भारती
राम मंदिर के लिए संघर्ष क्यों स्वतंत्र भारत का पहला जन आंदोलन जो निम्न वर्गों तक पहुँचा

राम मंदिर के लिए पाँच सदियों के संघर्ष का अंत है 5 अगस्त को हुई भूमि पूजा जहाँ अब हिंदू अपने सबसे पवित्र स्थल पर अधिकार जमाकर मंदिर बना सकेंगे।

यह संघर्ष बहुत लंबा था, कई बार निराशा से भरा भी। यह संघर्ष ब्रिटिश राज के आने एवं इस्लामी साम्राज्यवाद के पतन के बाद और बढ़ गया क्योंकि तब हिंदू अपने पवित्र स्थल तक जा सकते थे। स्वतंत्रता के बाद यह संघर्ष अपने पूर्ण रूप में आ गया और फिर जनमानस को गतिशील करने व संगठित अभियानों से इस संघर्ष को लोकतांत्रिक रंग मिला।

आंदोलन का नेतृत्व पहले रामचंद्र परमहंस कर रहे थे जो राम जन्मभूमि न्यास और अन्य हिंदू समूहों के प्रमुख थे। अशोक सिंघल के नेतृत्व में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के परिदृश्य में प्रवेश से आंदोलन का स्तर बढ़ गया। 1980 के दशक में लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व मे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी इस आंदोलन से जुड़ गई और राम मंदिर को पुनः स्थापित करने के लिए कोलाहल बढ़ गया।

यह आंदोलन अभूतपूर्व था, यह उतना ही धार्मिक था जितना सामाजिक और राजनीतिक था। आंदोलन की तीव्रता और विस्तार ने 1947 से भारत के भाग्य का निर्धारण करने वाले सत्ताधारी अभिजात वर्ग को चकित कर दिया और अपनी विचारधारा के साँचे में उसे ढालने की माँग की।

जबसे राम मंदिर आंदोलन शुरू हुआ, वह सबसे निम्न स्तर पर उपस्थित लोगों से जुड़ा रहा था। यह उन लोगों का आंदोलन था जो स्थानीय बोलियाँ बोलते थे, छोटे गाँवों-कस्बों में रहते थे, अंग्रेज़ी बोलने वाले अभिजातों द्वारा संरक्षित सत्ता और बौद्धिक गलियारों तक उनकी कोई पहुँच नहीं थी।

यह आंदोलन ग्रामीणों, निर्धनों और नए उभरते हुए मध्यम वर्ग का था जो अपने लिए एक राजनीतिक स्थान चाहता था। जिस गति से इस आंदोलन का विस्तार हुआ, दर्शाता है कि नेहरूवादी अधिष्ठानों के विरुद्ध यह एक लोकप्रिय आंदोलन था जिसमें निम्न वर्ग के लोगों का अभिजातों के प्रति आक्रोश भी था।

भारत के हिंदुत्व आंदोलन के लिए भी राम मंदिर आंदोलन एक महत्त्वपूर्ण मोड़ रहा। इस आंदोलन से पहले हिंदू हितों को दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) में सक्रिय भागीदारी नहीं मिलती थी। हिंदू हितों की बातें केवल धार्मिक संस्थानों तक सीमित थीं या ज़्यादा से ज़्यादा ऊपरी जाति के लोग इससे जुड़ते थे। लेकिन राम मंदिर आंदोलन ने सभी हिंदू जातियों को जोड़ा।

भगवान राम के प्रति आस्था कभी भी जाति, क्षेत्र या भाषा की बाध्यता में नहीं रही। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन में भी भगवान राम प्रमुख देव थे, सगुण और निर्गुण रूपों दोनों में। भक्ति आंदोलन ने भेदभाव, सामाजिक रूढ़ियों और धार्मिक अलगाववाद को चुनौती दी थी जिससे इसे हर जाति में स्थान मिला था। आज भी कई राम भक्ति संप्रदायों के प्रमुख निम्न जातियों से आने वाले लोग ही हैं।

विद्वानों और एक्टिविस्ट द्वारा रामायण की जो आलोचना होती है, उसका जनमानस पर कोई प्रभाव नहीं हुआ और राम के प्रति आस्था वैसी ही बनी रही। यह तब से और प्रचंड हो गई जबसे तुलसीदास ने अवधी में रामायण- रामचरितमानस लिखी।

इस काव्य ने राम को जाति और समुदाय की सीमाओं से परे उत्तर भारत के हर घर तक पहुँचाया। भक्ति आंदोलन पर इसने छाप छोड़ी और हर संप्रदाय में राम को सार्वभौमिक देवता बना दिया। जिस तरह से भगवान राम ने मध्यकाल में हिंदू समाज को जोड़ा, उसी प्रकार 20वीं शताब्दी में उन्होंने हिंदुओं को पुनः जोड़ा।

कई छोटी दलित और ओबीसी जातियों के लिए स्वतंत्रता के बाद राम मंदिर आंदोलन पहला ऐसा अवसर था जिसने उन्हें मुख्यधारा की राजनीति में गतिशील किया। पहली बार वे देश के राजनीतिक मानचित्र पर उभरकर आए और राजनीतिक दलों के मस्तिष्क में अपनी जगह बनाई। इसने उनका राजनीतिकरण कर उन्हें गतिशील किया और हिंदू पहचान के अधीन स्थान दिलाया।

यह ऐसे ही नहीं हुआ कि कल्याण सिंह, उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा जैसे नेता राम मंदिर आंदोलन का चेहरा थे। राम मंदिर के कारण ही भाजपा निम्न जातियों के बीच अपना स्थान बना सकी और केशव प्रसाद मौर्य, विजय सोनकर, विनय कटियार एवं साक्षी महाराज जैसे नेता उभरे।

यह आंदोलन इतना शक्तिशाली इसलिए हुआ क्योंकि इसे निम्न जातियों का समर्थन प्राप्त था और इसने नेहरूवादी अधिष्ठानों के घमंड को चूर-चूर किया। स्वतंत्र भारत की राजनीति को राम मंदिर आंदोलन ने मूल रूप से परिवर्तित कर दिया। राजनीतिक रूप से दरकिनार भाजपा को मुख्यधारा में आने का अवसर मिला, हिंदुत्व का सामाजिक क्षेत्र बढ़ा और जाति की सीमाओं से बाहर हिंदू वोट बैंक का निर्माण हुआ।

समय के साथ इसने वामपंथ-उन्मुखी सेक्युलर शैक्षिक और बौद्धिक चर्चा को भी ध्वस्त किया और ऐसे वाद-विवाद के लिए द्वार खोले जिसे वामपंथ दरकिनार करके रखना चाहता था। न्यायिक सुनवाइयों और ‘प्रमुख इतिहासकारों’ के बयानों ने इतिहास लेखन की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े किए और पुरानी शिक्षा पर विश्वास को ध्वस्त किया।

राम मंदिर आंदोलन एक धार्मिक आंदोलन से हमेशा कई अधिक रहा है। यह हिंदू सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन था जिसके साथ बहुत कुछ हुआ- ऐतिहासिक गलतियों पर चर्चा, निम्न वर्गों की गतिशीलता, सामाजिक अभियांत्रिकी और भारत के भविष्य पर पुनर्विचार।

ये सभी चीज़ें राम मंदिर के निर्माण के लिए मंदिर न्यास के बढ़ते कदमों में सांकेतिक रूप से देखी जा सकती हैं। एक प्रकार से पाँच सदियों के संघर्ष का अंत हिंदू समाज और राजनीति के नए भविष्य की आधारशिला रख रहा है।