भारती
राजा के आसपास रहने वालों को कैसा आचरण करना चाहिए बताते कुरल भाग-33

प्रसंग- राजा के आसपास रहने वाले लोगों के आचार-व्यवहार पर प्रकाश डालते हुए 19 जुलाई 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित तिरुवल्लुवर के चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

1. एक सभासद को अधिक बार अनुपस्थित नहीं रहना चाहिए और न ही राजा के अधिक निकट रहना चाहिए। जैसे गर्मी पाने के लिए आग के जितने पास रहा जाता है, न अधिक निकट, न अधिक दूर क्योंकि राजा अपना मन कभी भी बदल सकते हैं।

2. अगर उन्नति करना चाहते हैं तो उस वस्तु की इच्छा न करें, जिन्हें शासक स्वयं के लिए चाहते हैं।

3. एक बार किसी शासक को संदेह हो गया तो उनके मन से वह संदेह निकालना असंभव है। इसलिए सुरक्षित रहने के लिए ऐसा कुछ न करें।

4. शासक की उपस्थिति में किसी व्यक्ति से फुसफुसाकर या मुस्कुराकर इस बात का संकेत न दें कि आप दोनों किसी बात को आपस में समझ रहे हैं।

5. शासक को गोपनीय बातों के प्रति जिज्ञासा व्यक्त न करें। जब तक वे आपसे स्वयं न कह दें, प्रतीक्षा करें।

6. जिन बातों से आपका मतलब नहीं, उनके बारे में बात करने से बचें, भले ही शासक उसमें रुचि दिखाए।

7. अपने शासक को आयु में या समझ में खुद से छोटा न समझें बल्कि उन्हें वह मानें जिनपर देश के लोगों की रक्षा करने का भार है।

8. एक चतुर मंत्री सदैव वैसा व्यवहार करता है कि वह अभी भी परीक्षण काल में ही है। वह शासक के विश्वास को प्रदत्त नहीं समझता।

9. लंबे समय के संबंध के कारण हुई जान-पहचान के कारण दुर्व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए।

राजा के निकट रहने वालों के लिए तिरुवल्लुवर राजा का मन पढ़ पाने के कौशल पर भी ज़ोर देते हैं। यह बात वर्तमान शासकों के कैबिनेट में कार्यरत लोगों पर भी लागू होती है।

अगले अंक में जारी…

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