भारती
केला किसानों के लिए समस्या बना राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन, हुआ विकल्पों का अभाव

कोरोनावायरस (कोविड-19) के कारण देशव्यापी लॉकडाउन ने बागवानी किसानों को सामान्य रूप से परेशान किया है, विशेषकर केला किसानों को।

“फूलों की खेती के अलावा केला और टमाटर जैसी बागवानी फसलों को लॉकडाउन के कारण काफी नुकसान हुआ है। कटाई के बाद फसल का परिवहन एक चुनौती है, वहीं कटाई के लिए श्रमिकों को ढूंढना दूसरी।”, तमिलनाडु के थेनी जिले के कच्चानूर ग्राम के एक कृषक आर कोट्टईचामी ने बताया।

पूवन कदली जैसे केले जो देश के प्रमुख व्यावसायिक केलों में से एक हैं व मैसुर एएबी नाम से जाने जाते हैं। चेन्नई की खुदरा दुकानों पर ये भले ही 60 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर बेचे जाते हैं लेकिन किसानों को इनके लिए काफी कम मूल्य मिलता है।

“किसी भी किस्म के केले के लिए हमें प्रति किलोग्राम 5 से 10 रुपये ही मिलते हैं। सामान्य समय में हम कदली के प्रति किलोग्राम पर 20 रुपये कमाते हैं।”, कोट्टाईचामी ने कहा।

कदली केले का पेड़

“जिन केलों की किस्मों पर हमें पहले 32 रुपये प्रति किलोग्राम मिलते थे, उनपर अब 7 रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहे हैं। इतने कम मूल्य पर भी बहुत कम खरीददार बचे हैं।”, तमिलनाडु के तिरुनलवेली जिले के वल्लीयूर ग्राम के किसान एम सुब्रमणियन ने बताया।

“केला उगाने में हम प्रति एकड़ पर 2 लाख रुपये खर्च करते हैं। एक केले के पौधे पर 200 रुपये खर्च करने के बाद हमें 15 किलोग्राम के एक केले के गुच्छे पर 400 रुपये मिलते हैं।”, त्रिची केला किसान संघ के उपाध्यक्ष टीके चंद्रशेखरन ने कहा।

तमिलनाडु देश का 14वाँ सबसे बड़ा केला उत्पादक है और 2017-18 (जुलाई-जून) के आउटपुट का अनुमान 32 लाख टन लगाया गया है। “लाले केले और नेंद्रन किस्मों को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। उनका मूल्य भी अब 10 रुपये प्रति किलोग्राम ही आँका जा रहा है।”, कोट्टईचामी ने बताया।

नेंद्रन केला

लॉकडाउन के कारण श्रमिक उपलब्ध नहीं हैं जो केलों को काटकर बाज़ारों तक पहुँचा सकें। “केले काटने के लिए कोई उपलब्ध नहीं है। ये काम बिहार, उत्तर प्रदेश और अन्य उत्तरी राज्यों से आए मज़दूर करते थे लेकिन अब वे लौट चुके हैं।”, कोट्टईचामी ने कहा।

जो श्रमिक उपलब्ध हैं, वे पुलिस के प्रतिबंध के कारण खेतों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं। “वाहन से हम अपने माल को बाज़ार तक पहुँचा सकते हैं लेकिन पुलिस वाहनों को भी हमारे खेतों तक नहीं आने दे रही है।”, थेनी किसान ने बताया।

थेनी में एक परिवहन वाहन चालक की पिटाई ने मामले को किसानों के लिए जटिल कर दिया है क्योंकि अब कोई भी ऐसा खतरा उठाकर वाहन चलाना नहीं चाहता है। इसी प्रकार कार्य के लिए आते-जाते तीन-चार श्रमिकों की हिरासत ने भी समस्या खड़ी की थी।

“खरीददार भी कम बचे हैं और ऐसे में हमारे केले पककर हमारी आँखों के सामने सड़ रहे हैं। उन्हें चिड़िया और कौवे खा रहे हैं।”, चंद्रशेखरन ने कहा।

किसानों के लिए एक बड़ी समस्या यह है कि केले सबसे तेज़ी से उपयोग में लाए जाने की माँग करने वाली फसलों में से एक हैं और उन्हें लंबे समय तक संचित करके नहीं रखा जा सकता है। “हम केवल केले खाकर जीवित नहीं रह सकते।”, कहते हुए चंद्रशेखरन ने बताया कि कई किसानों के बड़े परिवार केले की खेती पर ही आश्रित हैं।

कोट्टईचामी ने कहा कि केलों की कटाई में विशेष कौशल आवश्यक होता है क्योंकि सिर्फ केलों को पेड़ से काटनी ही नहीं, बल्कि वाहनों तक पहुँचाना भी होता है, वहाँ उन्हें जमाना होता है और ऐसे उपाय भी करने होते हैं कि यातायात के दौरान वे खराब हुए बिना बाज़ार तक पहुँच सकें।

वल्लीयूर गाँव के सुब्रमणियन का कहना है कि केलों की खरीद की परिवर्तित पद्धति ने भी किसानों को प्रभावित किया है। “पहले दलाल केले के एक गुच्छे को 300 रुपये की दर पर खरीदते थे। अधिकांशतः हम कम दर के बावजूद भी दलालों को ही केले बेचते थे उनकी विश्वसनीयता के कारण। लेकिन अब पद्धति बदल गई है और दलाल हमें प्रति किलोग्राम के भाव से पैसे देते हैं।”, उन्होंने कहा।

सामान्यतः दलाल 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर खरीदते हैं जो बाज़ार की दर से कम है। “इस प्रकार हम हर गुच्छे पर 150 रुपये कम कमा पाते हैं। अगर हहम सीधे खरीददार को बेचेंगे तो इस नुकसान से कुछ हद तक बच पाएँगे।”, सुब्रमणियन ने बताया।

थेनी और तिरुनलवेली क्षेत्र के किसानों की दूसरी समस्या यह है कि स्थानीय खरीद के कम होने के कारण अब उनका कदली का लगभग पूरा उत्पाद केरल जाता है। “हमारे सभी कदली केलों का निर्यात किया जाता था।”, सुब्रमणियन ने कहा।

कोरोनावारस के फैलाव के कारण सभी निर्यात रुक गए हैं। “कोई भी देश किसी भी वस्तु के आयात और निर्यात की अनुमति नहीं दे रहा है। अब विकल्प में हमारे पास निर्यात बाज़ार नहीं बचा है।”, कोट्टईचामी ने बताया।

वहीं दूसरी ओर नकद उपलब्धता में कमी के कारण केलों की खरीद लोगों की आखिरी प्राथमिकताओं में से एक है। “नकद तरलता कम है, लोगों की प्राथमिकता चावल, सब्ज़ियों और दूध की खरीद है। केला खरीदने वाले कम ही लोग बचे हैं।”, कोट्टईचामी ने कहा।

सुब्रमणियन का कहना है कि कदली जैसे केले या तो निर्यात किए जाते हैं या विवाह जैसे समारोहों में उनका उपयोग होता है। “अब दोनों ही विकल्प नहीं बचे हैं तो व्यावहारिक रूप से यह केला खरीदने वाला कोई नहीं है।”, उन्होंने बताया।

सड़े हुए केलों को भी काटने वाले श्रमिकों को खोजना कठिन काम है। “जब हम श्रमिक ढूंढने जाते हैं तो उनके ठेकेदार कहते हैं कि उनके पास मज़दूर नहीं हैं। लेकिन जब हम अतिरिक्त रुपये देने को तैयार हो जाते हैं तो वे श्रमिकों की व्यवस्था कर देते हैं।”, सुब्रमणियन ने कहा।

केलों के खेत का कोई काम हो या केलों की कटाई, पुरुष श्रमिकों को तीन घंटों के लिए 400 रुपये मिलते हैं और महिला श्रमिकों को चार घंटों के लिए 250 रुपये।

“पहले महिलाएँ केले कटाई की क्रिया में सहयोग करती थीं। अब वे इस काम के लिए उपलब्ध नहीं हैं। श्रमिकों की उपलब्धता के लिए कुछ किसान उत्तर से परिवार ला रहे हैं जो कम से कम दो मज़दूर दे सकें।”, सुब्रमणियन ने बताया।

कोट्टईचामी के अनुसार खेत पर काम को जारी रखना है और अब वे सीमित हाथों से किए जा रहे हैं। “मुझे चार-पाँच गाँवों से खेत में काम करने के लिए फोन आता है पर मैं सबकों काम पर नहीं रख सकता।”, उन्होंने कहा।

सीमित संसाधनों से खेतों पर काम होता है और उत्पादक चिंतित हैं कि लॉकडाउन कब तक चलेगा। “45-50 दिनों की फसल की अवधि होती है। लोगों को स्थिति स्पष्ट नहीं है।”, कोट्टईचामी ने बताया।

10 वर्ष पहले किसानों ने ऐसी ही समस्या का सामना किया था जब तेज़ हवाओं के कारण पेड़ उखड़ गए थे। “उस समय द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम सरकार ने प्रति पेड़ एक रुपये का मुआवज़ा दिया था।”, चंद्रशेखरन ने कहा।

“निस्संदेह ही कोरोनावायरस को रोकने के लिए केंद्र ने काफी काम किया है। राज्य सरकार हमारा उत्पाद खरीदकर हमारा सहयोग कर सकती है या हमें वित्तीय सहायता दे सकती है।”, एमफिल किए हुए सर्वश्रेष्ठ केला किसान माने जाने वाले चंद्रशेखरन ने बताया।

कोट्टईचामी का कहना है कि बागवानी किसानों का अवस्था और खराब है। “अगर फूल बिनने वाला कोई नहीं है तो फसल नष्ट हो जाती है।”, टमाटर 5 रुपये प्रति किलोग्राम से भी कम पर बिक रहे हैं बताते हुए उन्होंने कहा।

चंद्रशेखरन ने बताया कि पिछले कुछ दिनों में थोड़ी राहत मिली है क्योंकि कुछ आवागमन को अनुमति मिली है लेकिन अब भी मूल्य बहुत कम हैं। अब वे परिस्थिति में सुधार के लिए 20 अप्रैल की प्रतीक्षा कर रहे हैं।