भारती
‘बदला लेने वाली भीड़’ घटनाओं की बढ़ती संख्या और इससे कैसे निपटें

प्रसंग- बदला लेने वाली भीड़ हिंसक घटनाओं में चिंताजनक बढ़ोतरी देखी गई है। ऐसी ही कुछ घटनाओं और इसके समाधान के विषय में पढ़ें।

नई दिल्ली, जून 2019

30 जून की रात को नारे लगाते हुए एक भीड़ ने चांदनी चौक के लाल कुआँ स्थित एक रहवासी क्षेत्र पर हमला किया और मंदिर में तोड़-फोड़ की। यह हमला स्थानीय निवासियों संजीव गुप्ता और आस मोहम्मद के बीच एक पार्किंग विवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप था।

इस क्षेत्र में रहने वाले 50 से अधिक परिवारों का इस पार्किंग विवाद से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन फिर भी भीड़ ने उनके घर पर भी पत्थर फेंके और धर्म के नाम पर उन्हें गाली दी व भला-बुरा कहा। कॉलोनी के प्रवेश पर स्थित दुर्गा मंदिर पर 100 लोगों से अधिक की भीड़ ने हमला किया और मंदिर के काँच तोड़े, मूर्तियों कोक्षति पहुँचाई, पर्दे जलाए और कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने मंदिर परिसर में पेशाब भी की।

मोबाइल में रिकॉर्ड किए गए वीडियो और प्रत्यक्ष साक्षियों के कथन के अनुसार भीड़ “अल्लाह-उ-अकबर”, “नारा-ए-तकबीर”, “सारे हिंदुओं बाहर आओ, हम तुमको बताएँगे काटा कैसे जाता है, काटना हमसे सीखो” और “मोदी मुर्दाबाद, हमारा इमरान हुसैन ज़िंदाबाद, केजरीवाल ज़िंदाबाद” के नारे लगा रही थी।

दुर्गा मंदिर गली का द्वारा जहाँ भीड़ ने तोड़-फोड़ की

कोलकाता, जून 2019

10 जून की रात को 200 लोगों की एक भीड़ कोलकाता के राजकीय अस्पताल में पहुँच गई व कर्मचारियों पर हमला किया। यह हमला जूनियर डॉक्टरों और एक मरीज़ के परिवारवालों के मध्य हुए विवाद की प्रतिक्रिया में था।

परिवार ने अस्पताल कर्मचारियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने 75 वर्षीय मोहम्मद सईद, जिनकी दिल के दौरे से मृत्यु हुई थी, के उपचार में अनदेखी की थी। सईद का बेटा और भतीजा स्थानीय मस्जिद में इमाम था जिसने कथित तौर पर अपने पड़ोसी क्षेत्र से लोगों को हिंसा के लिए बुलाया था। रिपोर्ट के अनुसार यह भीड़ परिवार के बुलाए जाने पर दो लौरियों में भरकर आई और पत्थर व ईंटों से अस्पताल कर्मचारियों पर हमला किया जिससे एक जूनियर डॉक्टर परिबाहा मुखोपाध्याय गंभीर रूप से घायल हो गया।

मथुरा, मई 2019

18 मई को 15-20 लोगों की एक भीड़ ने उत्तर प्रदेश के मथुरा में भरत यादव व पंकज यादव की दुकान पर हमला किया और उनके साथ मारपीट भी की। सप्ताह भर बाद बड़े भाई 26-वर्षीय भरत की चोटों के कारण मृत्यु हो गई। यह हमला लस्सी की दुकान पर भुगतान को लेकर दुकानदार और ग्राहकों के बीच हुए छोटे से विवाद के कारण हुआ था।

भीड़ ने दोनों भाइयों को काफिर कहते हुए लाठियों और रॉड से हमला किया। प्रत्यक्ष साक्षी कहते हैं कि भीड़ ने यह भी कहा कि यह सब योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी के कारण हो रहा है जिससे उन लोगों को हिम्मत आ गई है।

नई दिल्ली, मार्च 2019

मार्च में दो पड़ोसियों के बीच हुई मामूली बहस के कारण दूसरे पड़ोसी ने अपने पड़ोसी के द्वार पर कुछ मिनटों में भीड़ बुला ली। इस विवाद का कारण था कि ठाकुर दास ने शिकायत की थी कि पड़ोसी के बच्चे उसके घर पर पत्थर फेंक रहे थे।

तलवारों, ईंटों व पत्थरों के साथ ठाकुर के घर पर टूटी 10-15 आदमियों की भीड़ ने घर में तोड़-फोड़ की व वहाँ रहने वालों पर हमला किया। संयोगवश यह घटना नई दिल्ली के उसी बसाई दारापुर क्षेत्र में हुई जहाँ जहांगीर खान ने ध्रुव त्यागी को कसाई चाकू से मार डाला। त्यागी का दोष मात्र इतना था कि उसने अपनी बेटी के साथ हुई छेड़छाड़ के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी।

गुरुग्राम, मार्च 2019

गुरुग्राम में मोहम्मद साजिद के घर में एक भीड़ ने घुसकर उसपर और पत्नी-बच्चे समेत उसके परिवार पर हमला किया। यह हमला क्रिकेट खेल रहे बच्चों और मोटरसाइकल पर सवार कुछ लोगों के बीच विवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप था।

दोनों पक्षों ने विवाद पर विरोधाभासी बयान दिए। परिवार का कहना है कि बिना किसी उकसावे के क्रिकेट खेलने वालों को एक समूह ने मुल्ला कहकर पाकिस्तान जाने को कहा जबकि बाइकसवारों का कहना है कि क्रिकेट की गेंद उनसे आकर टकराई और जब उन्होंने प्रतिक्रिया दी तो क्रिकेट खेलने वालोंने मारपीट की।

बाइकसवार अपने समुदाय के 12-15 लोगों के साथ लौटे और लाठियों से पूरे परिवार पर हमला किया।

मंटोला आगरा, फरवरी 2019

3 फरवरी को रात 8 बजे प्रमोद कुमार निकट के आरओ संयंत्र से पानी भरकर ला रहे थे तब आदमियों के एक समूह ने उनपर हमलाकरके उन्हें गिरा दिया। दोनों पक्षों में बहस हुई थी लेकिन कुछ मिनटों बाद वह व्यक्ति अपने समुदाय के 20 सदस्यों को लेकर आ गया और कुमार परिवार के तीन घरों पर हमला किया।

“उन्होंने पत्थर और ईंटें फेंकना चालू कर दिया, यहाँ तक कि गोली भी चलाई। उन्होंने अपने छतों से तोजाब की बोतलें फेंकी।”, एक परिवार सदस्य ने संवाददाता को बताया।

पीड़ितों का कहना है कि धर्म के आधार पर उनपर हमला हुआ था और वे चाहते हैं कि वे उन्हें आतंकित कर यह क्षेत्र छोड़ने के लिए विवश कर दें। 20 वर्ष पहले इस क्षेत्र में 400 हिंदू परिवार रहते थे, अब मात्र 100 बचे हैं, उन्होंने कहा। “हिंदुओं को बाहर निकालने की यह रणनीति है। अन्यथा इतनी छोटी सी बात पर वे गोली क्यों चलाते?”, पीड़ित के रिश्तेदार प्रमेश सिंह मौर्य ने कहा।

मंटोला, आगरा में हमले से पीड़ित लोग

बदला लेने वाली भीड़ों का चलन

भारत में सांप्रदायिक कलह नई बात नहीं है। अपनी पुस्तक पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया  में बीआर अंबेडकर, इस निष्कर्ष पर पहुँचकर कि संप्रदाय के आधार पर बँटवारा ही दीर्घकालिक शांति का एकमात्र समाधान है, कुछ घटनाओं का उल्लेख करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विवादास्पद विषयों पर बड़ी संख्या में सामूहिक हिंसा देखी गई है। प्रायः इन घटनाओं में गाय या धार्मिक यात्राएँ जैसे संवेदनशील विषय विवाद का कारण बनते हैं।

हालाँकि, हाल ही में बदला लेने वाली भीड़ हिंसा की घटनाएँ अधिक देखी गई हैं। ध्यान से देखने पर एक चलन दिखता है। छोटी सी बात पर थोड़ा विवाद होता है। फिर धमकी दी जाती है। थोड़ी देर बाद एक पक्ष बदला लेने के लिए भीड़ के साथ वापस आता है। भीड़ में यह स्पष्ट होता है कि वे सब एक ही धर्म के हैं और कई बार धार्मिक आधार पर गालियाँ भी दी जाती हैं। और शीघ्र ही यह घटना एक गंभीर अपराध बन जाती है।

ऐसी भीड़ों में कानून का भय शायद ही होता है। मथुरा में औरत ने दोनों भाइयों को चुनौती दी थी कि वे पुलिस में शिकायत दर्ज करके दिखाएँ और कहा था कि उसे आसानी से जमानत मिल जाएगी। बसाई दारापुर में हिरासत में होने के बावजूद एक हमलावर ने पीड़ित के बेटे शेखर को कहा था कि वह किसी से डरता नहीं है और स्वयं की तुलना दाऊद इब्राहिम से की थी।

इनमें से अधिकांश मामलों में पीड़ितों ने कहा कि पुलिस हमलावरों के साथ नरमी से पेश आई।

मथुरा में भीड़ हिंसा का शिकार हुए भरत यादव की पत्नी व बेटी

बढ़ती असहिष्णुता, आतंकित प्रतिक्रिया या धर्म का रौब? कार्यकर्ता क्या कहते हैं

हिंदू राष्ट्रवादी संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिल्ली इकाई के कार्यकारी सदस्य राजीव तुली कहते हैं कि इन मामलों में धर्म का रौब दिखता है। क्षति होने के बाद लाल कुआँ स्थित दुर्ग मंदिर के पुनर्निर्माण में सक्रिय तुलि कहते हैं कि ज़्यादातर मामलों में देखा गया है कि भीड़ मुस्लिम समुदाय द्वारा ही लाई जाती है।

“यह सब इसलिए क्योंकि अब हिंदू समुदाय भी बोलने लगा है”, वे कहते हुए समझाते हैं, “पहले सरकारें खुले रूप से मुस्लिमों का समर्थन करती थीं सलिए हिंदू शांत रहते थे। अब वे जवाब देत हैं। आप देख सकते हैं कि कैसे हिंदू युवा प्रतिदिन लाल कुआँ में एकत्रित होकर अपने सहधर्मियों का सांत्वाना देते हैं। इसलिए दूसरा समुदाय भी अधिक आक्रामक हो गया है।”

तुली बताते हैं कि ये भीड़ सिर्फ सड़कों पर इकट्ठा नहीं होती बल्कि ये लोग सोशल मीडिया पर भी वीडियो डालकर हिंदुओं की हत्याओं और बलात्कार की धमकी देते हैं। तबरेज़ अंसारी की हत्या के बाद बदले की धमकी वाले कई वीडियो सामने आए, विशेषकर टिक-टॉक पर।

दूसरी तरफ इस्लामी संस्था अंजुमन मिनहाज-ए-रसूल के अध्यक्ष मौलाना अथर हुसैन दहलवी कहते हैं कि यह हमले आपराधिक दर बढ़ने के साथ बढ़ रहे हैं जैसे सड़कों पर चालकों में जो रोष होता है (रोड रेज), उसी प्रकार से। दहलवी के अनुसार तबरेज़ अंसारी और भरत यादव दोनों की ही हत्याएँ रोड रेज का परिणाम थीं लेकिन मीडिया ने उन्हें सांप्रदायिक बना दिया, भले ही इन घटनाओं में काफिर कहा गया हो या जय श्री राम के नारे लगे हों।

“सहनसीलता लगातार हमारे जीवन से निकलती जा रही है।”, वे कहते हैं। “लोग छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे को गोली मार रहे हैं। नजफगढ़ में एक कार मालिक ने साइड न दिए जाने पर एक व्यक्ति को मार दिया। हर कोई उत्तेजित और बेसब्र है आजकल।”, अध्यक्ष कहते हैं।

दहलवी कहते हैं कि मामलों का सांप्रदायिक रंग देने में दोष मीडिया का है। “जुर्म को धर्म का नाम दिया जा रहा है।”, वे कहते हैं और तर्क देते हैं कि जब किसी मोहम्मद अयूब पंडित को भीड़ मारती है तो मीडिया इसकी खबर नहीं बनाती क्योंकि पीड़ित और अपराधी दोनों का धर्म एक ही है। “जब हिंदू-मुस्लिम का समीकरण होता है तब ही मीडिया रुचि दिखाती है और मामले को सांप्रदायिक बना देती है।”, वे कहते हैं।

जब पूछा गया कि जब लाल कुआँ की घटना में भीड़ अल्लाह-उ-अकबर कह रही थी तो इसे एक सांप्रदायिक अपराध क्योम न कहा जाए, दहलवी कहते हैं कि भीड़ पुरानी दिल्ली की संस्कृति से अनभिज्ञ थी। “मेरी जड़ें पुरानी दिल्ली में हैं, जहाँ हर 200 मीटर पर मंदिर होता है। निस्संदेह ही भीड़ इस क्षेत्र की संस्कृति नहीं जानती थी और किस एकता के साथ हम इतने वर्षों से रहे हैं।”, उन्होंने कहा।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर में आतंकियों के लिए वित्त पर शोध कर रहे और अपराध पीड़ितों के लिए काम करने वाले संजीव नेवार कहते हैं कि कुछ घटनाएँ भय के कारण हुईं। “जिस तरह से अपराधी हमला करते समय योगी और मोदी का नाम ले रहे हैं, दर्शाता है कि लोकसभा चुनावों में हुई लोकतांत्रिक हार का बदल वे सड़कों पर हिंसा से लेना चाहते हैं।”, वे कहते हैं।

लाल कुआँ में आक्रमण का शिकार हुआ मंदिर

पुलिस के लिए चुनौतियाँ

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से बातचीत कर जिस तरीके से वर्षों से हिंदू-मुस्लिम विवाद सुलझाए जा रहे हैं, उसमें कई खामियों का पता चला। यह समस्या आज के शीघ्र मैसेजिंग के ज़माने में और बड़ी हो गई है, वे कहते हैं।

“भीड़, विशेषकर मुस्लिम भीड़ का छोटे विवादों के बदले के लिए इकट्ठा होना नई बात नहीं है। बड़ी मस्जिदों के बाहर पुलिस बल को तैनात करना हमारा काम है, विशे,कर अलीगढ़ जैसे संवेदनशील क्षेत्र में।”, उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं। “लेकिन पहले ऐसी हिंसा केवल शुक्रवार दोपहर को होती थी जब वे सभी नमाज़ के लिए इकट्ठा होते थे।”, उन्होंने कहा।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील जिले के पुलिस अधीक्षक ने अनाम रहने की शर्त पर यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि चांदनी चौक की घटना वॉट्सैप पर भड़काऊ संदेश से भीड़ के इकट्ठा होने के चलन को दर्शाती है।

भीड़ को पता है कि उनमें से कुछ एक ही गिरफ्तार होंगे, उन्होंने कहा। “व्यवहारिक रूप से भीड़ के सभी लोगों को गिरफ्तार करना असंभव है। कई किराये पर रहने वाले बाहरी होत हैं और वे हिंसा करने के बाद भाग जाते हैं।”, उन्होंने बताया।

ध्यान देने वाली बात यह है कि मथुरा मामले में दो नामों के साथ 15-20 अनाम व्यक्तियों पर एफआईआर द्ज होने के बावजूद पुलिस मात्र सात को ही गिरफ्तार कर पाई। बसाई दारापुर मामले में वीडियो में 10 लोगों से अधिक देखे जा सकते हैं लेकिन केवल चार ही गिरफ्तार हुए। चांदनी चौक मामले में 100 लोगों से अधिक की भीड़ होने के बावजूद 7 जुलाई तक मात्र 17 लोगों को गिरफ्तार किया गया था।

अधिकारी बताते हैं कि भीड़ के मुख्यतः तीन भाग होते हैं- पहले, अग्रिम लड़ाके जो हिंसा करते हैं, दूसरा दबाव बनाने वाली भीड़ जो उनका समर्थन करती है लेकिन स्वयं हिंसा नहीं करती और तीसरे भड़काने वाले लोग जो दूरी पर खड़े रहते हैं और घटना मेंउनकी कोई सक्रिय भागीदारी नहीं होती। “अधिकांश रूप से भड़काने वाले लोग समुदाय के विशिष्ट जन होते हैं- प्रभावशाली, धनवान या धर्म गुरु। वे कभी नहीं पकड़े जाते।”, उन्होंने कहा।

अग्रिम लड़ाके अधिकांशतः नाबालिग या 20 की आयु के आसपास के युवक होते हैं जो एक-तरफा धार्मिक प्रचार से प्रभावित होते हैं। यह उल्लेखनीय है कि चांदनी चौक में गिरफ्तार लोगों में लगभग आधे नाबालिग हैं।

अधिकारी ने बताया कि बदला लेने वाली भीड़ के अलावा हिंदू-विरोधी अपराधों पर हिंदू युवाओं द्वारा विरोध का चलन भी बढ़ रह है, जैसे लव जिहाद और गौहत्या के मामलों पर। कई बार वे गुंडागर्दी भी करते हैं और संपत्ति को नुकसान पहुँचाते हैं लेकिन ऐसे मामले में भी कम गिरफ्तारी ही होती है, उन्होंने बताया।

दिल्ली के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं कि निचले स्तर के हिंदू-मुस्लिम विवाद से निपटना सबसे कठिन होता है क्योंकि पुलिस कार्रवाई से बचने के लिए किसी एक पक्ष के लोग पुलिस बल पर पक्षपात का आरोप लगाने लगते हैं।

वे समझाते हैं, “ऐसे मामलों में दोनों पक्षों की एफआईआर दर्ज करनी होती है। भले ही यह एक तरफा हो कि कोई एक पक्ष भीड़ लेकर गया हो लेकिन दूसरे पर भी आत्म रक्षा में कदम उठाने के लिए मामला दर्ज होता है। दोनों पक्ष आक्रोशित होते हैं और पुलिस पर दबाव बनाते हैं।”, वे बताते हैं कि की बार निचले स्तर के पुलिसकर्मी कानून की बरीकियों को नहीं समझते और गलतियाँ कर बैठते हैं।

अधिकारी की इस बात को बसाई दारापुर मामले में देखा जा सकता है। पीड़ित के बेटे के अनुसार परिवार पर हत्या की कोशिश का मामला दर्ज किया गया है क्योंकि आत्म रक्षा के लिए उन्होंने बाथरूम वाइपर का प्रयोग किया था। यह हथियारबद्ध भीड़ द्वारा उनके घर पर हमले के वीडियो के बावजूद हुआ है।

अधिकारी बताते हैं कि प्राथमिक पूछताछ से ही पीड़ितों के विरुद्ध दर्ज मामले को खारिज किया जा सकता है लेकिन सांप्रदायिक मामलों में पुलिस ऐसा करने से झिझकती है और यह जाँच स्तर तक जाता है। उप्र के पुलिस अधिकारी ने इस बात की पुष्टि का और कहा कि जिला प्रशासन से लेकर राजनीतिक पार्टियों तक अपने स्वार्थ के लिए कोई नहीं चाहता कि आरोप-पत्र दर्ज हो, “फिर पुलिस भी धीरे ही चलती है।”, वे बताते हैं।

2 जुलाई को हौज़ क़ाज़ी क्षेत्र में तैनात पुलिस

क्या राज्य के पास कोई समाधान है?

अधिकारी दो समाधान बताते हैं। पहला कि निचले स्तर के पुलिसकर्मियों को नागरिकों के साथ बेहतर व्यवहार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। “पुलिसकर्मी ऐसी हिंसक भीड़ से उलझना नहीं चाहते हैं क्योंकि उनपर ज्यदतियों का आरोप लगता है और उनके विरुद्ध अनुशासनिक कदम उठाया जाता है। भीड़ को यह पता है।”, उप्र पुलिस अधिकारी बताते हैं।

“सेना की तरह पुलिस के पास निश्चित शत्रु नहीं होता है, उन्हें नागरिकों से निपटना होता है और उनसे ऐसा व्यवहार करना होता है जैसे वे अपराधी नहीं हैं। जब किन्हीं परिस्थितियों में वे लाठी चार्ज करते हैं, तब उनपर बाद में विभाग द्वारा कार्रवाई की जाती है।”, उन्होंने कहा।

दूसरा, अमन समितियों में बदलते समय के साथ युवाओं को भी सम्मिलित किया जाए। अमन समिति स्थानीय नागरिकों का समूह होता है जो पुलिस के साथ ऐसी परिस्थितियों में काम करता है जब लोग आक्रोशित होते हैं, इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के प्रभावशाली व्यक्ति होते हैं।

दिल्ली पुलिस के अधिकारी बताते हैं कि ये समितियाँ अपनी उपयोगिता खो रही हैं। “उन्हें युवाओं का प्रतिनिधित्व और नाबालिगों एवं किशोरों का ध्यान आकर्षित करना चाहिए। जब तक युवा शांति में विश्वास नहीं रखेंगे, तब तक कोई शांति नहीं होगी।”, उन्होंने कहा।

आईआईटी कानपुर में अपराधिकी के आगंतुक प्राध्यापक अरविंद वर्मा कहते हैं कि नारेबाज़ी और गुंडागर्दी प्रशासन और सरकार में उनके विश्वास का खोना दर्शाता है और इसलिए युवाओं से संबंध स्थापित करने की तत्काल आवश्यकता है।

वर्मा पुलिस को समस्या केंद्रित पुलिसिंग के लिए सुझाते हैं जो स्थानीय समुदायों को सक्रिय और सशक्त करे ताकि वे ऐसे भीड़ हमलों को रोक पाएँ। “ऐसी समुदायों को एफआईआर, जाँच और विवाद के हल में सम्मिलित कर इसे सुनिश्चित किया जा सकता है।”, पहले इंडियाना विश्वविद्यालय, ब्लूमिंगटन में पढ़ा चुके वर्मा ने कहा।

“आदर्श रूप से राजनीतिक दलों को यह भूमिका निभानी चाहिए लेकिन वे अपनी स्वार्थसिद्धि में लगे रहते हैं। पुलिस को ही इससे निपटना है तो बेहतर होगा कि वे इसके लिए पहले से सक्रिय रहें।”, वे कहते हैं।

दूसरी तरफ मौलाना दहलवी का कहना है कि ऐसी हिंसाओं के रोकथाम के लिए राज्य मीडिया को इन घटनाओं में सम्मिलित लोगों की पहचान उजागर करने से रोके। “उन लोगों के नाम उल्लेखित करने से कोई लाभ नहीं होता है, केवल सांप्रदायिकता को हवा मिलती है। अपराध कम करने की बजाय, यह समुदायों में कलह उत्पन्न करता है।”, वे कहते हैं।

नेवार भी मीडिया के विशिष्ट वर्ग को बदला लेने वाले भीड़ हमलों का दोष देते हैं। “डरा हुआ मुसलमान के कथात्मक (नैरेटिव) का प्रचार किया जा रहा है। कोई डाटा इसकी पुष्टि नहीं करता है लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका प्रभाव देखा जा सकता है।”, वे कहते हैं।

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं और वे @swati_gs से ट्वीट करती हैं।