भारती
एक विकल्प साइकल शेयरिंग- भारत में पीबीएसएस की स्थिति और चुनौतियाँ

पब्लिक बाइसिकल शेयरिंग सिस्टम (पीबीएसएस)- क्या इसके बारे में सुना है आपने? यदि आपके शहर में यह है तो अवश्य ही देखा होगा और संभवतः उपयोग भी किया होगा। लेकिन कई बार आप चाहकर भी इसका लाभ नहीं उठा पाए होंगे। इस लेख का उद्देश्य है कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में पीबीएसएस की स्थिति को बताकर इसकी चुनौतियों पर चर्चा करना।

पीबीएसएस की पहली जेनरेशन 1960 के दशक के अंत में एम्सटर्डम में आई और चौथी जेनरेशन के साथ अब यह विश्व के कई शहरों में विद्यमान है। बाइसिकल शेयरिंग उपभोक्ता को छोटी दूरियों के लिए इसका उपयोग करने का अवसर देती है और वह चेक-इन/चेक-आउट द्वारा बिना किसी जवाबदेही के इसे कहीं भी ड्रॉप कर सकता है। और इसी प्रकार कोई दूसरा इसका उपयोग कर सकता है। इस प्रकार इस सिस्टम की विशेषता हमें सहभाजन अर्थव्यवस्था से वृत्तीय अर्थव्यवस्था की ओर लेकर जाती है। इससे ईंधन के प्रयोग में भी कमी आती है जो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण कर देश की अर्थव्यवस्था को बल देता है।

शहरी क्षेत्रों में प्रायः पीबीएसएस का उपयोग छोटी दूरियों के लिए होता है लेकिन निरंतर बढ़ रहे हमारे शहरों में लंबी दूरी का सफर और प्रतिकूल वातावरण साइकल चलाने के प्रति हमारे दृष्टिकोण को नकारात्मक बनाते हैं। सार्वजनिक परिवहन को पीबीएसएस से जोड़कर सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र को बढ़ाया जा सकता है, साथ ही अधिक लोग पीबीएसएस का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित होंगे जो अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी देगा।

सार्वजनिक परिवहन में पीबीएसएस सर्वोपरि है क्योंकि यह गैर-मोटर चालित है। इसी कारण से शहरी नियोजक जलवायु परिवर्तन, ट्रैफिक जाम, पर्यावरण पतन, आदि से निपटने के लिए पीबीएसएस जैसे प्रदूषण मुक्त परिवहनों को बढ़ावा दे रहे हैं। भारत में यह व्यवस्था हाल ही में आई है। 2017 के मध्य में भोपाल से इसकी शुरुआत हुई और अब कई शहरों ने इसे अपनाया है।

भारत में पीबीएसएस की सूची

क्रमांक शहर राज्य प्रणाली वाहन संख्या स्टेशन
1 मैसुर कर्नाटक शेयरिंग 450 52
2 भोपाल मध्य प्रदेश शेयरिंग 500 50
3 बैंगलोर कर्नाटक शेयरिंग 45 9
4 वडोदरा* गुजरात शेयरिंग 1000 62
5 पंजिम* गोवा किराए पर 1040 66
6 अहमदाबाद गुजरात किराए पर 2000 9
7 गांधीनगर गुजरात शेयरिंग 100 10
8 चेन्नई* तमिल नाडू शेयरिंग 3000 200
9 पुणे महाराष्ट्र शेयरिंग 1000 स्टेशन रहित
10 राजकोट गुजरात शेयरिंग 230 20
11 सूरत गुजरात शेयरिंग 1160 65
12 रांची झारखंड शेयरिंग 1200 122
13 थाने महाराष्ट्र शेयरिंग 500 50
14 जयपुर* राजस्थान शेयरिंग

*- नियोजन चरण में

बाइक शेयरिंग की बढ़ती माँग के साथ निजी क्षेत्र भी इसमें निवेश करने लगा है। छोटे-बड़े स्टार्ट-अप स्थानीय सरकार की साझेदारी में व्यापार कर रहे हैं और पब्लिक प्राइवेट पार्टनर्शिप (पीपीपी) मॉडल के तहत अपनी बाइक-शेयरिंग सेवा चला रहे हैं। प्ले पेडल, पेडल, चार्टरबाइक, ओफो, माईबाईसी, माईबाइक, ऐटकैग, मोबाइक, युलु, बाउंस और लेज़ोंनेट आदि निजी क्षेत्र की कंपनियाँ हैं। इनके द्वारा दी जाने वाली सेवा तीसरी अथवा चौथी जेनरेशन की है। चयनित पिक-अप और ड्रॉप स्थान बताकर ये उपभोक्ताओं को मार्ग तय करने में सहायता भी करते हैं।

ओला ने आईआईटी कानपुर के परिसर में ओला पेडल शुरू किया जो अभी शुरुआती दौर में है। ज़ूमकार ने बेंगलुरु के नए क्षेत्रों- होसुर-सरजापुर रोड पर पेडल शुरू किया था। हालाँकि अभी इसकी सेवाएँ बाधित हैं क्योंकि वे सामान्य बाइसिकल के स्थान पर टिकाऊ और उच्च गुणवत्ता की साइकलें लाना चाहते हैं। पुणे ने ज़ूमकार के साथ साझेदारी में दिसंबर 2017 में औंध और सावित्रिबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय क्षेत्र में सेवा चालू की थी। ज़ूमकार के अलावा पुणे में रेनटोन, ओफो, साइमोर, युलु और मोबाईसी जैसी निजी कंपनियों ने भी अपनी सेवाएँ शुरू की थीं।

पीबीएसएस का उपयोग करते लोग

पीबीएसएस अभियानों की बढ़ती संख्या व स्वास्थ्य एवं पर्यावरण पर इसके लाभ के बावजूद इसके कुशलता से लागू होने और जनता द्वारा अपनाए जाने में कई बाधाएँ हैं। कम उपभोक्ताओं के बावजूद निर्णयकर्ता सरकार द्वारा स्मार्ट सिटी मिशन के अंतर्गत मिल रही राशि के कारण शहरी क्षेत्रों में पीबीएसएस को लागू करना चाहते हैं। शोध परिणामों के अलावा किसी भी दिशानिर्देश के अभाव में निर्णयकर्ता इसके अवरोधकों और इसे लागू करने के लिए प्रभावशाली कारकों से अपरिचित हैं। इसलिए इसमें सरकारी हस्तक्षेप की तत्काल आवश्यकता है जो न सिर्फ पीबीएसएस के अवरोधकों पर ध्यान दे बल्कि इसे लागू करने के लिए उचित दृष्टिकोण और राह भी दिखाए।

इन अवरोधकों को मुख्यतः छह वर्गों में बाँटा जा सकता है। आइए देखें वे क्या हैं-

  1. सामाजिक अवरोधक- सामाजिक विलक्षणताएँ और पारिस्थितिकी तंत्र परिवहन के माध्यम को चुनने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई सामाजिक कारक जैसे लोगों का दृष्टिकोण, निजी माध्यम से सफर करने की आदत, जनसांख्यिकी आधारित पैटर्न, सामाजिक-आर्थिक कारण जैसे समृद्ध सामाजिक दर्जा, लिंग, आयु, शिक्षा, सामाजिक जागरूकता, आदि बड़ी भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा कार्यक्षेत्र के परिधान साइकल चलाने में सहज नहीं होते हैं। इसलिए परिवहन के बाद स्नान या कपड़े बदलने की सुविधाओं के अभाव में कम लोग ही यातायात के लिए साइकल को चुनते हैं।
  2. संस्थागत अवरोधक- शहरी क्षेत्रों में गैर-मोटर चालित परिवहन (एनएमटी) के योग्य इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में संस्थागत नीति आवश्यक होती है। लेकिन एनएमटी अनुकूल नीतियों के अभाव में मोटर चालित वाहनों की संख्या लगातार बढ़ रही है जिससे कई समस्याएँ भी उत्पन्न हो रही हैं। पीबीएसएस के सफलतापूर्वक लागू होने में सबसे बड़ा बाधक इसे कम प्राथमिकता देना और भावी योजना का अभाव है। प्रचार आयोजन और सेलिब्रिटी व नेताओं द्वारा जागरूकता अभियानों से एनएमटी के उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है। वित्तीय संसाधनों की कमी से एनएमटी इंफ्रास्ट्रक्चर का रख-रखाव और एनएमटी निरीक्षण इकाई नहीं बन पाती जिससे यह अच्छी तरह से लागू नहीं हो पाता। इन सब कारणों से उपभोक्ता सुरक्षा के प्रति संदिग्ध होंगे और इससे एनएमटी का उपयोग हतोत्साहित होगा।
  3. शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर अवरोधक- साइकल चलाने के लिए इसके अनुकूल इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होगी। इसलिए शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर सभी आवश्यकताओं को पूरा करने योग्य होना चाहिए। शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर में पृथक बाइसिकल लेन (अलग रंग से अंकित), चौराहों पर बाइसिकल बॉक्स और अन्य सुविधाएँ होनी चाहिए। साइकलों को निर्बाध और निरंतर परिवहन सुविधाएँ देकर प्रोत्साहित किया जा सकता है। हालाँकि कई अध्ययनों में जंक्शनों पर बुरा प्रबंधन, सड़कों की खराब अवस्था, श्रेणीबद्ध सड़क नेटवर्क का अभाव, चौराहों की अधिक संख्या आदि कारक पाए गए हैं जो साइकल चलाने को नकारात्मक प्रकाश में दर्शाते हैं।
  4. परिवहन अवधक- परिवहन की दूरी साइकल उपयोग के निर्णय में बड़ा कारक है। इसलिए लोग कम दूरियों के लिए बाइसिकल चुनते हैं। हालाँकि यदि इंफ्रास्ट्रक्चर अभाव से साइकल यातायात से छोटी दूरी के लिए अधिक समय लगता है तो भी लोग अन्य माध्यम की ओर जाते हैं। इस समस्या को सामूहिक परिवहन को पीबीएसएस से जोड़कर हल किया जा सकता है। पीबीएसएस से जोड़कर सार्वजनिक परिवहन के प्रभाव क्षेत्र को भी बढ़ाया जा सकता है।
  5. तकनीकी अवरोधक- चौथी जेनरेशन के पीबीएसएस के नियोजन और क्रियान्वयन में स्मार्ट तकनीक की आवश्यकता है। पीबीएसएस के संचालन, निगरानी और सुरक्षा में आधुनिक स्मार्ट तकनीक, नियोजन में बिग डाटा, आदि का प्रयोग कारगर सिद्ध हो सकता है। पीबीएसएस को लागू करने में आ रही समस्याओं का समाधान निर्णयकर्ता स्मार्ट तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित कर कर सकते हैं। इसे लागू करने में नियोजन जानकारी का अभाव सबसे बड़ा बाधक है। एक नियोजक को डॉकिंग स्टेशन, इसका घनत्व, आवश्यक वाहन संख्या और इसका फैलाव आदि चीज़ों की जानकारी होनी चाहिए।
  6. भौगोलिक अवरोधक- ये अवरोधक साइकल-चालक की सहजता पर प्रभाव डालते हैं। प्रतिकूल मौसम सबसे बड़ा बाधक बनता है। इसके अलावा क्षेत्र की भौगोलिक आकृति की भी अहम भूमिका होती है। ढलान वाले क्षेत्रों में लोग साइकल चलाने नहीं चाहते हैं। इन परिस्थितियों में इलेक्ट्रिकल या हाइब्रिड साइकलें अच्छा विकल्प बन सकती हैं।

इन अवरोधकों से निपटने के लिए बाइसिकल लेन और संशोधित व ई-बाइसिकल के लिए सरकारी नीतियाँ लाई जा सकती हैं। किसी भी शहर में पीबीएसएस को लागू करने से पहले निर्णयकर्ताओं व नियोजकों को इससे जुड़े अवरोधकों और उनसे निपटने के तरीकों की जानकारी होनी चाहिए। यह बात भी समझनी होगी कि सभी बाधाओं से एक साथ नहीं निपटा जा सकता लेकिन यदि इन अवरोधकों की गहनता का अनुमान हो तो बेहतर रणनीति बनाई जा सकती है। इस प्रकार हम भारतीय शहरों में पीबीएसएस को अच्छी तरह से लागू कर पाएँगे।