवाद की अपनी विशिष्ट अवधारणाओं के फलस्वरूप जवाहरलाल नेहरू जैसे लोग पश्‍चिम के चिंतकों में सर्वाधिक विकसित चेतना देखते थे और पश्चिम के चिंतकों के अनुगत समाज को सर्वाधिक विकसित समाज।… सृजनात्मक बुद्धि के इस अभाव का परिणाम था कि भारतीय इतिहास, भारतीय शास्त्र, धर्मग्रंथ एवं वेदों तक में वे सब बातें ढूंढी-बताई जाने लगीं, जो हमें अंग्रेजों के अनुगत बनने के योग्य सिद्ध करे। (वही, पृ 24) 

ऐसी ही धारणाओं के आधार पर हम अपने बौद्धिक जगत और भाव-भूमि से टूटते गए और भौतिक जगत की अर्थशास्त्रीय अवधारणाओं के सहारे विकासवादी चेतना से लैस होकर अपनी भावधारा और तत्व-चिंतन की परंपरा से उखड़ते-बिखरते गए। ऐसी स्थिति में धर्मपाल का एक और कथन सहज ही स्मरण आता है–

“भारत को अब अपनी पुनर्योजना, सांस्कृतिक राजनीति को आगे रखकर, करनी होगी। इस पुनर्योजना में अर्थशास्त्र नियामक सिद्धांत कदापि नहीं हो सकता। प्रत्येक सभ्यता में विविध अवधारणाओं की एक क्रम–व्यवस्था रहती है। किंतु अर्थशास्त्र किसी भी सभ्यता में प्रमुख नहीं होता। अपनी सभ्यता से कटे हुए और यूरोपीय सभ्यता के मर्म से अनजान तथा उसके प्रति दास्य-भाव से भरे हुए भारतीय शासक वर्ग को ही अर्थशास्त्र प्रमुख दीखता है। यूरोपीय शासक वर्ग तो हमें अपनी सभ्यता का मानवीय संसाधन मानकर हमारे लिए अर्थशास्त्र को प्रमुख मानता है। अब हमें अवधारणाओं के प्रधान-गौण-क्रम का यह उलट गया बोध फिर से व्यवस्थित करना होगा, उसे सही क्रम में समझना और रखना होगा।” (वही, पृ 24) 

धर्मपाल ने कार्ल मार्क्स (अर्थशास्त्रीय दृष्टिकोण) को ‘यूरोपीय सभ्यता का सबल प्रतिनिधि’ मानते हुए अविवादित तर्क प्रस्तुत किया है – “जो लोग अपेक्षाकृत गरीब व मध्यम वर्ग के होते थे और जिनमें जोखिम उठाने का साहस व धन की अभिलाषा होती थी उन्हीं यूरोपीयों को शेष विश्‍व की खोज करने तथा वहाँ आधिपत्य जमाकर यूरोपीय सभ्यता का प्रकाश फैलाने भेजा गया।… कार्ल मार्क्स ने भी यही माना था कि एशिया–अफ्रीका के देशों का उद्धार तो यूरोप का ‘वर्किंग क्लास’ – औद्योगिक श्रमिक वर्ग करेगा। कार्ल मार्क्स यूरोपीय सभ्यता के सबल प्रतिनिधि थे।” (वही, पृ. 27)

हमारे यहाँ नव-प्रबुद्ध वर्ग (?) ने इन्हीं विचारों की नुमाइंदगी कर अपनी स्थिति को बेहतर बनाने का उपक्रम किया है। धन संपन्नता-समृद्धता की अभिलाषा से यूरोपीय वैचारिकी के एजेंट बन कर समाजवाद का नारा बुलंद करने वाले ऐसे प्रबुद्धों की संतानों को आज विदेशों के विश्‍वविद्यालयों में शिक्षारत देखा जा सकता है और वैचारिक (बौद्धिक) साम्राज्यवाद के सहारे समृद्धि का मार्ग टटोलता भारत का भटका हुआ युवा कार्ल मार्क्स के नाम की माला जपते हुए वैचारिक (बौद्धिक) साम्राज्यवाद का ही शिकार हुआ (हो रहा) है। ऐसे निस्सार दर्शन का प्रकोप झेलते हुए वह व्यवस्था बदलने के लिए सशस्त्र क्रांति की धारा का अनुयायी बनकर देश के ही जवानों को मौत के घाट उतार देता है।

भारतीय लोकमन की संवेदनाओं के ह्रास और चयनात्मकता में ऐसे अनेकानेक तत्वों की साझेदारी है। क्षयशील परंपराओं का अनुगमन कर हमने अपनी मानवतावादी दृष्टि और संवेदना का लगभग अंत कर ही दिया है। कहना न होगा कि हम विभाजन दर विभाजन झेलते गये और हमारी संवेदनाएँ चयनात्मक होती गयीं। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ अर्थात् सभी प्राणियों को स्वयं अपनी आत्मा के सदृश देखो– इस अनुरागात्मक शिक्षा की उपस्थिति के बावजूद उसका अनुसरण नहीं हो सका। चूँकि ऐसा न हो सका, हमारी संवेदनाएँ विभक्त होती गईं।

यह निर्विवाद सत्य है कि भारतीय जनमानस वर्षानुवर्षों से परतंत्रता का स्वाद चखता रहा और औपनिवेशिक दासत्व से मुक्ति मिली तो दीर्घावधि तक तो उसे समझ ही नहीं आया कि इस स्वतंत्रता से क्या होगा अथवा करना क्या है? अतः मुक्ति के जोश में उसकी चित्तवृत्ति उत्सवानुरागी बनी रही। उत्सवों के ‘हैंगओवर’ से संभलने से पहले ही नव-औपनिवेशिक दासत्व का अदृश्य शिकंजा उनपर कसता गया।

एक ओर पराधीनता से उपजा बेफ़िक्रापन (गुलामी का आनंद) और दूसरी ओर अतिरंजित उत्तेजना भर देने वाली आयातित वैचारिकी से उत्पन्न अविचारित जोश ने उसे न घर का रहने दिया, न घाट का। वास्तव में यह विचारहीनता का संकट था। शेष सारी क़सर बाज़ार और उसकी चकाचौंध ने पूरी कर दी। बाज़ारवादी (उपभोक्तावादी?) चकाचौंध को ही सबने मुक्तिमार्ग का सेतु माना।

फिर सूचना-संचार क्रांति हुई तो उसे एक नया अविष्कार मिला– स्मार्ट मोबाइल। वह आश्‍चर्य से इस प्रकार चकित हो गया कि उसके साथ आने वाली सामाजिक विघटन की प्रक्रिया को वह न देख पाया, न संभल पाया। इसी क्रांति की बदौलत मीडिया के नए रूप और माध्यम प्रस्तुत हुए, जिसमें वह पुनः ‘गुड़ पर मक्खी’ की तरह भिनभिनाता रहा और ‘गुड़ में मक्खी’ की तरह फँसकर रह गया।

हमने इस माध्यम को ‘सोशल मीडिया’ कहा परंतु सूक्ष्म छानबीन करने से ज्ञात होगा कि ये माध्यम ‘सोशल’ कम और ‘एन्टी–सोशल’ अधिक हैं। इन माध्यमों से लोगों में उत्पन्न खाइयाँ-दूरियाँ विस्तृत होती गईं। इस माध्यम ने भारत विघटन की प्रक्रिया को अति-तीव्र बना दिया।

आप देखेंगे कि हर व्यक्ति चयनात्मक और सुविशिष्ट आख्यानात्मक समाचारों को अपना-अपना सच मानता है। इससे सामाजिक विघटन की प्रक्रिया को अधिक गति मिली है। पहले ‘नेता’ और बाद में ‘बड़ा नेता’ बनने के मोह में नेताओं ने इस मीडिया का इस प्रकार प्रयोग किया है कि लोगों को प्रत्येक बात अपनी तरह से समझाई जाती है।

‘प्रगतिशीलता’ के नाम पर अनेकानेक समूह बने और विभाजनकारी तत्वों ने चयनात्मक एवं सुविशिष्ट सामग्री का प्रचार-प्रसार कर लोगों का मानसिक अनुकूलन करने का उपक्रम पूरी सक्रियता से आरंभ किया। वर्तमान समस्या यह है कि हर किसी के पास चयनात्मक एवं सुविशिष्ट समाचार पहुँचते हैं। समाचार की सत्यता का यह विकट संकट है।

इसी ‘सोशल मीडिया’ के विभिन्न पटलों पर विघटनकारी विचार प्रवाहक युवक इतने आक्रमणकारी हो चुके हैं कि सोशल मीडिया के किसी एक मंच पर एकसाथ रहना संभव नहीं हो पा रहा है। भारत की विभिन्नता को इस अस्मिता विमर्शकारों ने इस प्रकार ध्वस्त कर दिया है कि बिखरे हुए सभी टुकड़ों को एकत्रित कर पुनः जोड़ना असंभव प्रतीत होता है। ब्रिटिशों का बोया बीज वामपंथियों ने अंकुरित कर पाला-पोसा और आज वह वटवृक्ष की भाँति विशालकाय हो गया है। भारत के इतने टुकड़े हो चुके हैं कि हमें विश्‍वास ही नहीं होता है कि हम इस खंड-खंडित ‘अखंड भारत’ की संतानें हैं।

आयातित एवं औपनिवेशिक वैचारिकी द्वारा जनमानस में घोला हुआ विष इतना प्रभावकारी है कि वह हमारी ‘अखंडनीय एकता’ (‘एकोऽहं बहुस्याम’) को लुंज-पुंज करने में सफल हुआ है। अनुसूचित जातियों को सवर्णों के विरुद्ध (दलित विमर्श), आदिवासियों को सरकारी व्यवस्था-शासन-प्रशासन के विरुद्ध (आदिवासी विमर्श), नारी को पुरुष के विरुद्ध (स्री विमर्श), तृतीय लिंगियों को परिवार एवं समाज के विरुद्ध (किन्नर विमर्श), बच्चों को माता-पिता के विरुद्ध (बाल विमर्श), वृद्ध माता-पिता को अपने बच्चों के विरुद्ध (वृद्ध विमर्श) खड़ा कर दिया है।

हिंदू-मुस्लिम से आरंभ कर जातियों के सहअस्तित्व को छिन्न-भिन्न करने तक ही विभाजन नहीं रुका अपितु अल्पसंख्यक के नाम पर पहले सिखों को (1984 एवं 1993), फिर जैनों को हिंदुओं से विभाजित कर दिया गया (2014)। इसी कड़ी में स्मरणीय है– राजनीति प्रेरित-पोषित आर्य-द्रविड़, भाषाई और प्रांतीय भेद-अभेद वैर-वैमनस्य विखंडन की इसी धारा के अभूतपूर्व अंग हैं।

राजनीतिक लाभ की आड़ में अखंड लोकमन को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से खंडित-मंडित करने का सचेष्ट प्रयास हुआ (हो रहा) है। इस मनोवैज्ञानिक खेल के आधार पर सबको छिन्न-भिन्न कर दिया गया है और अस्मिताओं को अलग-थलग उभार दिया गया है। मुसलमानों में उपस्थित भेद-अभेदों को छोड़ भी दिया जाए तो भारत की स्थिति इतनी विचित्र बना दी गई है कि वह अनेकानेक स्तरों पर खंड-खंड हो चुका है। हमारी ‘एकता से निःसृत होने वाली अनेकता’ छिन्न-छिन्न कर दी गई है।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं। इस शृंखला का पहला भाग यहाँ पढ़ें