भारती
सरकार द्वारा संस्कृत भाषा के प्रति दिखाए जा रहे उत्साह के मायने क्या हैं

प्रसंग- हाल ही में सरकार द्वारा संस्कृत भाषा के प्रोत्साहन के लिए कई प्रयास किए गए हैं, क्या है इनकी प्रासंगिकता?

उत्तर प्रदेश के सूचना विभाग ने हाल में संस्कृत भाषा में भी प्रेस विज्ञप्ति जारी करने की पहल की है। अभी तक हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू में ही प्रेस नोट जारी किए जाते थे। हाल में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नीति आयोग के साथ हुई बैठक का प्रेस नोट संस्कृत भाषा में जारी किया गया। राज्य के सूचना निदेशक का कहना है कि इससे संस्कृत भाषा को बढ़ावा मिलेगा और संस्कृत के विद्यार्थियों का उत्साहवर्धन होगा। इतना साफ है कि यह फैसला राज्य के उच्चतम स्तर पर हुआ होगा, सूचना निदेशक के स्तर पर नहीं।

इसके साथ एक दूसरी खबर को भी पढ़ें। भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने देश में संस्कृत भाषा के संस्थानों के पास कम से कम दो संस्कृत-भाषी गाँवों के विकास की योजना बनाई है। हाल में दिल्ली में केंद्रीय भाषा संस्थानों के प्रमुखों की एक बैठक की अध्यक्षता करते हुए, मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि इस प्राचीन भाषा को नए आयाम देने के लिए अधिक योग्य संस्कृत शिक्षकों और प्रोफेसरों को इसके साथ जोड़ने की आवश्यकता है। साथ ही साथ इसे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा देने की भी योजना है।

संस्कृत में शपथ
चार साल पहले अगस्त 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने अपने पद और गोपनीयता की शपथ संस्कृत भाषा में ली, तब वह खबर राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आई। उन्हीं दिनों हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के स्कूलों में संस्कृत भाषा की शिक्षा अनिवार्य करने की खबरें मीडिया में उछलीं। पहली नजर में लगता है कि भारतीय जनता पार्टी के उभार के साथ देश में संस्कृत संवर्धन और प्रसार को लेकर उत्साह बढ़ रहा है।

हाल में नव-निर्वाचित लोकसभा सदस्यों के शपथ-समारोह में देखने को मिला कि हिंदी और संस्कृत में शपथ लेने वालों की संख्या बढ़ रही है और अंग्रेज़ी में शपथ लेने वालों की संख्या कम हो रही है। सन 2014 में जहाँ 114 सदस्यों ने अंग्रेज़ी में शपथ ली, वहीं इसबार 54 ने। सन 2014 में संस्कृत में शपथ लेने वालों की संख्या 39 थी, जो इसबार बढ़कर 44 हो गई। हिंदी और अंग्रेज़ी के बाद तीसरे स्थान पर सबसे ज्यादा शपथ संस्कृत में ली गईं।

इन बातों से क्या हम कोई निष्कर्ष निकाल सकते हैं? क्या संस्कृत भाषा की हमारे जीवन में कोई भूमिका है? संस्कृत ही नहीं देश में शास्त्रीय भाषाओं का महत्व क्या है? क्या इसे सांस्कृतिक-राजनीति मानें? शेष पाँच शास्त्रीय भाषाओं की जीवन के सभी क्षेत्रों में सक्रिय-भूमिकाएं हैं, क्योंकि वे जीवंत-भाषाएँ हैं। संस्कृत भाषा की क्या भूमिका है?

काफी लोग संस्कृत को मृत-भाषा मान चुके हैं। ऐसा नहीं मानें, तब भी आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा के माध्यम के रूप में उसकी भूमिका दिखाई नहीं पड़ती। तब क्या केवल जन-भावनाओं के कारण उसे बढ़ावा दिया जा रहा है? भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रवाद की पृष्ठभूमि में उसकी क्या कोई भूमिका है? सवाल यह भी है कि संस्कृत भाषा की अनदेखी करके क्या आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य का विकास हो सकता है?

गहरा अनुग्रह
भारतीय जनता पार्टी के आग्रह अपनी जगह हैं, पर स्वतंत्रता आंदोलन या उसके पहले से हमारे समाज का संस्कृत भाषा के प्रति अनुराग गहरा है। आधुनिक भारत में उसकी उपादेयता पर विचार करने के पहले हमें अपने राष्ट्रीय-आंदोलन और स्वतंत्रता के बाद की पृष्ठभूमि पर विचार करना होगा। संस्कृत के महत्व को राष्ट्रीय स्तर पर हमेशा स्वीकार किया गया। पर यह बात फिर भी कही जाती है कि संस्कृत आम इस्तेमाल की भाषा नहीं है।

जवाहर लाल नेहरू ने डिसकवरी ऑफ इंडिया में लिखा है, ‘मैं नहीं जानता कि कितने दिनों से संस्कृत एक मरी हुई भाषा है-इस मानी में कि वह आमतौर पर बोली नहीं जाती। कालिदास के जमाने में भी यह जनता की भाषा नहीं थी, अगरचे यह सारे भारत के पढ़े-लिखों की भाषा थी। और सदियों तक ऐसी बनी रही, बल्कि दक्षिण-पूर्वी एशिया और मध्य एशिया में भी फैली।’ नेहरू ने आगे लिखा है, ‘सन 1937 में त्रिवेंद्रम में डॉ एफएफ टॉमस ने इस बात की तरफ इशारा किया था कि भारत की एकता में संस्कृत का कितना बड़ा हाथ है। उन्होंने तजवीज़ किया कि संस्कृत के किसी सरल रूप को, अखिल-भारतीय भाषा के रूप में बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने मैक्समूलर के इस कथन को उधृत किया कि संस्कृत आज भी अकेली भाषा है, जो इस बड़े देश में सब जगह बोली जाती है।’

नेहरू ने लिखा है, ‘संस्कृत समझने वालों की गिनती, खासतौर से दक्षिण में, अब भी बहुत बड़ी है।…आजकल की उर्दू तक में 80 फीसदी लफ्ज़ संस्कृत के हैं। अक्सर बताना मुश्किल हो जाता है कि कोई खास लफ्ज़ संस्कृत से आया है या फारसी से, क्योंकि दोनों भाषाओं के मूल शब्द अक्सर एक से हैं। अचरज की बात है कि दक्षिण की द्रविड़ भाषाओं ने, अगरचे वे मूल में बिलकुल अलग परिवार की भाषाएँ हैं, संस्कृत के इतने शब्द अपना लिए हैं कि करीब-करीब उनका आधा शब्दकोश संस्कृत से मिलता है।’

भाषाओं की भाषा
डॉ सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय आर्य-भाषा और हिंदी में लिखा है, ‘संस्कृत आज भी आधुनिक भारतीय भाषाओं में जीवन-रस का संचार कर रही है, तब उसे मृत कैसे कहा जा सकता है?’ वस्तुतः आज भी हिंदी के लगातार बदलते स्वरूप में जब भी कोई बात भाषाविदों को पेचीदा लगता है, तब वे सबसे पहले संस्कृत की मदद से उसे सुलझाने का प्रयास करते हैं। दूसरे देश की सभी भाषाओं को जब परस्पर विचार-विनिमय करना होता है, तब उन्हें संस्कृत की मदद मिलती है।

सबसे बाएँ में डॉ सुनीतिकुमार

आप भारत की कोई भी भाषा बोलें, आपके शब्द अपरिचित नहीं होंगे, केवल बोलने का तरीका भिन्न होगा। इस अर्थ में संस्कृत की जीवंत भूमिका है। यूरोप के तकरीबन सभी विश्वविद्यालयों में संस्कृत का अध्ययन होता है। यूरोप के संस्कृत विद्वान परंपरागत तरीके से संस्कृत का अध्ययन करने के लिए भारत आते रहते हैं। इस प्रकार भाषा-विज्ञान की आधुनिक पद्धतियों के साथ-साथ परंपरागत ज्ञान का मेल भी होता रहता है।

हमारे यहाँ जब भी भाषा के सवाल खड़े होते हैं, तब हिंदी की सांविधानिक स्थिति को लेकर विवाद होता है। बेशक हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं, राजभाषा है। संविधान के अनुच्छेद 351 पर बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है। इस अनुच्छेद के अनुसार ‘संघ का कर्तव्य होगा कि वह हिंदी का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे, जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके…और जहाँ आवश्यक या वांछनीय हो वहाँ उसके शब्द भंडार के लिए मुख्यतः संस्कृत से और गौणतः अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।’ यानी राजभाषा हिंदी के संवर्धन के लिए भी संस्कृत को बुनियादी स्रोत बनाने के लिए संस्कृत को एक भूमिका दी गई है।

क्या यह प्रतिगामिता है?
सन 1956 भारत सरकार ने प्रथम संस्कृत आयोग का गठन किया, जिसके अध्यक्ष डॉ सुनीतिकुमार चाटुर्ज्या थे। सन 1957 में इस आयोग ने जो सिफारिशें कीं, उनमें एक यह भी थी कि साल में एक दिन देश में राष्ट्रीय संस्कृत दिवस मनाया जाए। भारत सरकार ने सन 1969 में निर्देश जारी किया, जिसके आधार पर श्रावण पूर्णिमा के दिन संस्कृत दिवस मनाया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में इसके साथ संस्कृत सप्ताह मनाने की व्यवस्था शुरू हो गई। सन 2013 में यूपीए-2 के कार्यकाल में द्वितीय संस्कृत आयोग का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष प्रो सत्यव्रत शास्त्री थे। इस आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए एन गोपालस्वामी की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई, जिसने दस साल का एक कार्यक्रम बनाकर दिया है।

इस श्रृंखला में ही हमें ये सरकारी कार्यक्रम दिखाई पड़ रहे हैं। बुनियादी सवाल है कि यह सब क्या उपयोगी है? सन 2014 में केन्द्र में मोदी सरकार की स्थापना के बाद कुछ ऐसी बातें हुईं हैं, जिनके आधार पर माना जा रहा है कि हमारी सरकार पुरातन और पोंगापंथी विचारों को बढ़ावा दे रही है। मुम्बई में 102वीं साइंस कांग्रेस के दौरान वैदिक विमानन तकनीक पर अपने पर्चे में कैप्टन आनंद जे बोडास ने कहा, ‘भारत में सदियों पहले भी विमान मिथक नहीं थे, वैदिक युग में भारत में विमान ना सिर्फ एक से दूसरे देश, बल्कि एक दूसरे ग्रह से दूसरे ग्रह तक उड़ सकते थे, यही नहीं इन विमानों में रिवर्स गियर भी था, यानी वे उल्टा भी उड़ सकते थे।’ बहरहाल ये बातें विवादास्पद हुईं। सच है कि हमारे पास विज्ञान की एक परम्परा है। भारत सरकार से सम्बद्ध संस्था विज्ञान प्रसार ने इससे जुड़े साहित्य का प्रकाशन भी किया है।  प्रसिद्ध विज्ञानी जयंत विष्णु नार्लीकर ने अपनी पुस्तक ‘द साइंटिफिक एज’ में पुराने भारतीय विज्ञान और गणित का उल्लेख किया है। इसमें कुछ गलत नहीं कि हम अपने पुराने विज्ञान के बारे में और शोध करें और संस्कृत साहित्य में यदि कोई जानकारी है तो उसे दुनिया के सामने लाएँ। विज्ञान की खासियत है कि वह किसी भी नए तथ्य का स्वागत करता है। पर क्या हम विज्ञान-मुखी हैं?

11वीं सदी में भारत आए ईरानी विद्वान अल-बिरूनी ने लिखा है कि प्राचीन हिंदू वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष की अनेक परिघटनाओं की बेहतर जानकारी थी। उन्होंने खासतौर से छठी सदी के गणितज्ञ और खगोल-विज्ञानी वराहमिहिर और सातवीं सदी के ब्रह्मगुप्त का उल्लेख किया है, जिन्हें वे महान वैज्ञानिक मानते थे। इन विद्वानों को इस बात का ज्ञान था कि सूर्य और चन्द्र ग्रहण क्यों लगते हैं। वराहमिहिर की पुस्तक बृहत्संहिता में इस बात का हवाला है। पर बात पोंगापंथ और संजीदगी की है। देखना होगा कि संस्कृत के संदर्भ में हमारी योजनाएँ किस दिशा में जा रहीं हैं।

भाषा की भूमिका
भाषा की भूमिका मुख्यतः चार क्षेत्रों में होती है। 1.शिक्षा के माध्यम के रूप में, 2.संचार और संपर्क की भाषा के रूप में, 3.मनोरंजन और जीवन-शैली के माध्यम के रूप में और 4.सांस्कृतिक आधार के रूप में। बेशक संस्कृत की भूमिका सम्पर्क भाषा के रूप में नहीं है और आधुनिक जीवन-शैली में भी उसकी खास भूमिका नहीं है। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत को भी सम्मिलित किया गया है। यह उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा है। आकाशवाणी और दूरदर्शन से संस्कृत में समाचार प्रसारित किए जाते हैं। कुछ वर्षों से डीडी न्यूज वार्तावली नाम से संस्कृत-कार्यक्रम भी प्रसारित कर रहा है, जिसमें हिंदी फिल्मी गीतों के संस्कृतानुवाद, सरल-संस्कृत-शिक्षण, संस्कृत-वार्ता और महापुरुषों के संस्कृत जीवन-वृत्तों, सुभाषित-रत्नों आदि का प्रसारण हो रहा है।

कुछ लोगों की इन कार्यक्रमों में भी रुचि है, पर ये बहुत लोकप्रिय कार्यक्रम नहीं हैं। अलबत्ता यदि संस्कृत को माध्यमिक कक्षाओं में एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाएगा, तो उससे एक बड़े वर्ग को संस्कृत व्याकरण और शब्दावली से परिचय का पाने का अवसर मिलेगा। एक बड़ा तबका अब भी संस्कृत को धर्म की भाषा के रूप में देखता है, पर ऐसा है नहीं। धार्मिक साहित्य तो संस्कृत वांग्मय का छोटा सा हिस्सा है। यों भी हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धार्मिक रचनाओं में भी संस्कृत की भूमिका है। इस लिहाज से उसकी भूमिका बहुत व्यापक है।

इसकी सबसे बड़ी भूमिका भारतीय भाषाओं की भाषा के रूप में है। भले ही उसका इस्तेमाल बहुत कम लोग करते हैं, पर जिस भाषा का इस्तेमाल हम करते हैं, उसके संवर्धन में संस्कृत की भूमिका है। इन सभी भाषाओं को जोड़ने में भी संस्कृत की भूमिका है। सन 1947 में स्वतंत्र होने के बाद से भारत एक आधुनिक सांविधानिक-प्रशासनिक व्यवस्था के साथ एक नए राष्ट्र-राज्य के रूप में विकसित हो रहा है। आधुनिक विज्ञान की भाषा के रूप में अंग्रेजी हमारे लिए जितनी भी उपयोगी हो, पर अंत में हम पाएँगे कि किसी भी संस्कृति और समाज की मौलिकता उसकी अपनी भाषाएँ देती हैं। यह बात अगले कुछ दशकों में और ज्यादा शिद्दत से तब समझी जाएगी, जब हम महाशक्ति के रूप में विकसित हो चुके होंगे। तब हमें अपनी संस्कृति का ख्याल आएगा।

भारत विविधताओं का देश है। यहाँ तमाम भाषाएँ हैं और कई तरह की संस्कृतियाँ हैं। राष्ट्रीयता के विकास में यह विविधता बड़ी बाधा लगता है। पर यही विविधता संस्कृत के कारण हमारी एकता में तब्दील हो जाती है। संस्कृत इस अनेकता को एकता में परिवर्तित करती है। भारतीय संस्कृति को अर्थ प्रदान करती है। संस्कृति, विचार-दर्शन और इतिहास का अध्ययन करने के लिए संस्कृत स्रोतों की मदद लेना ज़रूरी है। उसके संरक्षण के बारे में तो हमें सोचना ही चाहिए।

इतना होने के बावजूद संस्कृत के प्रसार को संकीर्ण धार्मिक कर्मकांड की तरह न देखा जाए। संस्कृत की भूमिका बहुत बड़ी है। और उसे केवल भारतीय जनता पार्टी की राजनीति से जोड़ना भी अनुचित है। ध्यान दें दोनों संस्कृत आयोग कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल में बने थे। शास्त्रीय भाषाओं की पहल भी यूपीए सरकार की देन है। सवाल है कि क्या ऐसा भाजपा को देखते हुए किया गया या कोई वाजिब कारण भी हैं। प्रेस नोट जारी करने या दूरदर्शन पर खबरें सुनाने से संस्कृत की लोकप्रियता नहीं बढ़ेगी। ऐसे कदम प्रतीकात्मक ही रहेंगे। पर इतना सच है संस्कृत को लेकर सामान्य भारतवासी के मन में जो गहरा सम्मान है, उसे बढ़ाने की ज़रूरत है। संस्कृत हमारे गौरव की प्रतीक है।