भारती
यूरोप को इस्लाम के प्रति जगाने वाली ओरियाना फलाची की जिहाद पर चेतावनी को न भूलें
शंकर शरण - 13th September 2019

महान इटालियन पत्रकार ओरियाना फलाची के 90वें जन्मदिन पर इटली के आंतरिक सुरक्षा मंत्री ने उन्हें ‘वर्तमान यूरोप की माँ’ कहकर याद किया। यह अकारण नहीं है। 

13 वर्ष पहले अपना अंतिम उपन्यास पूरा किए बिना ओरियाना दुनिया से चल बसीं थीं। उस उपन्यास को वे ‘अपना बच्चा’ कहती थीं, जिसके लिए उन्होंने वर्षों से कुछ भी अन्य लिखना बंद कर दिया था।

फिर भी, 11 सितंबर 2001 को अपने घर की बालकनी से न्यूयॉर्क आतंकवादी हमले को अपनी आँखों से देखने के बाद उन्होंने मौन तोड़ा। इटली के प्रसिद्ध अखबार कोरियर देला सेरा (29 सितंबर 2001) में पूरे चार पेज में उनकी आग उगलता विस्तृत लेख छपा, जिसका शीर्षक था ‘ला राब्बिया ए लोर्गोग्लियो’ (आक्रोश और अभिमान)। 

इसी को पुनः उन्होंने अंग्रेज़ी में विस्तृत रूप से लिखकर पुस्तक ‘द रेज एंड प्राइड’ प्रकाशित की, जिसमें यूरोप को कड़ी शिक्षा के साथ तीखी चेतावनी दी गई थी। इसमें उन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों, अवलोकनों को शब्द दिया जो दशकों लंबे अंतर्राष्ट्रीय पत्रकारी जीवन से उनके पास जमा थे। 

फलतः उनका उपन्यास अधूरा रह गया। फिर उन्होंने अगली कड़ी के रूप में दूसरी महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी ‘द फोर्स ऑफ रीज़न’। इन दोनों पुस्तकों ने इस्लामी आतंकवाद के प्रति सोए, भ्रमित यूरोप को जगाने में बड़ी भूमिका अदा की। ओरियाना के अपने शब्दों में, ‘‘जागो, लोगों, जागो! उन्होंने हमारे विरुद्ध घोषित युद्ध छेड़ा है, हम युद्ध में खड़े हैं! और युद्ध में हमें अवश्य लड़ना चाहिए।’’ 

ओरियाना ने अपनी आत्मा की पूरी शक्ति से ललकारा-

‘’रेसिस्ट कहलाने से तुम ऐसे डरे हुए हो कि तुम चलन के विरुद्ध बोलना नहीं चाहते, नहीं समझते या नहीं समझना चाहते कि एक रिवर्स क्रूसेड जारी है। दृष्टिदोष और राजनीति-संगत होने की मूर्खता से तुम ऐसे अंधे हो गए हो कि तुम महसूस नहीं करते या करना नहीं चाहते कि एक मजहबी युद्ध चल रहा है।

एक युद्ध जिसे वे जिहाद कहते हैं। एक युद्ध जो हमारी सभ्यता नष्ट करने के लिए है, हमारे जीने और मरने के ढंग, हमारे प्रार्थना करने या न करने, खाने और पीने और कपड़े पहनने और पढ़ने और जीवन का आनंद लेने के तरीकों को पूरी तरह खत्म करने के लिए है।

झूठे प्रचारों से तुम ऐसे सुन्न हो गए हो कि तुम दिमाग में यह नहीं लाते या नहीं लाना चाहते कि यदि हम अपना बचाव नहीं करेंगे, यदि हम नहीं लड़ेंगे, तो जिहाद जीतेगा। वह जीतेगा, तब निश्चय ही, और इस दुनिया को नष्ट कर देगा जिसे हम ऐसे या वैसे बना सके हैं।’’

उन कठोर शब्दों के पीछे आधी सदी का प्रत्यक्ष अवलोकन था। (उनकी पुस्तक में 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में हिंदुओं के नरसंहार का भी एक प्रत्यक्ष, लोमहर्षक विवरण है)। 

ओरियाना को सारी दुनिया में, हर किस्म, हर नस्ल के लोगों के बीच रहने, काम करने का अनुभव था। बड़ी-बड़ी राजनीतिक, सांस्कृतिक हस्तियों को जानने, परखने का भी। ओरियाना की दोनों पुस्तकें तुलनात्मक ज्ञान और विपुल अनुभवों के कारण बढ़ते इस्लामी दबाव को ऐतिहासिक रूप में समझने के लिए अदभुत हैं। 

इनमें सैद्धांतिक से अधिक यथार्थ मूल्याकंन है, जिसे एक बेमिसाल योद्धा लेखिका ने किया। किशोरावस्था में ही माता-पिता के साथ फासिस्ट-विरोधी युद्ध में हिस्सा लेने से शुरू कर ओरियाना ने अगले 50 वर्ष तक दुनिया भर में अनेक युद्धों की प्रत्यक्ष रिपोर्टिंग की।

उसमें 1967 के वियतनाम युद्ध, 1971 का भारत-पाक युद्ध और पश्चिम एसिया के अनेक युद्ध भी शामिल हैं। जान पर खेल कर ओरियाना ने रिपोर्टिंग की थी। कई बार उन्हें गोलियाँ लगी थी। एक बार तो उन्हें मृत जानकर लाश-गाड़ी में फेंक दिया गया था। मुर्दाघर से भी वह फिर जीवित लौटीं। 

उन्होंने कई विश्व-प्रसिद्ध हस्तियों के साक्षात्कार भी लिए थे। अयातुल्ला खुमैनी, हेनरी किंसिंगर, देंग सियाओ पिंग, यासिर अराफात, इंदिरा गाँधी, गद्दाफी, हिचकॉक, आदि के। यह साक्षात्कार कितने बेलाग होते थे कि अवकाशप्राप्ति के बाद किसिंगर ने कहा था कि उन के जीवन की सब से बड़ी भूल ओरियाना को साक्षात्कार देना था। वे साक्षात्कार ‘इंटरव्यू विथ हिस्टरी’ में संकलित हैं। उन्हें पढ़ कर ही महसूस होगा कि मिलान कुंदेरा ने बीसवीं शताब्दी में ओरियाना को ही पत्रकारिता का आदर्श क्यों कहा था। 

ऐसी अनूठी, सत्यनिष्ठ पत्रकार-लेखिका ने अंतिम वर्षों में जीवन भर की साध जैसा उपन्यास लिखना छोड़ इस्लामी खतरे से यूरोप को जगाने में समर्पित कर दिया। उन के अनुभव तथा विश्लेषण की मूल्यवत्ता से ही ही आज उन्हें फिर से याद किया जा रहा है। 

उन पुस्तकों में गत तीन-चार दशकों में विश्व में इस्लामी आक्रमकता बढ़ने, उस के कारणों, लक्ष्यों, साधनों, और उस के सामने यूरोपीय शक्तियों के निरंतर समर्पण, आदि का प्रमाणिक विवरण है। वह 1973 से अरब शासकों द्वारा तेल का ब्लैकमेलिंग हथियार रूप में प्रयोग से शुरू हुआ। उन लोगों ने अरब, अफ्रीका से मुस्लिम आव्रजन को स्वीकार करने, कुख्यात आतंकवादी यराफात को संयुक्त राष्ट्र में नेता जैसा स्थान देने जैसी शर्तें मनवाईं।

फिर मुस्लिम आव्रजकों को स्थानीय यूरोपियनों से बढ़कर अधिकार देना, अवैध आव्रजकों को भी बाहर न निकालना, उल्टे उन्हें वोट का और अन्य राजनीतिक अधिकार देना, इस्लाम को ईसाइयत से श्रेष्ठ कहलवाना, इतिहास पुस्तकों से यूरोप में मध्य-युग के बर्बर इस्लामी प्रसंग हटवाना, विश्वविद्यालयों व अकादमिक संस्थानों में इस्लामपरस्त लेखन-प्रचार चलवाना, यूरोप के प्रमुख ईसाई स्थलों, गिरजाघरों के निकट भव्य मस्जिदें बनाने की अनुमति देना, उस के लिए जमीनें और अनुदान देना, इन सब में यूरोपीय वामपंथियों द्वारा अग्रणी भूमिका निभाना, आदि। इन सबसे वहाँ इस्लामी दबदबा बढ़ता गया। इनमें से कई बातें ‘अरब-यूरोप डायलॉग’ के आधिकारिक दस्तावेजों तथा यूरोपीय शहरों के स्थानीय प्रशासन के निर्णयों में लिखित रूप से दर्ज हैं! 

पूरी प्रक्रिया में आश्चर्यजनक रूप से कैथोलिक चर्च की भी मौन-मुखर सहमति थी। ओरियाना ने कैथोलिक चर्च के केंद्र रोम में गिरजाघरों की दुर्गति और अपमान के उदाहरण दिए हैं। फिर भी चर्च प्रतिनिधि अवैध मुस्लिम आव्रजकों का बचाव करने में लगे रहे।

यूरोपीय स्कूलों में एकाध प्रतिशत आव्रजक मुस्लिम बच्चों पर ‘बुरा प्रभाव’ पड़ने के नाम पर स्कूल भवनों से क्रॉस जैसे ईसाई चिह्न हटवाना, यूरोपीय कानूनों को दरकिनार कर आव्रजक मुस्लिमों के लिए शरियत खुले-छिपे लागू होने देना, मुस्लिम बस्तियों, मस्जिदों में आतंकी गतिविधियों की खुली जानकारी के बावजूद कार्रवाई न करना, संदिग्ध आतंकियों को कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन और दुरुपयोग करने की छूट देना, आदि और कई परिघटनाएं हैं जिन्हें तीन दशकों में यूरोपीय जनता पर थोपा गया। 

ओरियाना के अनुसार, यूरोपीय नेताओं ने अपनी सभ्यता-संस्कृति को क्रमशः पहले पेट्रोल और पेट्रो-डॉलरों के लिए, फिर मूढ़ता में, और अंततः मुस्लिम वोटों के लालच में बेच दिया। इस प्रकार, यूरोप को धीरे-धीरे ‘यूरेबिया’ में बदलने दिया। 

फिर भी मृत्यु-पूर्व अपने अंतिम भाषण में ओरियाना ने एक आशाजनक बात कही। ‘एनी टेलर एवार्ड’ (2005) लेने के अवसर पर उन्होंने कहा कि चाहे यूरोप यूरेबिया में बदल गया हो, और यूरोपीय लोग एक मोर्चा हार चुके। किंतु संपूर्ण युद्ध अभी शेष है।

‘‘मैं जानती हूँ कि मेरे दिन गिने हुए हैं। किंतु आप हैं, और कुछ कर रहे हैं, और तब भी रहेंगे, जब मैं नहीं रहूँगी। इस से मुझे अपना कर्तव्य करते जाने में मदद मिलती है। मैं अंतिम साँस तक लड़ती रहूँगी….’’ और वे लड़ती रहीं। 

आज फिर से जागता यूरोप उन्हें इसीलिए याद कर रहा है। हमें भी करना चहिए। ‘द रेज एंड प्राइड’ और ‘द फोर्स ऑफ रीजन’ हमारे लिए भी उतनी ही सटीक है। लोगों पर थोपे गए सांस्कृतिक-राजनीतिक युद्ध को जीतने में स्वतंत्र चेतना, निर्भीकता और सत्यनिष्ठा का कोई विकल्प नहीं है। यही उस योद्धा लेखिका का संदेश था।