भारती
प्लास्टिक के विरुद्ध मुलुगु ने जो युद्ध छेड़ा है उसे दीर्घकाल तक कैसे प्रभावी बनाया जाए

भारत के सबसे नव-गठित जिलों में से एक होने के बावजूद तेलंगाना के मुलुगु ने समाचारों में जगह बना ली है। इसके दो कारण हैं जो आपस में संबंधित भी हैं। पहला है रामप्पा मंदिर जो काकतीयों की वास्तुकला में श्रेष्ठता का प्रतीक है। इसे भारत सरकार ने यूनेस्को के विश्व विरासत स्थल टैग के लिए मनोनीत किया है। दूसरा है प्लास्टिक कूड़ा इकट्ठा करने के लिए जिले द्वारा किए जा रहे प्रबल प्रयास।

इस साल की फरवरी में मुलुगु जिले का जन्म हुआ जब मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने तेलंगाना में मुलुगु और नारायणपेट नामक दो नए जिले बनाए। अब राज्य में कुल जिलों की संख्या 33 है। थोड़े ही समय में मुलुगु को सी नारायण रेड्डी के रूप में जिला कलेक्टर भी मिल गया।

रेड्डी गैर-कैडर अधिकारी हैं, यानी वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) कैडर से नहीं हैं व उन्हें अस्थाई रूप से नियुक्त किया गया है क्योंकि राज्य में नए-नए जिलों के गठन से आईएएस अधिकारियों में खींचतान है।

हालाँकि उनकी अस्थाई नियुक्ति उनके नेक काम में बाधा नहीं बनी। वे कई रोचक व नए प्रयासों के साथ प्रस्तुत हुए जैसे किसानों के पुनरोद्धार और सरकारी विभागों में कर्मचारियों की उपस्थिति व समय पाबंदी बढ़ाने के लिए उनके प्रयास।

उनका सबसे नया प्रयास प्लास्टिक कूड़ा एकत्रित करने में नागरिकों को सम्मिलित करने का है। 16 से 26 अक्टूबर के बीच उन्होंने एक अभियान चलाया जिसमें हर व्यक्ति को 1 किलोग्राम प्लास्टिक के बदले में 1 किलोग्राम चावल मिलेगा। यह सुविधा हर ग्राम पंचायत पर उपलब्ध है।

प्रेरणा

स्वतंत्रता दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एकल उपयोग प्लास्टिक के नुकसान बताकर इसे जनमानस और लोगों की चर्चा तक पहुँचा दिया। इसके बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री राव ने अक्टूबर के द्वितीय सप्ताह में कलेक्टर सम्मेलन में एकल उपयोग प्लास्टिक पर संपूर्ण प्रतिबंध के प्रस्ताव की घोषणा की।

हालाँकि राव की घोषणा से पूर्व ही रेड्डी ने प्लास्टिक कूड़े के विषय में लोगों को जागरूक करना और इसपर चिंता व्यक्त करना शुरू कर दिया था। उनके ट्विटर अकाउंट से पता चलता है कि वे प्लास्टिक कूड़े को कम करने के लिए प्रयास कर रहे थे।

24 सितंबर को यूनेस्को के एक विशेषज्ञ मुलुगु में रामप्पा मंदिर गए थे क्योंकि इसे विश्व विरासत स्थल के लिए मनोनीत किया गया है। निरीक्षण के बाद अधिकारी ने पर्यटक व्यवस्थाओं, परिवहन, क्षेत्र में लोगों की जीविका का माध्यम, आदि विषयों पर ग्रामीणों से चर्चा की थी। इन सबसे यह निर्धारित होगा कि इस स्थल को टैग मिलेगा अथवा नहीं।

रामप्पा मंदिर

25 सितंबर को रेड्डी ने यूनेस्को विरासत पहचान से संबंधित एक ट्वीट किया था, इसके बाद सप्ताह भर कोई ट्वीट नहीं किया। लेकिन 5 अक्टूबर से रेड्डी के ट्वीट प्लास्टिक के कारण होने वाली समस्याओं पर ही रहे। और 11 अक्टूबर को उन्होंने प्लास्टिक के बदले चावल वाले विचार को ट्वीट किया।

रेड्डी लगातार मुलुगु के मंदिरों और तीर्थस्थलों जैसे पर्यटन आकर्षणों की बात करते रहे हैं और कहते हैं कि यदि वहाँ प्लास्टिक के कारण कचरा फैला तो इससे मुलुगु की छवि खराब होगी। मुलुगु में कई वन्यजीव अभ्यारण्य भी हैं जो पर्यावरण पर्यटकों को आकर्षित करते हैं लेकिन उनका आकर्षण भी प्लास्टिक कचरे के कारण कम हुआ है।

समय के अनुसार चलने वाले और त्वरित निर्णय क्षमता रखने वाले रेड्डी अक्टूबर के मध्य तक ऐसी योजना लेकर आए जिसने समाचारों में जगह बनाई। ध्यान देने योग्य बात यह है कि मुलुगु योजना से दो सप्ताह पूर्व प्लास्टिक के बदले चावल वाली एक और योजना सफल हुई थी।

एक गैर-सरकारी संस्थान (एनजीओ) के युवाओं ने आंध्र प्रदेश के पूर्वी गोदावरी जिले के पेद्दापुरम शहर में एक कार्यक्रम आयोजित किया- “प्लास्टिक से बचो, भूख से बचो“- जहाँ प्लास्टिक के वजन के बराबर चावल दिया गया। ‘मन पेद्दापुरम’ नामक एनजीओ ने इस प्रयोजन हेतु चावल दान करने के लिए क्षेत्र की चावल मिलों को भी मना लिया था।

इससे पहले, इसी साल के सितंबर में फिलिपिन्स के एक गाँव ने यह योजना लागू करके देखी जहाँ कचरे के बदले निवासियों को चावल दिया गया था। यह कार्यक्रम भी काफी सफल हुआ था। गरीबी व समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण से जूझ रहे देश के लिए यह दोहरा लाभ था और यह काफी सफल भी हुआ।

“तुम मुझे प्लास्टिक दो, मैं तुम्हें चावल दूँगा”

तेलंगाना टुडे  के अनुसार मुलुगु योजना में कई आयामों के प्रयास थे। व्यापारियों व अन्य समर्थ लोगों को चावल या नकद दान करने के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास हो रहे हैं और इसका प्रभार मंडल स्तर पर तहसीलदारों को मिला है। देयदाताओं से संपर्क करने के लिए उन्हें विशिष्ट फोन नंबर भी दिया गया है।

अभियान के दौरान प्लास्टिक की तौल होती हुई

दूसरी ओर प्रशासन स्वयं-सहायता समूहों को भी ढूंढ रहा है जो जूट व कागज़ के थैले बनाएँ। विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित करने में प्रशासन उनकी सहायता करेगा। लगभग 2,000 स्वयंसेवकों की एक ‘प्लास्टिक-रोधी टोली’ बनाई जाएगी जो जूट और कागज़ के थैलों के प्रति जागरूकता फैलाएगी।

कलेक्टर ने एक महिला केंद्र शुरू भी कर दिया है जहाँ कपड़े के थैले सिले जाते हैं। जूट और कागज़ विनिर्माण इकाइयाँ विचाराधीन हैं। ग्रामीणों, विक्रेताओं और दुकानदारों से मिलकर उन्हें निम्न-गुणवत्ता के प्लास्टिक का उपयोग न करने के लिए समझाया जा रहा है। प्लास्टिक रिसाइकल करने के लिए एक विशेष एजेंसी भी गठित की जाएगी। वर्तमान में जिले की अपनी कोई रिसाइकल इकाई नहीं है।

निवासियों की सक्रिय भागीदारी से 15 दिन में प्रशासन 45 टन चावल और 6 लाख रुपये इकट्ठा कर पाया है। लगभग 31,000 किलोग्राम प्लास्टिक इकट्ठा किया जा चुका है। 50 टन प्लास्टिक इकट्ठा करने का लक्ष्य रखा गया है जो रिसाइकलिंग इकाइयों और ईंधन बनाने के लिए सीमेंट फैक्टरियों को दिया जाएगा।

कार्यक्रम चलता रहना चाहिए

क्या यह अभियान निरंतर चलाया जा सकता है या यह एक बार का प्रयास है? इन अभियानों के अंतराल में भी प्लास्टिक कूड़ा इकट्ठा होगा और पर्यावरण, स्वच्छता व स्वास्थ्य पर वैसा ही दुष्प्रभाव डालेगा।

यहाँ निवासियों की सक्रिय भागीदारी महत्त्वपूर्ण है। गाँव को प्लास्टिक-मुक्त रखने का उनका उत्साह जीवंत रहना चाहिए जो कि और महत्त्वपूर्ण हो जाएगा जब रेड्डी का कहीं और स्थानांतरण हो जाएगा। वैसे भी रेड्डी अस्थाई रूप से ही वहाँ नियुक्त हैं।

व्यवहार परिवर्तन लाने के लिए नए विचारों की आवश्यकता होगी। हमें याद रखना चाहिए कि वैसे भी तेलंगाना राज्य में चावल मुफ्त में दिया जाता है इसलिए इस योजना का आकर्षण समय के साथ घट सकता है। संभव है कि प्लास्टिक की कम मात्रा ग्रामीणों के प्रयासों को प्रोत्साहित न करे और अगली बार व्यापारी दान न दें।

इन सबके बावजूद भी बाद में दूध, चिप्स और अन्य खाद्य सामग्रियों के पैकेट के माध्यम से प्लास्टिक पुनः अपनी जगह बना ही लेगा, उन जगहों पर जहाँ कपड़े और कागज़ के थैले काम में नहीं लिए जा सकते हैं।

उत्साह खत्म करने का प्रयास नहीं है लेकिन हमें समझना होगा कि प्लास्टिक रिसाइकल करना महंगा पड़ता है, साथ ही यह लंबी और थका देने वाली प्रक्रिया है। यही कारण है कि कई अध्ययनों और समाधानों को खोज लेने के बाद भी विकसित देशों में भी रिसाइकलिंग संयंत्रों की बजाय प्लास्टिक लैंडफिल में जाता है।

ग्रामीणों को सम्मिलित रखना होगा

वर्तमान परिदृश्य में केवल चावल के लोभ से नहीं अपितु रामप्पा मंदिर को संभवतः अंतर्राष्ट्रीय पहचान मिलने के गौरव से भी ग्रामीण उत्साही हैं। क्या ग्रामीणों के लिए आर्थिक अवसर के द्वार खोले जा सकते हैं जिससे वे प्लास्टिक के पुनः उपयोग पर नए विचारों को लेकर आएँ?

उन्हें हैदराबाद में मामूली तकनीक से प्लास्टिक के पुनः उपयोग के लिए हो रहे प्रयासों को दिखाना चाहिए जहाँ प्लास्टिक बोतलों का उसी स्वरूप में तहखानों और दीवारों के निर्माण हेतु उपयोग हो रहा है। ग्रामीणों में प्रायः नैसर्गिक रूप से नवाचार की समझ रहती है, जिसे प्रोत्साहित करके अवसर दिया जाना चाहिए।

अंततः जहाँ से शुरू किया था, हम वहीं आते हैं- पर्यटन। क्या प्रशासन प्रयास कर सकता है जिससे ग्रामीणों को पर्यटन क्षमता का भागीदार बनाया जा सके? रामप्पा मंदिर पर आधारित पूरी अर्थव्यवस्था हो सकती है। इसके अलावा मुलुगु के ग्रामीणों को महाराष्ट्र की तरह पर्यटकों का आतिथेय करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है जिससे उनके लिए रोजगार के विकल्प खुलेंगे।

प्रदूषण मुक्त पर्यावरण और पारंपरिक वातावरण में सत्कारशील विश्राम-गृह बनाकर मुलुगु के ग्रामीण पर्यटकों का आतिथेय कर सकते हैं जहाँ उन्हें ग्रामीणों के हाथों से बना पारंपरिक भोजन भी मिले। विश्व मानचित्र पर स्थापित होकर यह स्थल आय प्रोत्साहन से ग्रामीणों में मुलुगु को स्वच्छ रखने की आदत विकसित करेगा। धीरे-धीरे प्लास्टिक की आवश्यकता भी कम हो जाएगी।