भारती
भले ही सबरीमाला का मामला बड़ी पीठ को सौंपा गया है लेकिन लंबी लड़ाई शेष है

पिछले वर्ष सबरीमाला पर जो निर्णय सुनाया गया था, उसे सात जजों की बड़ी बेंच को सौंपने का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सही है। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वामी अयप्पा के भक्तों के लिए 4:1 के अनुपात से उनके विरुद्ध जाने वाले पिछले निर्णय की समीक्षा की लड़ाई में छोटी-सी जीत हुई है लेकिन बड़ा युद्ध अभी बाकी है।

अपने कार्यकाल की समाप्ति की ओर बढ़ते हुए मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने 3:2 के छोटे अंतर से इस मामले को बड़ी पीठ को भेजने का निर्णय लिया है। न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश आरएफ नरीमन ऐसा नहीं चाहते थे।

ऐसा इसलिए हुआ होगा क्योंकि पीठ को लगा कि धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश का विषय सिर्फ हिंदुओं के सबरीमाला से नहीं जुड़ा है बल्कि मस्जिदों में मुस्लिम महिलाओं और पारसियों के मंदिरों में उनकी स्त्रियों के प्रवेश पर भी विचार करना चाहिए।

भारत में कुछ शिया समुदायों द्वारा लड़कियों के गुप्तांग को विकृत (एफजीएम) करने के एक अलग मामले को भी इसके अधीन लिया जा सकता है। यह सब इसपर निर्भर करता है कि अगले मुख्य न्यायाधीश शरद बोबडे नई पीठ के गठन के बाद इन मामलों को कैसे परिभाषित करते हैं। इस पीठ को इस बात पर भी निर्णय लेना होगा कि आवश्यक धार्मिक प्रथाएँ किन्हें माना जाए और क्या इनका महत्त्व व्यक्ति के धार्मिक अधिकार से ऊपर है।

तथ्य यह है कि जब न्यायालय ने कुछ मुस्लिम महिलाओं की मस्जिदों में प्रवेश की याचिकाओं को स्वीकार किया तब न्यायाधीश बोबडे ने विशेष रूप से कहा कि यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि सबरीमाला में महिलाओं के पूजा के अधिकार का संरक्षण किया गया है जबकि यह विशेष स्थलों की विशेष परंपराओं के विरुद्ध है।

सबरीमाला में एकमात्र महिला जज इंदु मलहोत्रा अपने चार पुरुष सहकर्मियों से सहमत नहीं थीं जिसमें 10-50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने की अनुमति दे दी गई थी।

हालाँकि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश को रोकने वाले सामान्य प्रतिबंध के साथ सबरीमाला को जोड़ना गलत है। सबरीमाला में देवता को नैष्टिक ब्रह्मचारी के रूप में पूजा जाता है। अयप्पा के किसी और मंदिर में यह प्रतिबंध नहीं है क्योंकि वहाँ विराजे अयप्पा ब्रह्मचारी नहीं हैं।

यह अवश्य है कि हर मस्जिद में महिलाओं का प्रवेश प्रतिबंधित नहीं है। केवल प्रमुख सुन्नी समूहों द्वारा चलाई जा रही मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित होता है। जमात-ए-इस्लामी और कुछ अन्य संगठनों द्वारा चलाई जा रही मस्जिदों में ऐसा प्रतिबंध नहीं है।

इसलिए विशेष मंदिरों व मस्जिदों की विशेष प्रथाओं को सभी के धार्मिक अधिकार के मूल सिद्धांत के समक्ष तौलना चाहिए। यह निश्चित रूप से एक संवैधानिक सिद्धांत है जिसपर निर्णय किया जाना चाहिए।

भले ही इसपर निर्णय सात जजों की पीठ करेगी लेकिन यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि इसे भेदभाव और समानता के काले-सफेद रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सबरीमाला में महिलाओं के विरुद्ध कोई भेदभाव नहीं किया जा रहा है, उसी प्रकार जैसे कामाख्या मंदिर में पुरुषों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता है।

सबरीमाला की यह विशेष प्रथा एक मंदिर तक ही सीमित है और इस विविधता को स्वीकार करना चाहिए क्योंकि इसमें कोई भेदभाव नहीं है। हम आशा करते हैं कि न्यायालय इस आसाम पर ध्यान दे और इस मामले को केवल धार्मिक प्रथाओं और धार्मिक अधिकार में संघर्ष के रूप में न देखा जाए।

हालाँकि मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति का मामला अधिक व्यापक है, और ऐसा ही कुछ मुस्लिम समूहों में लड़कियों का गुप्तांग विकृत करने का है जो कि बाल अधिकारों का हनन है क्योंकि वे विरोध की स्थिति में नहीं रहते हैं। एफएमजी चुनने का अधिकार एक वयस्क का होना चाहिए ताकि हर महिला खुद समझदार होने के बाद बिना पारिवारिक और सामाजिक दबाव के चुन सके कि उसे अपनी धार्मिक मान्यताओं के लिए यह कराना है या नहीं।

एक बड़ी गलती जो सबरीमाला पीठ ने की है वह यह है कि महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने वाले अपने पिछले निर्णय को स्थगित नहीं किया। सात जजों की पीठ के अंतिम निर्णय से पहले यह स्थगन आवश्यक था।

इसे स्थगित न करके न्यायालय ने एक तरह से अंतिम नियमों के तय होने से पहले नियम बदलकर 10-50 वर्ष की आयु वाली महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी है। क्या यह उन श्रद्धालुओं के लिए न्यायोचित हुआ जो मानते हैं कि यह प्रतिबंध सही है और क्या उन्हें फिर सबरीमाला मुद्दे को हराने का प्रयास करने वाली राज्य सरकार से लड़ना होगा?

एक बार टूटने के बाद परंपराओं को बचाना या पुनर्जीवित करना कठिन होता है। बिना स्थगन के आदेशों के अयप्पा के भक्तों को राज्य के विरुद्ध पुनः सड़कों पर उतरना होगा।

सात जजों की पीठ को बोबडे के मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद इसपर चर्चा करनी चाहिए। कम से कम सबसे पहले इस निर्णय को स्थगित कर देना चाहिए। जब तक नियम तय नहीं हुए हैं, तब तक आप नियम नहीं बदल सकते हैं।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।