भारती
प्रधानमंत्री आवास योजना कहीं आर्थिक सहयोग, कहीं निजी क्षेत्र की साझेदारी से दे रही घर

सस्ते ऋण, आर्थिक सहायता, सरकारी प्रयास और निजी क्षेत्र का सहयोग- सभी तैयार हैं हर भारतवासी को आवास उपलब्ध कराने के लिए। 25 जून 2015 को शुरू हुई प्रधानमंत्री आवास योजना ने अब तक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से 1.12 करोड़ घरों की मांग को वैध माना है और 96.5 लाख घरों के निर्माण को स्वीकृति भी दे दी गई है।

चार छोरों पर कार्य करके सभी को आवास देने की 2022 की समय-सीमा की ओर बढ़ा जा रहा है। योजना के चार पहलू हैं- झुग्गी (स्लम) पुनर्विकास, सस्ते ऋण, साझेदारी से परियोजना और लाभार्थियों को सहायता राशि। इसमें दो पहलू जहाँ व्यक्तिगत स्तर पर सहायता करते हैं, वहीं अन्य दो (पहला और तीसरा) सामूहिक परियोजना पर कार्य के लिए प्रेरित करते हैं।

साझेदारी से सस्ते घर

तीन राज्यों- कर्नाटक, गुजरात और राजस्थान में साझेदारी आधारित 21 परियोजनाएँ पहले ही स्वीकृत हो चुकी हैं। इसके तहत न्यूनतम 250 घरों की परियोजना में 35 प्रतिशत आर्थिक रूप से कमज़ोर (ईडब्ल्यूएस) लोगों के लिए घर होना आवश्यक है। ऐसे में सरकार प्रति ईडब्ल्यूएस घर के लिए 1.5 लाख रुपये देती है।

बेंगलुरु आधारित जनाधार कंपनी ने सस्ते घरों की दो परियोजनाओं को पूरा किया है। कंपनी ने बेंगलुरु के अतिबेले में 5-8 लाख रुपये वाले 480 1बीएचके व 19-22 लाख रुपये वाले 648 2बीएचके फ्लैट बनाए। साथ ही गुजरात के गांधी नगर में 10 लाख रुपये वाले 330 1बीएचके फ्लैटों का बी कार्य पूरा किया।

सरकार से मिलने वाली सहायता के विषय में जनाधार ने मेल पर स्वराज्य  को बताया कि 2017-18 के केंद्रीय बजट से लाभ हुआ जहाँ सस्ते घरों को भी इंफ्रास्ट्रक्चर का दर्जा दिया गया। इससे आयकर अधिनियम की धारा 80 आईबीए के तहत 31 मार्च 2020 तक स्वीकृत होने वाले घरों के लिए कर में छूट मिली। साथ ही पीपीपी मॉडल के प्रति सरकार की उन्मुखता ने अनुमति प्रक्रिया को भी आसान किया।

इस प्रकार की परियोजनाओं में सामान्य घरों की बिक्री खुले बाज़ार में की जाती है और सरकार की सहायता से बने घर कंपनी व सरकार के बीच हुए अनुबंध की शर्तों के आधार पर बेचे जाते हैं। साथ ही महिला के नाम पर घर और अनुसूचित जाति/जनजाति के परिवारों को प्राथमिकता दी जाती है।

तकनीक होती है चुनौती

सस्ते घर बनाने में सबसे बड़ी चुनौती तकनीक होती है क्योंकि हमारा लक्ष्य कम मूल्य में सुरक्षित और स्थाई घर प्रदान करना होता है। वर्तमान में प्रीकास्ट तकनीक कुछ हद तक इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक है।

प्रीकास्ट तकनीक में कई कॉन्क्रीट इकाइयों को निर्माण स्थान पर ढालने की बजाय पहले ही ढाल कर रख लिया जाता है। इससे संसाधनों को व्यर्थ होने से बचाकर कम समय में निर्माण पूरा किया जा सकता है। इस तकनीक से बने ढाँचों का जीवनकाल निवेश के अनुपात में अधिक ही होता है क्योंकि ये संरचनाएँ बाहरी तत्वों से कम प्रभावित होती हैं।

इस समस्या को पहचानते हुए सरकार ने इस वर्ष जनवरी में वैश्विक आवासीय तकनीक प्रतिस्पर्धा का आयोजन किया। मार्च 2019 में हुए एक्सपो और सम्मेलन में योग्य तकनीकों को चुनकर आईआईटियों में विकसित होने के लिए भेजा गया।

वर्तमान में ग्लास फाइबर री-इनफोर्स्ड जिपसम तकनीक भी भारत में प्रचलित है। इसका उपयोग छतों, दीवारों और खिड़की-दरवाज़ों में होता है। तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल की कई परियोजनाओं में इनका उपयोग हुआ है। प्रीकास्ट मॉड्युलर तकनीक और मोनोलिथिक री-इनफोर्स्ड कॉन्क्रीट जैसी तकनीकें भी प्रचलन में हैं।

झुग्गी पुनर्विकास परियोजना

‘जहाँ झुग्गी, वहाँ घर’ के नारे के साथ दिल्ली में केंद्र सरकार ने 192 बस्तियों के स्थान पर मकान बनाने का निर्णय लिया है। इसके लिए दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने 32 झुग्रियों का सर्वेक्षण कर लिया है व अन्य 160 का भी जल्द किया जाएगा, टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया।

1 जनवरी 2015 से इन झुग्गियों में रह रहे लोगों को आधारभूत सुविधाओं के साथ दो कमरों-रसोईघर वाला 50 स्क्वायर मीटर का घर दिया जाएगा। हर लाभार्थी परिवार के लिए केंद्र प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत 1 लाख रुपये भी देगा। रोहिणी  नगर सेक्टर 18 और 19, शालीमार बाग, कीर्ति नगर और दिलशाद गार्डन क्षेत्रों में इन विकास कार्यों की योजना है।

दिल्ली में पहले ही कालकाजी एक्सटेंसन और कठपुतली कॉलोनी में इस प्रकार की परियोजनाएँ चल रही हैं जो पीपीपी मॉडल पर आधारित हैं। हालाँकि कठपुतली कॉलोनी का कार्य दिल्ली में उच्च प्रदूषण स्तर के कारण रोकना पड़ा था जिससे यह दिसंबर तक पूरी होने के अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाएगी। अप्रैल 2018 में शुरू हुई इस परियोजना में लगभग 500 फ्लैट हैं जो 2,800 लोगों को आश्रय देंगे।

दूसरी ओर एशिया की सबसे बड़ी स्लम कही जाने वाली मुंबई स्थित धारावी को अपने पुनर्विकास के लिए और प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। 2.4 स्क्वायर किलोमीटर में फैली 60,000 लोगों की झुग्गी के पुनर्विकास का दायित्व दुबई आधारित सेकलिंक को फरवरी में सौंपा गया लेकिन अनुबंध में बदलावों और रेलवे प्लॉट के क्षेत्र में आने के कारण पुनः टेंडर जारी किए जाने की आशंका जताई जा रही है।

आगे की राह

केंद्रीय आवास और शहरी मामले मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से 31 मार्च 2020 तक अपने-अपने प्रस्ताव भेजने को कहा है जिससे 2022 तक सभी के लिए घर बनाए जा सकें।

इस विषय में उत्तर प्रदेश के राज्य नगरीय विकास अभिकरण (सूडा) के कार्यक्रम अधिकारी अतुल सिंह चौहान ने स्वराज्य  को बताया कि एक बैठक में उन्हें जानकारी मिली कि सभी प्रस्ताव 31 जनवरी तक देने हैं। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में झुग्गी पुनर्विकास और साझेदारी से आवास परियोजना अधिक नहीं चल रही है, बल्कि लाभार्थी स्वयं अपनी आवश्यकता दर्शाकर सरकारी सहायता राशि का लाभ ले रहे हैं।

अभी तक पूरे देश में 56.37 लाख घरों का निर्माण कार्य शुरू हो चुका है और 28.6 लाख घर बनकर तैयार भी हैं। मंत्रालय का लक्ष्य है कि मार्च 2020 तक 75 लाख घरों पर काम शुरू कर दिया जाए। “अगले पाँच-छह महीनों में 50 लाख घर बनकर तैयार हो जाएँगे जिनमें से 40-45 लाख घरों में लोग बस भी जाएँगे।”, केंद्रीय मंत्री पुरी ने पीटीआई  से कहा।

केंद्र की ओर से 1,45,949 करोड़ रुपये की सहायता राशि जारी की गई है जिसमें से 57,913 करोड़ रुपये की राशि प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत है। कुल 5.7 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया गया है। इस प्रकार मात्र एक-दहाई सरकारी सहायता से हो रहा यह विकास आश्चर्यजनक है।

2011 की जनगणना में मात्र 17.73 लाख लोगों को घर-विहीन माना गया था क्योंकि इसकी परिभाषा केवल “जिनके घर पर छत न हो” तक सीमित थी। इस समस्या को समझते हुए आवास योजना में 2 करोड़ आवास इकाइयों के निर्माण की परिकल्पना की गई थी क्योंकि लोगों को सम्मान से जीने के लिए केवल सर पर छत नहीं, बल्कि एक घर की आवश्यकता है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।