भारती
स्वच्छता अर्थव्यवस्था की अवधारणा- नवाचार से स्वच्छ सुविधाओं के बाज़ार में आय के स्रोत

आर्थिक दृष्टि से स्वच्छता को सदैव एक दायित्व माना जाता है, कभी इसे संपत्ति प्रजनन का माध्यम नहीं समझा गया। लेकिन कूड़ा प्रबंधन की बढ़ती समस्याओं के बीच हमारा साक्षात्कार ऐसे कई समाधानों से हुआ जिन्होंने कचरे-मल के उपयोग का प्रयास किया। इसी से स्वच्छता अर्थव्यवस्था की एक नई परिभाषा जन्मी।

जेनेवा आधारित टॉयलेट बोर्ड संघ (टीबीसी) इस दिशा में कार्य कर रहा है व इसके मुख्य संचालन अधिकारी सैंडी रोजर का मानना है कि शौचालय से फ्लश होने वाली सभी वस्तुएँ- “पानी और जैविक पदार्थ- संसाधान हैं, बस आपको इस मल का उपचार करना आना चाहिए।” वे शौचालय को एक संसाधन मानते हैं जिससे राजस्व कमाया जा सकता है।

उद्योगों, नागरिकों और विकास एजेंडाओं के लिए समाधान ढूंढने हेतु पिछले माह पुणे में एक समिट का आयोजन हुआ जिसमें कई प्रतिनिधियों, निवेशकों और विशेषज्ञों ने चर्चा की। वर्तमान में भारत में 1 लाख करोड़ रुपये का स्वच्छता बाज़ार है जिसके 2021 तक 4.5 गुना होने का अनुमान टीबीसी ने लगाया है।

अभी तक इस क्षेत्र में तीन व्यापार मॉडल उभरकर आए हैं-

  • शौचालय अर्थव्यवस्था- इसमें सामुदायिक शौचालय, बायो-टॉयलेट, कंटेनर टॉयलेट, पोर्टेबल टॉयलेट समेत टॉयलेट उपकरणों का निर्माण, स्थापना और बिक्री आती है। स्वच्छता की बढ़ती आवश्यकताओं के बीच कंपनियाँ मांग और सेवाओं की आपूर्ति से व्यापार कर सकती हैं।

  • मंडलाकार अर्थव्यवस्था- इसमें शौचालय के मल का उपचार कर उसे किसी आवश्यक वस्तु में परिवर्तित करने पर ध्यान दिया जाता है। चारा कंपनियाँ, खाद कंपियाँ, रसायन और दवाइयों के क्षेत्र में काम कर रही विभिन्न कंपनियाँ इस प्रकार के व्यापार मॉडल में रुचि दिखाती हैं।
  • स्मार्ट सैनिटेशन अर्थव्यवस्था- यह अर्थव्यवस्था डाटा आधारित है जहाँ सामुदायिक शौचालयों और घरों से सेंसर व अन्य माध्यमों से उपभोक्ता डाटा, अन्य संस्थाओं से स्वास्थ्य डाटा लिया जाता है। इस डाटा का प्रसंस्करण व विश्लेषण होता है जिसका उपयोग स्वास्थ्य संस्थाएँ, कूड़ा प्रबंधन संस्थाएँ, शौचालय निर्माता कंपनियाँ, सरकार, होटल, आदि कर सकते हैं।

भले ही पिछले माह ही इस संस्था ने अपना भारत अध्याय लॉन्च किया है लेकिन कई निजी कंपनियाँ पहले से ही भारत में अपने नवाचारों का प्रयोग कर रही हैं। इन नवाचारों के भी तीन आयाम हैं-

1. लागत कम करना- लागत दो तरह से कम की जा सकती है- एक निर्माण में और दूसरी रखरखाव में। कई कंपनियाँ ऐसी प्रणाली विकसित कर रही हैं जिसमें पाइप की लंबाई को न्यूनतम किया जा सके। कम पाइपों वाली यह प्रणाली निकटतम या उसी स्थान पर प्रसंस्करण का प्रयास करती है जिससे पाइप की आवश्यकता न रहे।

निर्माण और भूमि की लागत को बचाने का एक और तरीका टीआई बस ने खोज निकाला है जहाँ वे पुरानी बसों को शौचालय में परिवर्तित करते हैं। गुलाबी रंग से रंगी ये बसें विशेषकर महिलाओं के लिए हैं। पुणे में तीन बसों से शुरुआत कर अब तक भारत में 10 बसें हैं। मुंबई भी बेस्ट की पुरानी बसों का उपयोग कर 15 स्थानों पर टीआई बस की साझेदारी में ऐसे शौचालय स्थापित करने की योजना में है।

एक ऐसी ही पहल गर्व टॉयलेट्स ने भी की है जो स्टेनलेस स्टील के शौचालय बनाते हैं जिन्हें आवश्यकतानुसार एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाया जा सकता है। सोलार पैनल से लैस ये शौचालय सौर्य ऊर्जा से बनी बिजली का उपयोग करते हैं। मल के उपचार के लिए इनमें बायो-डाइजेस्टर होता है जिससे कुछ वर्षों के अंतराल पर इसके पिट की सफाई की समस्या भी नहीं रहती।

2. मल का उपयोग और अन्य साधनों से आय- नवंबर 2016 में हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड (एचयूएल) ने मुंबई के घाटकोपर में स्थित आज़ाद नगर के झुग्गी क्षेत्र में देश का पहला सुविधा केंद्र स्थापित किया। यहाँ बाज़ार से कम दर पर शौचालय, स्नान, कपड़े धोने और पानी की सुविधा उपलब्ध है। इसी प्रकार टीआई बस में 5 रुपये का शुल्क लगता है।

नहाने-धोने के लिए उपयोग किए हुए पानी को फ्लश के लिए प्रयोग में लाया जाता है। इससे लगभग 1 करोड़ लीटर पानी प्रतिवर्ष बचता है। इस केंद्र ने बस्ती में रह रहे 1,500 लोगों को सुविधा प्रदान की। इसके बाद सुविधा के चार और केंद्र स्थापित किए गए।

सुविधा का मलाड, मुंबई स्थित केंद्र

लिक्सिल के साथ काम कर रहे टाइगर टॉयलेट्ल में मल को डाइजेस्ट करने के लिए टाइगर वॉर्म्स का उपयोग होता है। ये कीड़े मल को खाद में परिवर्तित कर देते हैं और मलजल को उपयोग के लायक पानी में। इस प्रकार रसायन उद्योगों के साथ साझेदारी कर राजस्व कमाया जा सकता है।

शुल्क और जैविक पदार्थों से राजस्व के अलावा प्रचार भी आय का एक साधन है। उदाहरण के लिए टीआई बस पर प्रचार के पोस्टर लगाए जाते हैं। इन केंद्रों से जुड़े कैफै, कपड़े धोने की सुविधा और स्वास्थ्य केंद्र भी अतिरिक्त आय का स्रोत बनते हैं।

3. ग्राहकों के लिए सुविधा को रुचिकर बनाना- लिक्सिल की एक इकाई है सैटो जो शौचालय उपकरणों (एसेसरीज़) के निर्माण क्षेत्र में काम करती है। जनवरी 2018 में इसने मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में अपनी शौचालय श्रृंखला लॉन्च की। इसके बाद आठ अन्य राज्यों में भी यह श्रृंखला शुरू हुई।

सैटो वी-ट्रैप शौचालय एक ट्विन पिट फ्लश पोर लैट्रीन है जो स्वचालित ट्रैप द्वार से बीमारियों को फैलने से रोकता है और दुर्गंध को कम करता है। ट्विन पिट प्रणाली नाली जाम नहीं होने देती व 1 लीटर से कम फ्लश में भी यह सुचारु रहता है। इसे स्थापित करना इतना सरल है कि यह काम स्थानीय मिस्त्री भी कर सकते हैं।

दुर्गंध की परेशानी के लिए मेंलिंदा व गेट्स फाउंडेशन के साथ मिलकर जेनेवा आधारित फर्मेनिच काम कर रही है। पुणे में एक सर्वेक्षण से कंपनी ने पाया कि लोग दुर्गंध वाले शौचालय में शौच करने से बेहतर खुल में शौच करना समझते हैं। पाँच वर्षों तक शोध से कंपनी ने दुर्गंध मिटाने वाले सस्ते और उपयोग में सरल उत्पादों का निर्माण किया। अब वे टीआईबस को भी अपनी सुविधाएँ दे रहे हैं।

सैटो लूटल स्मार्ट टॉयलेट कैफे का पथ-प्रदर्शन भी कर रही है। लूटल एक नए विचार पर आधारित शौचालय शृंखला है जहाँ आप 10 रुपये देकर सुविधा का उपयोग करते हैं और इसके बदले आपको उसी राशि का कूपन मिलता है जिसे लूटल कैफे पर लागू कर जलपान कर सकते हैं। इंदौर से शुरू हुए लूटल के तीन ऐसे कैफे हैं।

डाटा का महत्त्व

कोई भी उपभोक्ता आधारित सुविधा को डाटा की आवश्यकता होती है। स्वच्छता प्रणालियों में डाटा की सबसे बड़ी भूमिका मानव व्यवहार आँकने में होती है। पुणे देश का पहला शहर है जो स्मार्ट सैनिटेशन विकसित करने की योजना बना रहा है। टाटा ट्रस्ट्स ने इस कार्य के लिए अपना हाथ बढ़ाया है।

पुणे स्मार्ट सिटी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजेंद्र जगताप का मानना है कि सामुदायिक शौचालय के उपयोग, मलजल व सीवर की गुणवत्ता एवं बीमारी फैलने का डाटा मिलने से स्वच्छता प्रबंधन व स्वास्थ्य लागत में बचत की जा सकती है। इसके परिणाम देखने के लिए हमें थोड़ी और प्रतीक्षा करनी होगी।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।