भारती
पीड़ा को धैर्यपूर्वक झेलना, दूसरों को पीड़ा न पहुँचाना ही सच्ची तपस्या है- कुरल भाग 11

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला में पढ़ें तपस्या और असुद्ध जीवन के विषय में।

तपस्या

जब कुरल लिखे गए थे तब दक्षिण भारत में तपस्वी का जीवन जीने की प्रथा प्रचलित थी। तिरुवल्लुवर इसका विरोध नहीं करते हैं, बल्कि तार्किक रूप से ऐसे जीवन के गुण तत्वों को उजागर करते हैं।

पीड़ा को धैर्यपूर्वक झेलना और दूसरों को पीड़ा न पहुँचाना ही सच्ची तपस्या है।

स्वयं को पीड़ा पहुँचाकर प्राप्त अलौकिक शक्तियाँ छोटी पड़ जाती हैं और स्वयं पर आने वाली पीड़ा को धैर्यपूर्वक झेलने वाली शक्ति का ही मुल्य होता है।

जिसे तपस्या करने का अवसर मिलता है, वह धन्य है। जो तपस्या के लिए उपयुक्त नहीं होते हैं और खुद को पीड़ा पहुँचाकर तपस्या करते हैं, उनके लिए यह तपस्या व्यर्थ है।

यहाँ परोक्ष रूप से एक चेतावनी दी जा रही है कि गृहस्थ जीवन को हीन न समझें।

सोने को जितना तपाओ, वह उतना ही अधिक चमकता है। उसी प्रकार जो अपनी आत्मा को अनुशासित करने के लिए जितनी पीड़ा झेलते हैं, वे उतने ही अधिक चमकते हैं।

जिस व्यक्ति ने स्वयं पर वश कर लिया है, वह पूरे ब्रह्मांड में पूजनीय है।

जो अपनी इंद्रियों के वश में नहीं होता है, उसका अपने जीवन पर पूर्ण वश होता है। अन्यथा हम शरीर को आत्मा का दास बनाने की बजाय आत्मा शरीर की दासी बन जाती है।

अशुद्ध जीवन

यदि किसी के हृदय में चोर है और वह अपने ब्रह्मचर्य का उल्लंघन करता है तो उसके शरीर के पाँच तत्व उसके इस निष्फल धोखे का उपहास करते हैं।

स्मरण हो कि आपके भीतर पाँच साक्षी हैं जो आपके इस गुप्त और लज्जित अपराध को देख रहे हैं। कवि कहते हैं कि केवल सर्व विद्यमान ईश्वर ही नहीं बल्कि आपके शारीरिक तत्व भी तिरस्कार की भावना से आप पर हँसते हैं।

पवित्रता या साधुत्व का बाह्य आडंबर क्यों जब आपके अंतर्मन में निहित अपराध-भाव से आप बच नहीं सकते?

जो कमज़ोर इच्छा शक्ति वाला व्यक्ति शक्ति का बाह्य आडंबर रचता है, वह एक पीड़ित गाय की तरह होता है जो चोरी-चुपके किसी के खेत का मक्का खाने के लिए बाह्य की खाल ओढ़ लेती है।

लोग सोचते हैं कि संत ने अपने शरीर पर वश कर लिया है और वह अपने शरीर के आपराधिक भावों के समक्ष नहीं झुकेगा। इसी कारण उसे गुप्त अपराध करने का अवसर मिल जाता है।

यदि कोई व्यक्ति अपने आप को संत के रूप में प्रतिष्ठित करके चोरी-चुपके गलत करता है तो वह उस कुटिल शिकारी की तरह है जो झाड़ियों में छुपकर भोले पंछियों को पकड़ता है।

एक सीधा तीर क्रूर होता है और वहीं एक वक्र वीणा मधुर गीत सुनाती है। हम किसी का आँकलन उसके रूप के आधार पर नहीं अपितु आचरण के आधार पर करें।

विश्व जिसकी निंदा करता है, उससे बचें। यदि आप इसमें सफल हुए तो न तो आपको अपना सरम मुंडवाना होगा और न ही दाढ़ी बढ़ानी होगी।

सन्यासी अपने पंथानुसार या तो सर मुंडवाते हैं या दाढ़ी बढ़ाते हैं। पवित्रता उन्हें संत बनाती है, यह बाहरी रूप नहीं।