भारती
राज्य की संपन्नता, राजा की विशेषताओं और क्रिया के लिए सोच-विचार पर कुरल भाग-25

संपन्न राज्य

1. उपयुक्त सेना, कर्मशील लोग, भरपूर खाद्य संसाधन, बुद्धिमान और सतर्क मंत्री, अन्य राजाओं की मित्रता और समर्थ गढ़- इन छह चीज़ों से युक्त राजा दूसरे राजाओं के समक्ष एक शेर की भाँति होता है।

2. निडर, उदार, बुद्धिमान और उत्साहपूर्ण व्यक्ति राज करने के योग्य होते हैं।

3. अच्छे राजा में लगन, ज्ञान और साहस जैसे गुण आवश्यक हैं।

4. एक अच्छी सरकार कभी धर्म के मार्ग से नहीं डिगती है, बल्कि वह अपने राज्य से अधर्म को बाहर धकेल देती है और इसकी सैन्य गरिमा बनी रहती है।

5. एक राजा का धर्म है- संपत्ति उत्पन्न करना, संसाधनों का संरक्षण, राज्य की रक्षा और उपयुक्त व्यय। एक अच्छी सरकार इन सभी दायित्वों का निर्वहन करती है।

6. यदि राजा तक प्रजा की पहुँच हो और वह कठोर न हो तो राज्य की कीर्ति बढ़ती है।

7. यदि राजा विधान के अनुसार कार्य करे और प्रजा की रक्षा करे तो उसे ईश्वर समझा जाता है।

प्राचीन भारत में विधिनिर्माताओं ने कानून नहीं बनाया था, बल्कि शास्त्रों और व्यवहारिक परंपराओं के अनुसार राजा को विधान का पालन करना होता था।

8. प्रजा उस राजा के अधीन प्रसन्न रहेगी जिसमें अपने मंत्रियों के कड़वे परामर्श को सुनने का भी सामर्थ्य हो।

क्रिया

9. हर क्रिया में तीन तत्व होते हैं- हानि, प्राप्ति और मूल्य। इन तीनों तत्वों के परिमाण और गुण का आँकलन कोई भी कदम उठाने से पहले करना चाहिए।

10. विश्वसनीय परामर्शदाताओं के सुझाव पर उठाए गए कदम के लक्ष्य की प्राप्ति में कभी भी बाधा नहीं आएगी।

11. बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी किसी वस्तु की संभावित प्राप्ति के लिए ऐसा कदम नहीं उठाते हैं जिसमें पहले से प्राप्त वस्तु के खोने की संभावना हो।

बुद्धिमान व्यक्ति किसी दूसरी वस्तु की प्राप्ति की ओर बढ़ने से पूर्व पहले से प्राप्त की गई वस्तु का संरक्षण करते हैं।

12. पूरी तरह से सोचे-समझे बिना उठाए गए कदम शत्रु का ही लाभ करते हैं।

13. कोई भी कदम उठाने से पहले पूरी योजना बनाएँ। कदम उठाने के बाद बीच मार्ग में सोचना हानिकारक है।

14. पूरी योजना के बिना किसी कार्य पर लगाई गई ऊर्जा खाली जाएगी, भले ही आपने इसके लिए कितनी भी ताकत क्यों न लगाई हो।

15. राजस्व कम होना किसी राज्य के लिए दुर्भाग्यपूर्ण नहीं होता यदि उसके व्यय सीमित हों।

तमिल कवि तिरुवल्लुवर द्वारा तिरुकुरल में लिखे गए उपरोक्त कुरलों का भावार्थ सी राजगोपालाचारी ने 7 जून 1969 के स्वराज्य पत्रिका अंक में प्रकाशित किया था, जिसका हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है।

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