भारती
बेंगलुरु की सड़कों पर भीड़ कम करने वाली पेरिफेरल रिंग रोड कब तक होगी पूरी

17 सितंबर को कर्नाटक कैबिनेट ने संशोधित बेंगलुरु पेरिफेरल रिंग रोड (पीआरआर) को स्वीकृति दे दी। साथ ही जिन लोगों की भूमि अधिग्रहित की जानी है, उनकी मुआवज़ा राशि भी स्वीकृत हो गई। अनुमानित रूप से इस परियोजना की लागत 11,950 करोड़ रुपये होगी।

65 किलोमीटर लंबी यह सड़क परियोजना बेंगलुरु के उप-नगरीय क्षेत्रों को जोड़ेगी। 100 मीटर चौड़ी यह सड़क शहर के पश्चिमोत्तर छोर पर स्थित तुमकुरु रोड को बेल्लारी रोड और ओल्ड मद्रास रोड के माध्यम से होसुर रोड से जोड़ेगी। इससे शहर के आधे पश्चिमी-पूर्वी-दक्षिणी उप-नगरीय क्षेत्र जुड़ जाएँगे। यह इस परियोजना का पहला चरण ही है, दूसरा चरण निम्न चित्र में काले रंग से दिखाया गया है जो कि 51 किलोमीटर लंबा होगा। हालाँकि इसे अभी स्वीकृति नहीं मिली है।

योजना (चित्र ट्विटर से)

2007 में प्रस्तावित पीआरआर शहर की सड़कों से भीड़ करने में सहायता करेगी। इससे इलेक्ट्रॉनिक सिटी, सरजापुर, वार्थुर, वाइटफिल्ड, होसकोटे, केम्पेगौड़ा अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा समेत कई जगहों को जोड़ा जा सकेगा।

योजना

भूमि अधिग्रहण लागत को बचाने के लिए पहले योजना बनाई गई थी कि पीआरआर को ज़मीन से ऊपरी स्तर पर बनाया जाए। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा है। नियोजनकारों ने निर्णय लिया है कि इस ज़मीनी स्तर पर ही बनाया जाएगा।

इस सड़क पर आठ लेन होंगे जो आउटर रिंग रोड और नाइस (नंदी इंफ्रास्ट्रक्चर कॉरिडोर इंटरप्राइज़ेस) रोड से भी अधिक हैं। ये क्रमशः छह और चार लेन वाली सड़कें हैं। इस सड़क का मीडियन भी अधिक चौड़ा होगा जो भविष्य में मेट्रो परिवहन जैसे सार्वजनिक यातायत साधनों के निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।

इस सड़क पर पैदलयात्रियों के लिए भी पथ होगा। साथ ही साइकल पथ और सर्विस रोड जैसे अन्य आवश्यक गलियारे भी होंगे। रेलवे लाइन को इसका मार्ग पाँच स्थानों पर पार करेगा जिसके लिए पाँच फ्लाइओवर व चार अंडरपास भी बनाए जाएँगे।

रेलवे क्रॉसिंग

नई योजना में इस सड़क की चौड़ाई 75 मीटर से बढ़ाकर 100 मीटर कर दी गई है। इससे पहले 25 मीटर की भूमि को व्यवसायिक विकास के लिए छोड़ा गया था। अभी के लिए इस योजना को दरकिनार कर दिया गया है।

हेसरघट्टा रोड, दोड्डाबल्लापुरा रोड, हेन्नुर-बागलूर रोड, होसकोटे-अनेकल रोड और सरजापुर रोड समेत पीआरआर दस प्रमुख सड़कों और राजमार्गों को जोड़ेगी। कुल मिलाकर यह सड़क कम से कम चार राष्ट्रीय राजमार्ग और पाँच राज्य राजमार्गों को पार करेगी।

इस परियोजना का निर्माण पब्लिक प्राइवेट पार्टनर्शिप (पीपीपी) मॉडल के तहत किया जाएगा। लेकिन 80 प्रतिशत से अधिक भूमि का अधिग्रहण किए जाने के बाद ही टेंडर निकाले जाएँगे।

वित्तपोषण और भूमि अधिग्रहण

जैसा कि बताया गया कि यह परियोजना 12 वर्षों से लंबित है, तो इसकी लागत कई गुना बढ़ चुकी है। राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण के लिए 8,100 करोड़ रुपये की स्वीकृति दे दी है और सड़क निर्माण के लिए 3,850 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए हैं। इससे पहले गठबंधन सरकार ने भूमि अधिग्रहण के लिए 4,500 करोड़ रुपये ही आवंटित किए थे।

सड़क निर्माण के लिए 67 गाँवों में फैली 1,810 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाना है। सरकार की योजना है कि यह भूमि अधिग्रहण की पूरी लागत खुद ही देगी। शेष राशि को दीर्घावधि ऋण के रूप में जापान इंटरनेशनल कोपरेशन एजेंसी (जीका) से लिया जाएगा। साथ ही उपभोक्ताओं से टोल टैक्स भी वसूला जाएगा।

भूमि अधिग्रहण के कार्य में प्रायः बाधा आती है। यह किसी भी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना का सबसे जटिल बाग होता है। इसके लिए सरकार ने नए नियमों में सोचा है कि 2 एकड़ से कम भूमि खोने वाले लोगों को पूरी मुआवज़ा राशि दी जाएगी। यह राशि 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत जारी की जाएगी।

जहाँ पर किसी व्यक्ति की 2 एकड़ से अधिक की भूमि ली जाएगी, वहाँ सरकार उसे 50 प्रतिशत भूमि के लिए मुआवज़ा देगी और शेष भूमि के लिए उसे विकास अधिकार दिए (ट्रांसफर ऑफ डवलपमेंट राइट्स) जाएँगे।

इस सूत्र के तहत सरकार विकास अधिकारों (टीडीआर) के बदले भूमि अधिग्रहित करती है। ये विकास अधिकार भूमि के स्वामी को एक विकास अधिकार प्रमाण-पत्र के रूप में मिलते हैं।

इसके माध्यम से भूमि का स्वामी कई लाभ उठा सकता है जैसे वह अपने भवन में अतिरिक्त मंज़िलें बना सकता है। इसका उपयोग किसी दूसरे स्थान पर उसकी बची हुई भूमि या उसकी कोई और संपत्ति पर विकास कार्य करने के लिए किया जा सकता है। इस प्रमाण-पत्र को दूसरे को बेचा भी जा सकता है।

टीडीआर योजना को पहली बार 1991 में मुंबई में लाया गया था। इसकी सहायता से शहर की कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण का कार्य अपेक्षाकृत रूप से अधिक आसानी से किया जा सका।

इस परियोजना को पर्यावरण समेत अन्य अनुमतियाँ मिल गई हैं। सब कुछ योजनानुसार चला तो यह तीन वर्ष में पूरी हो सकती है। इस परियोजना को लागू करने के लिए एक विशेष प्रयोजन वाहन का भी उपयोग किया जाएगा।

लेकिन दूसरी ओर कुछ अधिकारी इस प्रयास को पर्याप्त नहीं मानते हैं, जैसा कि द न्यू इंडियन एक्सप्रेस  ने रिपोर्ट किया है। भूमि अधिग्रहण के लिए निश्चित योजना का अभाव व बेंगलुरु विकास प्राधिकरण (बीडीए) को फंड न दिया जाना चिंता का कारण है।

पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण के लिए बीडीए को प्रति वर्ष 1,000 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएँगे लेकिन अभी तक उन्हें किसी भी प्रकार की राशि नहीं मिली है। दूसरी ओर जीका के ऋण की शर्त यह है कि वे भूमि अधिग्रहण के बाद ही वे राशि देंगे, अधिकारी ने बताया।

एक समस्या और है कि भूमि अधिग्रहण के लिए जो राशि आवंटित की गई है, वह 2016 के मूल्य के अनुसार है। भूमि देने वाले लोग वर्तमान मूल्य में ही अपनी ज़मीन देने की अपेक्षा कर रहे हैं। ऐसे में परियोजना की लागत और बढ़ेगी जो इसे पूरा करने की जटिलताओं को बढ़ाएगी।

हालाँकि बीडीए आयुक्त जीसी प्रकाश ने आश्वस्त किया है कि सरकार इस परियोजना को लेकर गंभीर है और राशि की उपलब्धि सुनिश्चित की जाएगी। बेंगलुरु की सड़कों पर से भीड़ कम करने के लिए मुख्यमंत्री नव नगरोत्थान परियोजना के लिए 8,343 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं लेकिन इनकी व्यय योजना उपलब्ध नहीं है।

शहर को ट्रैफिक की समस्या से उबारने के लिए अन्य प्रयासों में बसों के लिए डेडिकेटेड कॉरिडोर का भी विचार है। अधिक भीड़ वाले 12 मार्गों पर बसों के लिए विशिष्ट गलियारे बनाए जाएँगे जिनमें से एक केआर पुरम से पेरिफेरल रिंग रोड तक भी होगा।

उप-मुख्यमंत्री अश्वथ नारायण ने कहा था कि इस परियोजना को पूरा होने में चार वर्ष लगेंगे। एक वर्ष भूमि अधिग्रहण के लिए और तीन वर्ष सड़क निर्माण हेतु। ट्रैफिक की समस्या से जूझ रहे बेंगलुरु का एक सामान्य नागरिक सकारात्मक रहकर इसके शीघ्र निर्माण की अपेक्षा ही कर सकता है।