भारती
हिंदुओं से निपटने के विधान- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल भाग-3

इस्लामाबाद में इमरान खान ने कहा कि इस्लाम ने हमेशा दूसरे मजहबों की इज्जत करना सिखाया है। इसलिए ताकत के जोर पर या निकाह के जरिए किसी का मजहब बदलना इस्लाम की मूल भावना के खिलाफ है। बेहतर होता पाकिस्तान के वज़ीरे-आज़म यह भी साफ कर देते कि अतीत की किस सदी में उनके पुरखे कैसे “खान” बने थे और पहले वे खुद क्या थे? दरअसल सिंध में अगवा की जा रही हिंदू लड़कियों के जबरन धर्मांतरण की अंतर-राष्ट्रीय स्तर पर हो रही छीछालेदार पर इमरान खान ने यह चुटकुला सुनाया कि ज़बर्दस्ती मजहब बदलना इस्लाम के खिलाफ है।

रंगीन मिजाज़ के इमरान खान एक खिलाड़ी हैं, जो सियासत में चले आए। हमें नहीं पता कि उन्हें तारीख का इल्म कितना है? उन्हें मजहब की जानकारी पुख्ता नहीं है, यह उनके बयान से साफ है या वे झूठ बोल रहे हैं। उन्हें हाफिज़ सईद से पूछना चाहिए कि इस्लाम की निगाह में दूसरे मजहबों की जगह कहाँ है? इस्लामिक हुकूमत में वे कौन होते हैं, जो काफिर कहे जाते हैं? इमरान खान लाल मस्जिद के इमाम से जाकर पूछें कि जिम्मी किसे कहा गया है, जजिया किनसे लिया गया और माले-गनीमत में लूटी गई काफिर औरतों-बच्चियों के हिस्से किस फार्मूले से आपस में बाँटे गए? आइए हम भी झाँककर देखते हैं कि किसकी मूल भावना क्या है-

मोहम्मद गौरी की फौजों के हाथों पृथ्वीराज चौहान की हार और दिल्ली-अजमेर पर कब्जे के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक की ताजपोशी होती है, जो गौरी का एक खरीदा हुआ गुलाम था। यही पहला सुलतान हुआ। इसी से गुलाम वंश की शुरुआत मानी जाती है। यह हिंदुस्तान की बदकिस्मती ही कही जाएगी कि खरीदे हुए गुलामों ने इस मुल्क की गुलामी के सबसे शुरुआती अध्याय लिखे।

दिल्ली पर कब्जे के बाद शुरुआती हमलावरों के जत्थों में मजहबी जानकार भी कम नहीं थे, जो यह विधान तय करने में लग गए कि काफिरों के साथ अब यहां कैसा सुलूक किया जाना चाहिए। सुलतानों की हुकूमत बाबर के आने तक रही यानी 1193 से 1528 तक। उस वक्त हाफिज़ सईद जैसे इस्लाम के आलिम सत्ता के नए कब्जेदारों की शान में क्या फरमा रहे थे और काफिरों के बारे में उनके क्या ख्याल थे?

जियाउद्दीन बरनी भी उन्हीं में से एक है, लेकिन उसके पहले फखरे मुदब्बिर, जो 1164 के आसपास पैदा हुआ था। वह लाहौर में कुतुबुद्दीन एबक की ताजपोशी के समय मौजूद था। इतिहास में उसकी दो किताबों के जिक्र मिलते हैं। इनमें से एक है- ‘आदाबुल हर्ब वश्शुजाअत।’ यह किताब हिंदुस्तान पर काबिज होने वाले सुलतानों के लिए तय की गई इस्लामिक आचार संहिता है।

शुरुआत में ही वह कहता है- “पैगंबर ने कहा है कि बादशाहों के एक क्षण का न्याय उस इंसान के 60 साल की इबादत से कहीं अधिक है, जो सारी रात नमाज पढ़ता हो और दिन भर रोजा रखता हो।” उसने अल्लाह के नाम पर नेकी और न्याय की बातें भी शुरू में ही की हैं। उसने विस्तार से बताया है कि बादशाहों और वज़ीरों को कैसा होना चाहिए?

यह हिदायतें उस वक्त लिखी गईं जब लाहौर-दिल्ली पर कब्जा हुआ ही था और हिंदुस्तान में मुस्लिम हुकूमत शुरू हो चुकी थी। हुकूमत होनी थी करोड़ों बहुसंख्यक हिंदुओं पर। इसलिए फखरे मुदब्बिर जल्दी ही मुसलमानों के लिए नेकी और न्याय की दलीलें छोड़कर अपनी असलियत पर आता है।

वह कहता है- “युद्ध पाँच प्रकार के होते हैं। एक तो काफिरों से युद्ध। यह युद्ध बड़ा ही बेहतरीन होता है। यदि इसमें दूसरे का कत्ल करें तो गाजी होते हैं और खुद मारे जाएँ तो शहीद हो जाते हैं।” मुसलमानों के लिए उसकी एक अहम दलील है-” मुसलमानों के लिए जंग करना नमाज और रोजे की तरह ज़रूरी है।”

यह एक ऐसा समय था, जब लाहौर और दिल्ली में काबिज होने के बाद गुलाम वंश के सुलतान और उनके साथ आई इस्लामी फौज के जोशीले सरदारों को दूर-दूर तक कब्जे की बेहद जल्दबाज़ी थी। पृथ्वीराज चौहान से दो बार की आमने-सामने की जंग में बुरी तरह हार के बाद हासिल फतह उनके लिए एक तरह से सोच के परे थी। काफिरों का पूरा मुल्क खाली मैदान और छप्पन भोग की सजी हुई थाली की तरह उन्हें नज़र आया। सूखे और उजाड़ पहाड़ी या रेगिस्तानी इलाकों के इन हमलावर कबीलों की कल्पना के परे का देश था भारत।

वे सिर्फ यहाँ की बेहिसाब लूट और कब्जे की उम्मीदों के साथ यहाँ आए थे और सिंध के बाद हमलावरों की हर आगे बढ़ती पीढ़ी के साथ उनका लालच और कोशिशें ज्यादा से ज्यादा होती गई थीं। पहले सिंध हाथ से गया, फिर काबुल, फिर लाहौर और फिर दिल्ली…। उनके पास रिटर्न टिकट नहीं थे। वे बीमार रेगिस्तानी रियासतों में जाकर करते भी क्या?

फखरे मुदब्बिर जैसे कई आलिम कत्ल और लूट के सिलसिले को आगे ले जाने के लिए बाकायदा नियम-कायदे तैयार कर रहे थे। वह अपनी किताब के 25वें अध्याय में आकर तफसील से बताता है कि इस मुल्क में काफिरों से कैसे निपटना है? उसी की हिदायतें हैं, जिन पर बाद में पूरे ज़ोर से लगातार अमल किया गया। आप भी पढ़िए-

  • जानना चाहिए कि काफिरों से जंग एक बहुत बड़ा फर्ज है। मोहम्मद साहब ने कहा है कि यदि कोई दिन या रात में काफिरों से युद्ध करता है तो वह संसार की सभी वस्तुओं से बढ़कर है। गाजियों की कतार में पल भर के लिए खड़े होना 60 साल की इबादत के बढ़कर है।
  • मुसलमानों को लूट का माल खाना मजहबी तौर पर वाजिब है। फौजी, ऊँट, घोड़े, गाय, भेड़, गुलाम, धन-दौलत और हथियार जो कुछ भी लाएँ, उसमें से सुलतान पाँचवाँ हिस्सा ले ले। लूट के माल का पांचवा हिस्सा अल्लाह, रसूल, बेसहारा, गरीब और कारोबारियों का हक है।
  • काफिरों से जंग ज़रूरी है। मुसलमान दारुल-हर्ब में जाएं, किसी किले या शहर को घेर लें तो सबसे पहले उन्हें इस्लाम की ओर बुलाएँ। यदि वे इस्लाम कुबूल कर लें तो जंग न करें। यदि कुबूल न करें तो जज़िया लिया जाए। यदि जज़िया देना कुबूल कर लें तो जंग न करें। यदि इस्लाम या जज़िया कुबूल न करें तो जंग ज़रूरी है। उनका विनाश कर देना चाहिए।
  • यदि किसी शहर पर ताकत से कब्ज़ा जमा लिया है तो बादशाह को चाहिए कि ज़मीन मुसलमानों में बाँट दे। उनका खिराज तय कर दे। युद्ध में बंदी बनाए लोगों को चाहे कत्ल करा दे और चाहे तो गुलाम बनाकर रखे, चाहे तो छोड़ दे जिससे वे मुसलमानों की खिदमत करते रहें। बेकार उन्हें ज़िंदा हर्गिज न छोड़े।
  • गुलामों, औरतों, बच्चों और जिम्मियों को लूट के माल में कोई हिस्सा नहीं है। जिम्मियों को मुसलमानों के शहरों में घोड़े की सवारी की इजाज़त नहीं दी जाए।

इन तौर-तरीकों से इस्लाम कुबूल करने वालों की कमी नहीं रही होगी और आगे होते रहने वाले हर हमले में हारे हिंदुओं को यही विकल्प रखे गए। लेकिन तात्कालिक मजबूरी में जो लोग मुसलमान बन भी जाते थे, वे हमलों और लूट से राहत मिलते ही फिर से अपनी पुरानी परंपराओं में लौट आते थे या यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि सजा के तौर पर वे ऊपर से मुसलमान दिखने लगते थे लेकिन हज़ारों साल की अपनी संस्कृति और परंपरा तो उनकी जड़ों में ही थी, जो बुरा वक्त जाते ही अपने मूल रंग में आ जाती थी।

अपनी मूल पहचानें आज तक देश के कोने-कोने में राष्ट्रनिष्ठ मुसलमानों ने अपने उपनाम के रूप में अपना रखी हैं। उत्तरप्रदेश में हजारों मुसलमान चौहान, त्यागी और राणा लिखते हैं। राजस्थान में राठाैड़, नागौरी और चौहान, कश्मीर में पंडित, भट्‌ट और डार (जो मूलत: धर हैं), बंगाल में चौधरी, विस्वास और सरकार, गुजरात में देसाई और पटेल, महाराष्ट्र में इनामदार, देशमुख और मोडक जैसे देश के हर कोने में हजारों उदाहरण हैं।

ज़ाहिर है उस समय यह नए हुक्मरानों और उनके आलिमों के लिए एक चुनौती थी कि कैसे धर्मांतरित लोगों को हमेशा के लिए इस्लाम के रास्ते पर कड़ाई से बांधकर रखा जाए। अगर कोई अपनी मूल परंपरा में लौटता था तो उसे मुरतद कहा जाता था। आलिमों और हुक्मरानों यानी मजहबी नेताओं और सियासत के तख्त पर बैठने वालों की संयुक्त जुगलबंदी, जो हमेशा से इस्लाम में एकरूप रही है।

यह सियासत और मजहब का एक अजीबो-गरीब घालमेल है, जो आध्यात्मिकता से शून्य है। किसी भी धर्म की यात्रा विचार से शुरू होती है और अनुभूति के स्तर पर वह अपना प्रमाण पेश करती है। भारत में प्रचलित धर्मों ने आध्यात्मिक अनुभूति के स्तर को छुआ और यह हजारों साल की यात्रा था। यह कोई चार-छह सदियों में पनपा एक जिद्दी विचार नहीं था, जिसे हिंसक राजाओं ने मार-मारकर लोगों के गले उतार दिया।

दिल्ली में काबिज इस नई “मजहबी-सियासत” या “सियासी-मजहब” के लिए यह किसी हिसाब को पूरा करने जैसा पुख्ता इंतजाम था कि धर्मांतरितों को पक्के तौर पर ईमान का पक्का बनाए रखा जाए। मुदब्बिर कहता है– “जो कोई इस्लाम को छोड़कर मुरतद हाे जाए, उसका तीन दिन इंतजार करना चाहिए। इसके बाद उसे इस्लाम कुबूल करने के लिए कहना चाहिए। अगर वह कुबूल कर ले तो अच्छा है वर्ना उसका कत्ल कर देना चाहिए। वह अपने धन-दौलत का मालिक तभी हो सकता है जब इस्लाम कुबूल करे।”  मुदब्बिर के अनुसार इस्लाम में एक-दूसरे को भेजे जाने वाले तोहफों की लंबी फेहरिस्त में बर्तन, तलवार, ढाल, तीर-कमान, जिरह, चंदन, रेशमी कपड़े, शेर-चीते की खालें, शिकारी कुत्तों में सबसे ऊपर हिंदू गुलाम और कनीजें भी शामिल हैं।

हर जंग के लूट के माल में यह कनीजें बेहिसाब होती थीं, जो किसी न किसी फौजी के हिस्से में आती रहीं थीं। बाद में जिनके बच्चे और बच्चों के बच्चे भी हाेते ही होंगे और तेजी से बढ़ती आबादी में ये नस्लें भी मरते-कटते यहाँ-वहाँ फैलती रही होंगी। आज के हिंदुस्तान में किन चेहरों में इस नस्ल की तलाश की जाए? आज के जिन्ना, जिलानी, जरदारी, गिलानी, आजाद, अब्दुल्ला, आजम, उस्मानी, औवेसी, भट्‌ट, भुट्टो, इरफान, इमरान, इकबाल, इमाम, खान, सलमान, सुलेमान, जावेद, जफर, हबीब, हाफिज और मुफ्तियों की बल्दियतें पीछे कहां जाकर किससे जुड़ती होंगी?

हत्यारे हमलावरों से अपनी एकमुश्त बल्दियतें जोड़ना एक खुशनुमा वहम है। दरअसल इतिहास की खूनखराबे से भरी सड़ांध गुमशुदा याददाश्त में दफन है। अतीत के तहखानों में झांककर देखने की बजाए बाहर यह तमगा टांगना ज्यादा मुनासिब है कि कि हम तो ईरान से या अफगानिस्तान से फलां-ढिकां सुलतान या बादशाह के वक्त हिंदुस्तान आए थे। हमारे पुरखे बड़े योद्धा या आलिम थे या हमने किसी सूफी की संगत में मजहब बदला! एक हजार साल के समय के खांचों में उन्हें अपने किन पुरखों पर गर्व और किन पर शर्म और किन पर गुस्सा होना चाहिए, यह विचारणीय है।

फखरे मुदब्बिर ने इस्लाम की दृष्टि से वह बताया जो इस्लाम के सुलतानों, बादशाहों, नवाबों और निजामों को अमल करना था। यहां गंगा-जुमनी रवायत की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। हिंदुस्तान और हिंदुओं से कैसा सुलूक किया जाना है, यह स्पष्ट हिदायतें 34 अध्यायों में लिखकर यह किताब उसने इल्तुतमिश को भेंट की। इल्तुतमिश गुलाम वंश का दूसरा सुलतान था, जो कुतुबुद्दीन एबक की लाहौर में चौगान खेलते वक्त हुए मौत के बाद बना।

यह वह समय था, जब पृथ्वीराज चौहान और उनके पहले सदियों से स्थापित हिंदू राजवंशों की कहानियाँ हाशिए पर जा रही थीं। इस समय वह पीढ़ी ज़िंदा थी, जिसने पृथ्वीराज चौहान की हार और उसके बाद तुर्कों की फौजों के हाथों हुई दिल्ली और अजमेर की तबाहियों के किस्से सुने ही नहीं होंगे, बल्कि वे शुरुआती भुक्तभोगी भी थे। हिंदुओं के प्रति गहरी नफरत इन दस्तावेजों में भरी पड़ी है।

राज्यों के लिए भारतीय राजाओं की जंग पहले भी होती रही थीं, लेकिन रियाया को भी गाजर-मूली की तरह काटने या अपने हिसाब से हाँकने की यह एक अजीब आसुरी जिद थी, उस समय जिसका अहसास शायद ही दिल्ली, अजमेर या आसपास के गाँव-कस्बों और शहरों के हिंदुओं को होगा। वे तो बस भविष्य के होने वाले धीमी गति के शिकार थे।

गुनगुने पानी में बैठे हुए मेंढक की तरह, जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए तापमान की गरमी के अनुकूल खुद को करता जाता है और उसी में उबलकर खत्म हो जाता है लेकिन एक छलांग लगाकर बाहर नहीं आता। छोटे-बड़े हजारों हिंदू राज्य गुनगुने पानी में खुद को अनुकूल किए रहे। बीच-बीच में कहीं छलांगें भी लगीं, लेकिन उबलते पानी के सैलाब में वे बहुत असरदार साबित नहीं हो सकीं।

दिल्ली में पैर जमाते ही इल्तुतमिश की फौजों ने आसपास के इलाकों में धावे मारने शुरू कर दिए थे। इन शुरुआती हमलों का एक शिकार राजस्थान का जालौर शहर भी था, जहाँ का घेरा डाला गया। दिल्ली में सद्रुद्दीन हसन निजामी नाम के एक ऐसे ही दस्तावेज लेखक ने जालौर में इल्तुतमिश से भिड़ने वाले हिंदू राजा का नाम उदीशाह लिखा है, जिसने हार के बाद अपना सिर सुलतान के कदमों में रख दिया और 100 ऊँट, 20 घोड़े सुलतान की शान में पेश किए।

वह लिखता है कि सुलतान जब दिल्ली लौटा तो उसके पहुँचने पर गगनचुंबी मंदिरों का नाम भी शेष नहीं रहा, कुफ्र के अंधेरे से इस्लाम की रोशनी चमक उठी! इसका मतलब यही है कि आज की दिल्ली के महरौली इलाके में सदियों पुराने 27 मंदिरों को तोड़े जाने का काम पूरा हो गया था। यहीं कुतुबमीनार और वह मस्जिद आकार लेने लगी थी, जिसे कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद कहा गया। 800 साल बाद आँख के अंधे भी पत्थरों को टटोलकर बता सकते हैं कि ये मंदिरों के मलबे से बनी इमारतें हैं।

निजामी ने “ताजुल मआसिर” नाम की किताब में दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के शुरुआती सालों के ब्यौरे (1205-1217) लिखे हैं, जो बताते हैं कि इस्लाम की अराजक और लालची फौज में पहली कतार के सरदार आपस में हिंदुस्तान की बेहिसाब दौलत को सामने पाकर किस तरह छीना-झपटी करने लगे थे। वे धोखे से इलाके भी हथिया रहे थे और लूट के माल पर कब्जे कर रहे थे।

ज्यादातर सरदार खुद तख्त पर बैठने के ख्वाहिशमंद थे। कोई भी खुद को सुलतान से कम नहीं समझ रहा था। अब जिसमें ताकत थी, वह बाकी के कत्ल के बाद ही माले-गनीमत का असली हकदार था। सुलतान को अपनी ही फौज के अपने साथ आए इन तुर्की बागियों से भी लड़ना, भिड़ना, मारना और काटना पड़ा।

इतिहास के ये ब्यौरे एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं, जब आपको लगेगा कि हिंदुस्तान एक तरह से शिकारी कुत्तों, भेड़ियों और लकड़बग्घों के बीच घिर चुका था। ये बेरहम विजेता आपस में भी एक-दूसरे को नोचने-काटने लग गए थे। जिसके मुंह में मांस या हड्‌डी का जितना टुकड़ा पड़ जाए, वह लपककर भाग रहा था और चार दूसरे उसका गला दबाने के लिए भागते थे।

इल्तुतमिश के बाद एक और खरीदे हुए बदसूरत गुलाम की बारी आई। उसका नाम था बलबन। जब वह तख्त पर बैठा तो दिल्ली से निकलने वाले उसके शानदार काफिले में सड़कों के दोनों तरफ लंबी कतार में चलने वाले हथियारबंद जोशीले जवान जब गला फाड़कर चिल्लाते थे तो नारों का शोर दो कोस दूर तक दिलों में दहशत भर देता था! हिंदुस्तान का मुस्तकबिल तय हो चुका था।

(अगले भाग में पढ़िए दिल्ली पर कब्जे के बाद खूनखराबे और कत्लेआम का अंतहीन सिलसिला कैसे शुरू हुआ।)

और पढ़ें- हिंदुओं के खिलाफ पहला दरबार- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल का भाग-2

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com