भारती
निर्धनता के संघर्ष, श्रम और कृषि के महत्त्व पर तिरुवल्लुवर के कुरल भाग- 24

निर्धनता

निर्धनता को निम्न दोहे में समझा गया है-

1. हर सुबह इस विचार के साथ आँख खुलती है कि अस्तित्व के लिए फिर संघर्ष करना होगा।

कल मैंने उसका सामना किया। क्या दूसरा दिवस शुरू हो गया है और फिर मुझे उसी राह पर चलना है? ये उस व्यक्ति का कथन है जिसे भय है कि पिछले दिवस के संघर्षों को आज भी जीना होगा।

2. ज़रूरतमंद व्यक्ति के मुँह से निकला सत्य वज़नी नहीं होता व अप्रभावशील होता है।

3. केवल माँ का प्रेम ही है जो निर्धनता से प्रभावित नहीं होता। बल्कि संतान की निर्धनता देखकर थोड़ा बढ़ता ही होगा।

4.यदि सहायता का पात्र कोई निर्धन व्यक्ति न होता तो जीवन केवल कठपुतली के खेल जैसा होता।

यहाँ कवि का आशय है कि ऐसे में जीवन केवल भौतिक रह जाता और आत्मा को झकझोरने वाली कोई घटना न होती।

5. यदि सहायता करने वाला व्यक्ति उदार हृदयी और समाज के प्रति दायित्व समझता हो तो सहायता प्राप्त करना भी सुखद और सुंदर बन जाता है।

श्रम

6. यदि संसार का विधान यही होता कि कुछ लोग दूसरों पर आश्रित ही रहेंगे तो सृजनकर्ता को भी एक भिखारी बनने का अभिशाप मिल जाता।

7. अपने श्रम से कमाए गए भोजन से अधिक मधुर और कोई खाद्य पदार्थ नहीं है, चाहे वह दलिया ही क्यों न हो।

8. कुछ देने के लिए अनिच्छुक व्यक्ति के मुँह से निकला ‘ना’ मांगनेवाले के लिए विष और मृत्यु जितना घातक है। आश्चर्य की बात यह है कि यह विष जिसके मुँह से निकला, उसे हानि नहीं पहुँचाता।

कृषि

9. कई उद्योग आते हैं लेकिन अंततः संसार कृषि पर ही आश्रित है। इसलिए कई कठिनाइयों के बावजूद भी कृषि सबसे योग्य व्यवसाय है।

10. खेत जोतने वाले ही इस पृथ्वी की धुरी हैं। उन्हीं पर अन्य व्यवसाय करने वाले लोगों का जीवन निर्भर करता है।

11. अगर किसान श्रम करना बंद कर देंगे तो संसार त्याग चुके सन्यासियों का ध्यान भी भंग हो जाएगा।

अगले अंक में जारी…

उपरोक्त कुरलों का भावार्थ सी राजगोपालाचारी ने मई 1969 में स्वराज्य पत्रिका में प्रकाशित किया था, जिसका हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है।

पिछला भाग- निर्लज्ज व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुए कवि कहते हैं वे सौभाग्यशाली होते हैं- कुरल भाग 23