भारती
अन्यायी राजा के शासन में धनवान होना, निर्धन होने से बड़ा दुर्भाग्य है- कुरल भाग 29

प्रसंग- अन्यायी राजा के उत्पीड़न व दुशासन और उचित दंड के विषय में 5 जुलाई 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित तिरुवल्लुवर के चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

उत्पीड़न और दुशासन

1. अन्यायी राजा जिसका शासन बुरा होता है, वह हत्यारे से भी बड़ा पापी है।

2. अत्याचारी राजा की अपने प्रजा से उपहारों की मांग, किसी डकैत की मांग की तरह होती है।

सशस्त्र डकैत को जो दिया जाता है वह उपहार नहीं होता क्योंकि डर के कारण दी जाने वाली वस्तु को उपहार नहीं कहा जा सकता है।

3. जैसे बिना बादलों का आकाश धरती को सूखा देता है, उसी प्रकार बिना सहानुभूति का राजा लोगों का जीवन दुर्भर कर देता है।

4. अन्यायी राजा के शासन में धनवान होना, निर्धन होने से बड़ा दुर्भाग्य है।

दंड

5. निष्पक्ष होकर राजा को छानबीन करनी चाहिए और तत्पश्चात ऐसा दंड देना चाहिए जो अपराध से बड़ा भी न हो और साथ ही अपराधियों को वैसा करने के लिए हतोत्साहित भी करे। दंड कठोर हो लेकिन उसकी पीड़ा धीरे से हो। इस प्रकार राज्य की समृद्धि बरकरार रखी जा सकती है।

6. जो राजा उत्पीड़न करता है और लोगों पर भय से शासन करता है, उसका अंत त्वरित और निश्चित होता है।

7. जो अपनी प्रजा को यह कहने का कारण देता है कि उनका राजा क्रूर है, उसका अंत निकट होता है।

8. धन का स्वामी होने से कुछ नहीं होता। जो धनवान व्यक्ति, उसके पास सहायता के लिए पहुँचे लोगों के प्रति कठोर होता है, उसका धन किसी शापित खजाने जैसा होता है।

9. कटु शब्द और अत्यधिक एवं क्रूर दंड राजा की शत्रु-रोधक शक्ति को धीरे-धीरे कम कर देते हैं।

10. एक क्रूर राजा के आसपास सबसे अबोध और मूल्य-विहीन लोग होते हैं और वह जल्द ही दुनिया पर बोझ बन जाता है।

अगले अंक में जारी…