भारती
प्रदीप भंडारी के लिए केवल चुनाव नहीं, जनमत समझना है असली राजनीतिक विश्लेषण

आशुचित्र- चुनावों से आगे राजनीतिक विश्लेषण को परिभाषित करना चाहते हैं प्रदीप भंडारी।

कहीं न कहीं आप लोगों ने मीडिया का आम जन से अलगाव महसूस किया होगा। आपको लगा होगा कि मीडिया में वे बातें नहीं दिखाई जा रही हैं जो एक आम व्यक्ति के लिए वास्तव में चिंता का विषय है। मीडिया में हो रही चर्चाएँ कुछ तथाकथित संभ्रांत और बुद्धिजीवियों तक ही सीमित हैं।

यही बात जन की बात के संस्थापक प्रदीप भंडारी ने भी महसूस की और हाथ पर हाथ धरकर बैठने की बजाय उन्होंने एक पहल कर मीडिया जगत में क्रांति लाने का प्रयास किया। उनके जीवन का यह मोड़ 2016 के संविधान दिवस से आया जब वे टेलीविज़न पर डिबेट सुन रहे थे। बचपन से वाद-विवाद में रुचि रखने वाले प्रदीप को यह बात खटकी कि इस डिबेट का जनता से कोई वास्ता नहीं है।

इसके बाद उन्होंने फ़ेसबुक से जन की बात नामक शो की शुरुआत की जिसे 25-30,000 लोगों ने देखा। लोगों के बीच इसकी बढ़ती लोकप्रियता से उनका प्रोत्साहन बढ़ा और लोगों के लिए एक मीडिया मंच की अवधारणा के साथ उन्होंने जन की बात की स्थापना की। उनका उद्देश्य था कि अधिकतम ग्राउंड रिपोर्टें प्रस्तुत की जाएँ।

इस उद्देश्य की पूर्ति में उनके पास ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले कई रिपोर्टर तैयार हो गए जिससे लोगों का मत समझने सामर्थ्य उनके पास आ गया। यह सामर्थ्य कितना सक्षम है वह तो आपने झारखंड विधानसभा के चुनावों के एक्ज़िट पोल में देख लिया जब उनका अनुमान परिणामों पर एकदम सटीक बैठा, लेकिन इसकी शुरुआत 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से हुई थी।

स्वयं प्रदीप ने चुनावी लहर को परखने के लिए उत्तर प्रदेश के हर भाग का भ्रमण किया और ऐसा मॉडल तैयार किया जो विभिन्न पार्टियों की सीटों का अनुमान लगा सके। उत्तर प्रदेश के बाद उन्होंने त्रिपुरा, कर्नाटक और राजस्थान के चुनावों में भी सही और साहसिक एक्ज़िट पोल जारी किए जो शायद ही कोई कर पाया।

प्रदीप का सर्वेक्षण मॉडल केवल फॉर्म भरने पर आधारित नहीं है बल्कि वे और उनकी टीम लोगों से चर्चा करके उनके विचार समझती है। प्रोबैबिलिटी मैप ऑफ़ आउटकम नामक यह मॉडल उप-चुनावों से लेकर बड़े चुनावों में भी सही परिणाम देने में सक्षम है। इसकी विशेषता यह है कि यह सिर्फ संख्या नहीं देता बल्कि सीट विशेष पर रुझान और किन मुद्दों का प्रभाव रहा यह भी बताता है।

अभी तक प्रदीप कुल 15 चुनावों में सही परिणाम देने में सफल हुए हैं। गत महाराष्ट्र और हरियाणा चुनावों में उनका अनुमान सटीक नहीं बैठा लेकिन इसने भी उन्हें अपने मॉडल को और बेहतर करने की प्रेरणा दी। महाराष्ट्र से उन्होंने सीखा कि छवि आधारित पूर्वाग्रह से कैसे प्रभावित न हुआ जाए।

वहीं हरियाणा को वे अपनी हार नहीं मानते क्योंकि वहाँ चुनावों में कम मतदान होने के कारण उनका अनुमान गलत निकला। साथ ही उन्होंने बबीता फोगट और भाजपा राज्य अध्यक्ष सुभाष बराला की हार का सही साहसिक अनुमान लगाया था। हालाँकि फिर भी वे हल ढूंढ रहे हैं कि कैसे मतदान प्रतिशत में होने वाले बदलाव को मॉडल में सम्मिलित किया जाए।

इन सब बातों से हम यह न समझें कि प्रदीप का उद्देश्य केवल एक्ज़िट पोल के माध्यम से चुनाव परिणामों का सही अनुमान निकालना है। प्रदीप का मूल उद्देश्य राजनीतिक विश्लेषण की वैश्विक स्तर की परिभाषा को प्रभावित करना है। लेकिन जब वे एक सुरक्षित जीवन छोड़कर राजनीतिक पत्रकारिता के क्षेत्र में आए तो एक्ज़िट पोल अनुमानों ने उन्हें आय का साधन प्रदान किया। इस दिशा में अरनब गोस्वामी और रिपब्लिक के मंच ने भी उनकी सहायता की।

प्रदीप के लिए राजनीतिक विश्लेषण केवल कुछ नेताओं से चर्चा नहीं है, उनके लिए प्राथमिक डाटा सबसे महत्त्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि आम व्यक्ति से जानकारी लेकर, उसपर विचार करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए। उनमें छोटी-छोटी बातों पर गौर करने की कला है।

जैसे हाल ही में दिल्ली के रामलीला मैदान में हुई मोदी की रैली के विषय में उन्होंने स्वराज्य  को बताया कि प्रधानमंत्री ने एक बार भी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का नाम नहीं लिया क्योंकि वे उनकी लोकप्रियता के बारे में जानते हैं। ज़मीनी स्तर पर कार्य करके प्रदीप कह सकते हैं कि ये चुनाव जितना केजरीवाल केंद्रित होगा, उतना भाजपा को नुकसान होगा।

केवल संख्या नहीं बल्कि अन्य कारकों पर आधारित प्रदीप का विश्लेषण बताता है कि किसी भी चुनाव को जीतने का मार्ग विभिन्न स्थानों और अलग-अलग समय पर अलग कारणों से होकर गुज़रता है। वे यह भी बताते हैं मत प्रतिशत और सीट शेयर का सीधा संबंध नहीं होता, जैसा कि आमतौर पर माना जाता है।

उदाहरण देते हुए वे समझाते हैं कि एक ही समय पर हुए लोकसभा चुनाव में भी अलग-अलग राज्यों में भाजपा की बहुमत के अलग कारण थे जैसे उत्तर प्रदेश में अंतिम छोर तक सुविधा का पहुँचना, मध्य प्रदेश में आवास और राजस्थान-बिहार में राष्ट्रवाद की भावना। साथ ही मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अधिक मत प्रतिशत के बावजूद कांग्रेस सीटों की होड़ में आगे निकल गई।

प्रदीप का निकट लक्ष्य भले ही दिल्ली के एक्ज़िट पोल में झारखंड की सफलता दोहराना हो लेकिन उनका दूरगामी लक्ष्य जन की बात को भरपूर ग्राउंड रिपोर्टों से एक ऐसा मंच बनाना है जो किसी भी मुद्दे पर भारतीय जनता का मत आगे रख सके। साथ ही अपनी राजनीतिक समझ का उपयोग वे राजनीतिक सलाहकार बनकर करना चाहते हैं। उनके लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 35 वर्ष से कम आयु के युवाओं वाली उनकी ऊर्जावान टीम तैयार है।

स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक निष्ठा अनुश्री और प्रदीप भंडारी की चर्चा पर आधारित लेख।