भारती
डीएफसी होंगे भारतीय रेलवे की बड़ी छलांग, मालढुलाई के अलावा भी बहुत कुछ बदलेगा

अगले 30-40 वर्षों में समर्पित मालवाहक गलियारों (डीएफसी) के विस्तार और महत्त्व को समझने के लिए थोड़ी कल्पना की आवश्यकता है।

पृथक देखन पर पूर्वी समर्पित मालवाहक गलियारा (ईडीएफसी) या पश्चिमी समर्पित मालवाहक गलियारा (डब्ल्यूडीएफसी) को आर्थिक सामर्थ्य और सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लाने वाली परियोजनाओं के रूप में देखा जा सकता है लेकिन अगर सभी गलियारों को साथ जोड़कर देखें तो पाएँगे कि 1947 से यह भारतीय रेलवे की सबसे बड़ी छलांग होगी जो भारत की स्वतंत्रता के 100वें वर्ष, 2047 तक भारत के मालवाहक परिदृश्य को पूर्ण रूप से बदलकर रख देगी।

सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन समझने के लिए दिल्ली मेट्रो और डीएफसी में तुलना करें। 2002 में जब दिल्ली मेट्रो पहली बार व्यावसायिक रूप से चलाई गई तो एक लाइन पर छह स्टेशन थे और मार्ग 8.3 किलोमीटर लंबा था। यह केवल अभियांत्रिकी का एक नमूना थी और कोई सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन लेकर नहीं आई। आज, 17 वर्षों बाद दिल्ली मेट्रो के 12 लाइनों पर 260 स्टेशन हैं और कुल 340 किलोमीटर लंबे नेटवर्क पर प्रतिदिन 50 लाख यात्री यात्रा करते हैं।

ऐसा ही डीएफसी के साथ होगा। इसके विस्तार की अभी कल्पना नहीं की जा सकती है।

कुछ आँकड़े

दीर्घ अवधि में भारतीय रेलवे गोल्डन क्वाड्रिलेटरल के आसपास उच्च क्षमता और उच्च गति गलियारे बनाना चाहती है। चार गलियारे गोल्डन क्वाड्रिलेटरल की परिधि पर होंगे और दो इसे बीचोंबीच काटेंगे। इस प्रकार कुल संख्या छह होगी।

वर्तमान गोल्डन क्वाड्रिलेटरल

पहले चरण के लिए दो गलियारे चयनित किए गए हैं। पहला ईडीएफसी जिसकी लंबाई 1,800 किलोमीटर है और यह पंजाब के लुधियाना से हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड को पार करता हुआ पश्चिम बंगाल के दानकुनी तक जाएगा।

निर्माणाधीन पूर्वी समर्पित मालवाहक गलियारा (उत्तर प्रदेश से चित्र)

दूसरा गलियारा है डब्ल्यूडीएफसी जो 1,500 किलोमीटर लंबा है। यह उत्तर प्रदेश की दादरी को मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) से जोड़ेगा। डब्ल्यूडीएफसी उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र से गुज़रेगा।

इन दो गलियारों के अलावा भविष्य में चार और बनाए जाएँगे। पहला पश्चिम-पूर्व गलियारा जो महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को पार करेगा। इसकी लंबाई 2,000 किलोमीटर होगी।

उत्तर-दक्षिण गलियारा 2,173 किलोमीटर लंबे मार्ग पर बनाया जाएगा। यह दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश से गुज़रते हुए तमिलनाडु के चेन्नई पर समाप्त होगा।

पूर्व-पूर्व गलियारे की भी घोषणा हुई है जो 1,100 किलोमीटर के तटीय मार्ग पर चलेगा। पश्तिम बंगाल से शुरू होकर ओडिशा, आंध्र प्रदेश से गुज़रते हुए यह चेन्नई में समाप्त होगा। अंत में एक दक्षिण-दक्षिण गलियारा भी है जो चेन्नई से शुरू होकर आंध्र प्रदेश और कर्नाटक से गुज़रकर गोवा पर जाकर समाप्त होगा। बेंगलुरु से मंगलुरु के बीच इसकी एक अतिरिक्त शाखा का भी प्रस्ताव है।

इन छह गलियारों की कुल लंबाई 9,500 किलोमीटर होगी। परिदृश्य समझने के लिए देखें कि 1950 में भारतीयरेल नेटवर्क 53,596 किलोमीटर लंबा था जो 2018 तक 67,368 किलोमीटर किया गया यानी की 68 वर्षों में 13,772 किलोमीटर का विस्तार।

डीएफसी के साथ अगले दस वर्षों में केंद्र सरकार लगभग 10,000 किलोमीटर नेटवर्क में जोड़ना चाह रही है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि चीन ने अकेले 2015 में 9,000 किलोमीटर की नई रेलवे लाइन बनाई थी।

2013-14 में भारतीय रेलवे ने 8.4 अरब फेरों के साथ 1.05 अरब टन माल ढोया था। 1947 में ब्रिटिश राज से  विरासत में मिले रेल नेटवर्क से ही 90 प्रतिशत माल ढोया जाता था। लेकिन अगले दशकों में रेलवे पर निवेश धीमा होता चला गया।

1991 के सुधारों के बाद भारत में मालढुलाई बढ़ी लेकिन रेलवे की भागीदारी घट गई। 1990 की दशक के शुरुआत में जो भागीदारी 62.6 प्रतिशत थी, वह इसके अंत तक 39 प्रतिशत ही रह गई। इसी बीच सड़क भागीदारी 37.4प्रतिशत से बढ़कर 61 प्रतिशत हो गई।

2007-08 में मालढुलाई में रेल की भागीदारी 33 प्रतिशत और सड़क की 67 प्रतिशत थी। सड़क मालढुलाई के अपने लाभ थे लेकिन अब ट्रैफिक और प्रदूषण की समस्या परेशानी का कारक बन गई है। रेलवे अपनी क्षमता में विकास नहीं कर पाई और सारा भार सड़क पर जाता रहा।

फेरों के किलोमीटर से देखें तो दो-तिहाई रेलवे सेवा का उपयोग यात्री करते हैं और देरी के अन्य मार्गों और ट्रेनों पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए दूसरे मार्ग की आवश्यकता थी जो डीएफसी प्रदान करेंगे। डीएफसी उन्नत डिज़ाइन ट्रेनों के साथ क्षमता को भी बढ़ाएँगे।

सामान्य मालढुवाई के लिए अधिकतम ऊँचाई 4.265 मीटर तय है लेकिन ईडीएफसी के लिए 5.1 मीटर और डब्लयूडीएफसी के लिए 7.1 किलोमीटर की अनुमति होगी। चौड़ाई भी 3.2 मीटर के स्थान पर 3.6 मीटर होगी। ट्रेन की लंबाई को भी 700 मीटर की सामान्य लंबाई से बढ़ाकर डीएफसी के लिए 1,500 मीटर किया जाएगा।

भारवाहक क्षमता 4,000 टन से बढ़ाकर 15,000 टन की जाएगी। वर्तमान में ट्रेनों की औसत गति 75 किलोमीटर प्रति घंटा है लेकिन डीएफसी पर ट्रेनें 100 किलोमीटर प्रति घंटा की गति से चल सकेंगी। स्टेशनों की बीच की दूरी को भी वर्तमान के 7-10 किलोमीटर से बढ़ाकर 40 किलोमीटर कर दिया जाएगा।

भारतीय रेलवे को पुनः महान बनाएँगे डीएफसी

डीएफसी के कई लाभ होंगे। सबसे पहला, वे सड़कों की भीड़ को कम करेंगे। इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) अभी भी शुरुआती दौर में हैं लेकिन अगर 2035 तक भारी डीज़ल वाहनों के स्थान पर ईवी आ गए तो सड़क पर भीड़ की समस्या बनी रहेगी।

दूसरा, 2007-08 में नेट टन किलोमीटर (एनटीकेएम) के अनुसार मालढुलाई में सड़क की 50.1 प्रतिशत भागीदारी थी। अधिक राजमार्गों से हो सकता है सरकार अधिक एनटीकेएम का वहन कर पाएगी लेकिन बढ़ता ई-क़मर्स क्षेत्र 2022 तक अनुमानित रूप से 1 खरब डॉलर का हो जाएगा और 2030 तक खुदरा व्यापार का 8 प्रतिशत हिस्सा होगा। ऐसे में मालढुलाई के लिए आर्थिक रूप से बेहतर मार्गों की आवश्यकता होगी।

तीसरा, 2025 तक 5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को पूरा करने के लिए रसद समस्या का समाधान करना होगा। ईडीएफसी के सीधे लाभार्थी होंगे उत्तर और पूर्वी भारत के ऊर्जी और भारी विनिर्माण उद्योग क्योंकि वे मालढुलाई और वितरण के लिए रेलवे पर आश्रित रहते हैं।

इन दोनों गलियारों के बन जाने से कोयला, अनाज, लोहे, स्टील, सीमेंट और ऊर्वरक से संबंधित उद्योगों को लाभ मिलेगा। इन गलियारों के बनने से मार्ग पर वेयरहाउस क्षेत्र को भी बल मिलेगा, विशेषकर स्टेशनों के निकट।

चौथा, विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के पास स्वयं के डीएफसी हैं। चीन के नए डीएफसी का डिज़ाइन अंदरुनी क्षेत्रों से बंदरगाहों को जोड़ने के लिए किया गया है। साथ ही उनका उद्देश्य सामान, कच्चा माल और अन्य प्रमुख संसाधनों का उत्तरी क्षेत्र और दक्षिणी क्षेत्र के बीच स्थानांतरण भी है।

अंततः  प्रश्न भारतीय रेलवे के भविष्य का है। रेलवे निजी ट्रेन चलाने का प्रयास कर रही है और ऐसा करने के लिए बिना विलंब वाले नेटवर्क की आवश्यकता होगी एवं उसके लिए आवश्यक है मालढुलाई और यात्री सवारी के लिए अलग मार्ग।

डीएफसी परियोजना भारतीय रेलवे के लिए बड़ी छलाँग केवल इसकी लंबाई के कारण ही नहीं बल्कि इसलिए भी है कि यह जो तकनीक लेकर आएगी, जो इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करेगी और परिणामस्वरूप जो आर्थिक-सामाजिक परिवर्तन आएगा।

आज से 20-30 वर्षों बाद भारत की मालढुलाई के लिए डीएफसी अपरिहार्य होने वाले हैं। निजी से सार्वजनिक, सभी कंपनियों के मध्य डीएफसी की माँग होगी। विभिन्न क्षेत्रों के विकास में इसका क्या योगदान होगा, वह देखना रोचक होगा।

अगर इस दशक में डीएफसी को सफलतापूर्वक पूरा किया गया तो स्वतंत्र भारत की किसी भी सरकार की यह सबसे बड़े उपलब्धि होगी। यह उपलब्धि ऐसी है जो मोदी सरकार अपनी विरासत के रूप में छोड़कर जाना चाहेगी।