भारती
क्या है ओडीएफ++ का दर्जा और कैसे पुणे नगर निगम करेगा इसे प्राप्त

मार्च 2019 के एक सर्वेक्षण में पुणे को हैदराबाद के साथ भारत में रहने के लिए सबसे योग्य शहर माना गया था। इसकी प्रमुख अर्हताओं में से स्वच्छता भी एक थी। जनवरी 2018 में खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) शहर का दर्जा पाने के बाद जनवरी 2019 में पुणे ने ओडीएफ+ का भी दर्जा प्राप्त किया। अब यह ओडीएफ++ के दर्जे के लिए प्रयासरत है।

इस दर्जे के लिए पुणे क्या कर रहा है, यह जानने से पहले हमें इन दर्जों की आवश्यकताओं को जानना ज़रूरी है। ओडीएफ दर्जे के लिए आवश्यक है कि किसी भी दिन एक भी व्यक्ति खुले में शौच करता हुआ न पाया जाए व हर व्यक्ति की पहुँच के दायरे में घर में अथवा सामुदायिक या सार्वजनिक शौचालय हो।

ओडीएफ+ के दर्जे के लिए इन सभी आवश्यकताओं के अलावा एक और बात जुड़ जाती है कि सभी सामुदायिक व सार्वजनिक शौचालय क्रियाशील और कुशल रख-रखाव के अधीन होने चाहिए। सार्वजनिक स्थलों के निकट शौचालय, जनसंख्या के अनुपात में शौचालयों की संख्या, किसी समारोह की स्थिति में मोबाइल शौचालय की व्यवस्था और मोहल्ले व रहवासी क्षेत्रों के स्तर पर शौचालय भी आवश्यक हैं।

इन सभी आवश्यकताओं को पुणे ने पूरा किया होगा, तब ही उसे ओडीएफ+ का दर्जा मिला है। प्रावधान है कि शहर दर्जा स्वघोषित करने के बाद तीसरी पार्टी द्वारा जाँच का निवेदन राज्य सरकार से करता है और यह जाँच शहरी मामले मंत्रालय द्वारा भेजी गई स्वतंत्र तीसरी पार्टी करती है।

जाँच संतोषजनक पाए जाने पर स्वीकार्यता प्रमाण-पत्र दिया जाता है जिसकी वैधता छह महीनों की होती है। इस अवधि की समाप्ति पर पुनः जाँच होती है और प्रमाण-पत्र अगले छह महीनों के लिए नवीनीकृत (रिन्यू) किया जाता है।

ओडीएफ++ दर्जे के लिए स्वघोषणा करने से पहले आवश्यक है कि शहर को कम से कम एक बार ओडीएफ+ का दर्जा मिला हो। पुणे इस अर्हता पर खरा उतरता है। पुणे नगर निगम के कूड़ा प्रबंधन विभाग के प्रमुख ज्ञानेश्वर मोलक ने ओडीएफ++ दर्जे को स्वघोषित करने के लिए 15 दिसंबर का लक्ष्य रखा है।

स्वच्छ भारत मिशन की ओडीएफ पुस्तिका में ओडीएफ++ दर्जे के लिए ओडीएफ+ की आवश्यकताओं को पूरा करने के अलावा सीवेज के सुरक्षित व कुशल प्रबंधन और निस्तारण की बात कही गई है। इसके तहत सीवेज को खुले स्थानों या जल निकायों में बिना उपचार के नहीं डाला जाना चाहिए।

पुणे के सार्वजनिक शौचालय

इस दर्जे के लिए कुल सामुदायिक और सार्वजनिक शौचालयों में से 25 प्रतिशत शौचालयों में विशेष सुविधाएँ होनी चाहिए। अनुलग्नक 1ब के अनुसार इन विशेष सुविधाओं में हाथ सुखाने के लिए यंत्र (हैंड ड्रायर) अथवा नैपकिन, नहाने की सुविधा, महिला शौचालयों में सैनिटरी नैपकिन, वायु सुगंधक (एयर फ्रेशनर), आदि सम्मिलित हैं।

मोलक ने स्वराज्य  को दूरभाष पर बताया कि पुणे में 1,224 सामुदायिक व सार्वजनिक शौचालय हैं जिस अनुसार न्यूनतम 306 शौचायलों में विशेष सुविधा देने का दायित्व नगर निगम पर है।

“310 शौचालयों की हमने सूची बनाई और वहाँ पर कार्य किया जा रहा है। हमने रिपेयर और रंगाई का काम किया है।”, मोलक ने कहा। उनके अनुसार इन शौचालयों में कुल 53 बिंदुओं का ध्यान रखना है और कई में ये सुविधाएँ पहले से ही हैं। शेष में इन अतिरिक्त सुविधाओं को जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

सीवेज ट्रीटमेंट के विषय में उन्होंने बताया कि वर्तमान में पुणे में पाँच मलजल उपचार संयंत्र (एसटीपी) हैं जिनकी कुल क्षमता 573 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) की है। इसके अलावा जो घर सीवर लाइन से नहीं जुड़े हैं व सेप्टिक टैंक का उपयोग करते हैं, उनके मल (स्लज) का प्रबंधन व उपचार पूर्णतः प्रावधानों के अनुसार नियमित रूप से होता है।

अपने दल के साथ निरीक्षण कार्य पर ज्ञानेश्वर मोलक (सबसे दाएँ)

इसी बीच हम एक समाचार पाते हैं कि पुणे नगर निगम के मुला, मुठा और मुला-मुठा नदियों के संगम के पुनर्विकास हेतु 2,619 करोड़ रुपये की परियोजना को राज्य सरकार की पर्यावरण मूल्यांकन समिति ने स्वीकृति दे दी है। जल्द ही पर्यावरण विभाग से स्वीकृति मिलने के बाद इस परियोजना पर कार्य प्रारंभ हो जाएगा।

साबरमती रीवरफ्रंट के तहत बनने वाली इस परियोजना में मुला-मुठा नदी को इसलिए चुना गया क्योंकि मुंबई की मिठी नदी के बाद यह महाराष्ट्र की दूसरी सबसे प्रदूषित नदी है। इस परियोजना के अंतर्गत 11 नए एसटीपी बनाए जाएँगे जो 2027 तक नगर की आवश्यकता की पूर्ति कर सकेंगे। इसके अलावा 113.6 किलोमीटर लंबी सीवेज लाइन भी डाली जाएगी।

नदी के किनारे लोगों को शौच करने से रोकने के लिए स्लम क्षेत्रों में 24 सामुदायिक शौचालय बनाए जाएँगे। नदी के प्रवाह पर निगरानी रखने के साथ-साथ जागरूकता अभियान भी चलाए जाएँगे। नदी के जल की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सीवर का मार्ग रोककर और परिवर्तित करके उसे उपचार के लिए भेजा जाएगा।

पुणे के स्वच्छता जागरूकता अभियान का एक नमूना

पुणे में अभी 97 प्रतिशत घर सीवेज लाइन से जुड़े हुए हैं, नगर निगम ने बताया। जो नई लाइनें बिछाई जा रहीं हैं, वे अधिकांश रूप से इन नालों को एसटीपी से जोड़ने के लिए हैं। उपचार जल को छोड़ने के लिए सिंचाई विभाग से अनुबंध किया गया है।

नगर निगम का दावा है कि पिछले 10-15 वर्षों में किसी सफाई कर्मचारी को हाथों से मैला नहीं ढोना पड़ा है। इसपर सफाई कामगार आयोग निगरानी रखता है। सफाई कर्मचारियों को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) दिए जाते हैं और ठेकेदारों के लिए भी ऐसा करना अनिवार्य है।

ओडीएफ++ दर्जे के लिए एक और चीज़ आवश्यक है कि कहीं भी ओवरफ्लो या लीकेज कि स्थिति में छह घंटों के भीतर निवारण किया जाए। इसके लिए नगर निगम ने कर्मचारी नियुक्त किए हैं और ठेकेदार भी इसका ध्यान रखते हैं।

स्वच्छता सर्वेक्षण का समय निकट आते-आते सभी शहर अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि 2017 में पुणे को 13वाँ और 2018 में 10वाँ स्थान प्राप्त हुआ था। लेकिन 2019 में इसकी रैंक गिरकर 37वीं हो गई थी। इसके पीछे का कारण भले ही मोलक ने दस्तावेज बनाने में कमी बताई थी लेकिन स्थानीय समाचार पत्रों में भी कई बार स्वच्छता से समझौते की बात उठाई गई है।

पुणे नगर निगम का लोगो ध्यान आकृष्ट करता है। घोड़े पर सवार छत्रपति शिवाजी महाराज और पीछे दुर्ग पर लहराता मराठा ध्वज। इसके ध्येय वाक्य है- “वरं जनहितं ध्येयम्” जिसका अर्थ हुआ कि केवल जनहित का ध्येय।

स्वच्छता जनहित का एक बड़ा माध्यम है। इस विचार को स्वच्छ भारत अभियान से बल मिला और स्वच्छ सर्वेक्षण ने शहरों के मध्य एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया। हाल ही में नागपुर ने ओडीएफ++ का दर्जा प्राप्त किया है जिसे 2019 सर्वेक्षण में 58वाँ स्थान मिला था। ऐसे में 37वें स्थान पर रहे पुणे के लिए यह कर पाना संभव होगा, नगर निगम के कर्मचारी आशावान हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree द्वारा ट्वीट करती हैं।