भारती
खेती का हो खुला बाज़ार, लोकलुभावन योजनाएँ दीर्घावधि के लिए उपयुक्त नहीं

खेती उत्तम काज है, इहि सम और न होय।
खाबें कों सबकों मिलै, खेती कीजे सोय।।

कृषि-प्रधान भारत में खेती को सबसे उत्तम व्यवसाय और किसान को अन्नदाता माना जाता है, लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए इस कथन पर विश्वास नहीं होता। ऐसा नहीं है कि किसान आंदोलनों और आत्महत्याओं से प्रभावित होकर सरकार ने कोई प्रयास नहीं किया है। फसल पर बीमा, कर्ज़माफी, बीज, खाद और बिजली पर सब्सिडी व न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे प्रयास किए गए हैं लेकिन ये सारी सुविधाएँ देना बिना तले वाली बाल्टी में पानी भरने जैसा है। इन समस्याओं के हल पर विचार करते हुए, एक किसान नेता की छवि आँखों के सामने उभर आती है।

धोती कुर्त्ता गमछा धारण करने वाले किसानों और उनके नेताओं के बीच जींस पहनने वाले शरद जोशी पहली नज़र में अजूबा ही लगते थे। कुछ अनोखा व्यक्तित्व था उनका। विश्व बैंक की नौकरी करने के बाद खेती करनेवाले शरद जोशी जब बोलते थे तो कृषि के दार्शनिक अधिक लगते थे। उन्होंने भारतीय कृषि के गहराते संकट के कारण भी खोजे और उनसे निपटने का रास्ता भी बताया। वे कहते थे लोकलुभावन नीतियाँ नहीं, आर्थिक सुधार और बाज़ार ही कृषि का राजमार्ग।

प्रारंभिक जीवन में जोशी एक प्राध्यापक और नौकरशाह थे किंतु उन्हें सबसे ज्यादा पहचान उनके द्वारा किसानों के अधिकारों के लिए छेड़ी गई मुहिम के कारण प्राप्त हुई। वे एक ऐसे विरले भारतीय उदारवादी चिंतक थे जिन्होंने वातानुकूलित कमरे की बजाए ज़मीन पर काम किया। भारत सरकार की नौकरी छोड़कर स्विट्ज़रलैंड गए और वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने खेती का काम शुरू किया।

किंतु शीघ्र ही उन्होंने यह जान लिया कि खेती एक नुकसान वाला का धंधा है। किसान नेता के तौर पर उभरने के पूर्व जिस प्रश्न का हल उन्होंने तलाशना शुरू किया था वह था, ‘क्या कारण है कि किसान अपनी लागत निकालने में भी असमर्थ है और गरीबी व कर्ज के तले जीवन जीने को विवश है?’ पूर्व में अर्थशास्त्र का प्राध्यापक रह चुकने और खेती के काम का अनुभव हो जाने के कारण उन्हें इस प्रश्न का उत्तर मिल ही गया।

वे अपना अनुभव बताते हुए कहते हैं- “1977 में मैंने अंगारमाला की ज़मीन कब्जे में ली और पत्थर उठाने के काम से खेती की शुरूआत की। तब मैं कुछ ही दिनों पहले संयुक्त राष्ट्र संघ से लौटा था। खेती कैसे की जाए इस बारे में बहुत-सी शास्त्रीय संकल्पनाएँ मेरे दिमाग में थीं। उनके अनुसार मैंने नकद राशि की आवक-जावक के बारे में बहुत सूक्ष्मता से अध्ययन किया था। नियमित आमदनी के लिए सबसे पहले ककड़ी की फसल उगाई।”

पुणे जिले खासकर चाकण क्षेत्र की ककड़ी अपने खास स्वाद के लिए प्रसिद्ध है। इस ककड़ी की बाजार में बहुत माँग होती है। इसलिए उसकी खपत में कोई खास बाधा आने की संभावना नहीं थी। “ककड़ियाँ इकट्ठी कर और उन्हें साफ करके बोरों में भरकर मैंने मुंबई के आढ़ती के पास भेज भी दिया। कुछ दिनों बाद उस आढ़ती का जवाब आया- आपके माल की बिक्री की पूरी कोशिश की लेकिन केवल 73 रुपये ही मिले। विदेशों में लाखों रुपये का वेतन कमानेवाले मुझको यह छोटी कमाई भी आनंददायक लगी थी। दूसरी बार माल भेजा तबभी कुछ सौ रुपये से कम रकम मिली थी। तीसरी बार अजीब बात हुई। आढ़ती की चिट्ठी आई उसे पढ़कर मुझे लगा दुनिया उल्टी सीधी तो नहीं घूम रही है।”

चिट्ठी में कहा गया था कि माल पूरी कोशिश करके बेचा गया लेकिन उससे मिली रकम हमाली और ट्रांसपोर्ट के खर्चे के लिए पर्याप्त न होने के कारण जोशी से ही मनीऑर्डर द्वारा 173 रुपये माँगे गए। “यह विचित्र रकम मेरे अब भी ध्यान में है। क्योंकि बाद में उससे एक सिद्धांत खड़ा करना था। पैसे देने के बजाय पैसे लेनेवाली चिट्ठी आती थी तो चाकण के इलाके में उसे उलटी पट्टी कहा जाता। यह उलटी पट्टी मुझे पहली बार ही आई। उसमें से कुछ चीजें साफ होने लगीं। कुछ सवालों के जवाब मिले। कृषि की शिक्षा प्राप्त करनेवाले क्यों उन्नत खेती की ओर नहीं बढ़ते। गैर किसान घर की लड़कियाँ किसान के घर शादी करके क्यों नहीं जाना चाहतीं। मुझे इन सारी पहेलियों का जवाब मिल गया। यह मैंने सुना था कि खेती घाटे का सौदा है। बाप दादा का नाम चलाने रखने के लिए इसे लोग करते रहते हैं। लेकिन इस बात का रहस्य धीरे-धीरे समझ में आ गया।”, इस प्रकार जोशी अपनी समझ बताते हैं।

उनकी बातों से यही निचोड निकाल पाया कि देश का कृषि संकट समाजवाद और राज्य हस्तक्षेप की देन है।

जून 1994 में द इकोनॉमिक टाइम्स  में प्रकाशित एक लेख में वे लिखते हैं, ‘कृषि के साथ कोई समस्या नहीं है। जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ, सरकार किसी समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि सरकार स्वयं समस्या है। इसे हमारे पीठ पर से उतार दो, किसान ठीक हो जाएँगे।’ उनका मानना था कि कृषि बदहाल इसलिए है क्योंकि उसे बदहाल रखा गया है।

नेहरू ने जिस समाजवाद की कल्पना की, वह विचित्र-सा समाजवाद था। गाँव के लघु उद्योग धंधे बढ़ाने में उनकी दिलचस्पी नहीं थी। बड़े-भारी उद्योग लगाए जाने के वे समर्थक थे। किसान बदहाल रहा, फायदा हुआ बंबई का, कलकत्ता का। चूंकि समाजवादी व्यवस्था में सरकारें व्यवसायों और लाभ अर्जित करने वाली फैक्टरियों को चलाती हैं, वे चाहती हैं कि कृषि से उत्पन्न होने वाला कच्चा माल सस्ता हो और मजदूरों के लिए अनाज भी सस्ता हो। स्वतंत्रता के बाद से सभी सरकारों की यही नीति रही है।

सरकारों द्वारा कृषि उत्पादों की कीमतों को जबरन सस्ता रखने की नीति ही किसानों को गरीब और कर्जदार बनाए रखती है। वे कहा करते थे कि कृषि से संबंधित सरकारी नीति यह सुनिश्चित करती है कि भले ही देश में किसान अलग-अलग चीजों की बुआई करें लेकिन वे सभी काटें सिर्फ एक चीज़, कर्ज़। वे कृषि में सरकार के हस्तक्षेप के सख्त खिलाफ थे।

उनका मानना था कि सरकार कृषि में हस्तक्षेप बंद करे। वे कहते, “वैसे भी 90 प्रतिशत तो किसान खुद ही करता है। 10 प्रतिशत जो सरकार करती है, उससे खराबी ही लाती है। किसानों को आज़ादी दो, सब कुछ ठीक हो जाएगा। सरकार को कुछ भी करने की ज़रूरत नहीं है।”

वे कहते थे कि एनडीए या यूपीए के दावों को नहीं मानते थे कि किसी सरकार ने किसानों का भला किया है। उनका एक ही पैमाना था कि कृषि का व्यवसाय फायदे में चल रहा है कि घाटे में। इसी कसौटी के आधार पर उन्होंने सारी सरकारी नीतियों को परखा था। उनके अनुसार इस पैमाने पर नापा जाए तो कांग्रेस हमेशा किसानों की सबसे बड़ी शत्रु रही है।

एक कारण था कि 1996-97 तक देश की सारी नीतियाँ ऋणात्मक सब्सिडी पर आधारित थीं। किसानों को भारत में अपने उत्पादों के लिए इतना भी भाव नहीं मिलता कि उनकी लागत निकल सके। सभी उत्पादों के भाव लागत की तुलना में 10 से 90 प्रतिशत तक कम थे। यदि विश्व बाजार में कपास का भाव 210 रुपये हो तो उससमय कॉटन कार्पोरेशन ऑफ इंडिया 100 रुपये भाव देता था और महाराष्ट्र  के विदर्भ जैसे एकाधिकार खरीद के तहत आनेवाले क्षेत्रों में 60 रुपये जितना भाव भी नहीं मिल पाता था। संक्षेप में यह निष्कर्ष निकला कि भारत में कपास के मामले में 110 रुपये की उलट पट्टी है। सरकार किसानों को मदद भले ही देती हो मगर उसकी निर्यात पर पाबंदी और आयात नीति से किसानों को हानि अधिक हुई। मुक्त बाज़ार में कीमतें गिरीं।

प्रणब मुखर्जी के हस्ताक्षर से डब्ल्यूटीओ में जो दस्तावेज़ गया, उसमें कहा गया था कि जो ऋणात्मक सब्सिडी है, वह कपास के लिए सबसे अधिक है क्योंकि इसमें शोषण की परंपरा अंग्रेज़ों के ज़माने से थी। इसके चलते खुदकुशी करने वाले किसानों में केवल विदर्भ के नहीं, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक से अधिकतर कपास के ही किसान हैं।

दूसरी तरफ जोशी कहते थे कि उदारीकरण और आर्थिक सुधारों का लाभ कृषि क्षेत्र को नहीं मिला। केंद्र सरकार ने उदारीकरण का सही स्वरूप समझा ही नहीं इसलिए किसी को यह बात स्वीकार नहीं है कि बाज़ार को मुक्त रखा जाना चाहिए, उसमें सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। उदारीकरण मुख्य रूप से उद्योगों और सेवाओं तक ही सीमित रह गया। कृषि तक वह कभी नहीं पहुँचा। इस बात को डॉ मनमोहन सिंह ने भी स्वीकार किया है।

अभी सरकार कृषि पर तरह-तरह के बंधन लाद सकती है। जब उसके लिए यह बंधन लादाना असंभव हो जाएगा तब सही मायनों में खुला बाज़ार विकसित होगा। इस बाज़ार में जो भी भाव तय होंगे, वे सभी स्वीकार्य होंगे। उन दामों से किसानों को न्याय मिलता है। सरकार किसानों और ग्राहकों के हितों में संतुलन स्थापित करने में कभी सफल नहीं हो पाई। कृषि उत्पाद बाज़ार समितियाँ जो बनी हैं यदि उन्होंने अगर बिचौलियों की संस्था को औपचारिक न किया होता तो आज तस्वीर एकदम अलग होती। इन समितियों के कारण किसानों का बहुत नुकसान हुआ है।

पहले भाव ठीक नहीं लगा तो किसान माल देता नहीं था। वह उसके घर पर ही पड़ा रहता था। अब यह हो गया है कि माल को बेचने के लिए बाज़ार समिति में ले जाया जाता है और वहाँ जाने पर जो मिले वही भाव। उस भाव पर ही माल निकालना पड़ता है। नहीं तो माल फिर से लाना पड़ता है। इस कारण वह फँस जाता है। चूहे की पिंजरे में फँसने के बाद जो स्थिति होती है, वही किसान की बाज़ार समिति में माल लाने पर होती है। जोशी ने यह मुद्दा उठाया कि कृषि उत्पाद बाज़ार समितियाँ किसानों बूचड़खाने हैं।

इस कृषि संकट से निजात पाने के लिए उनकी नज़र में स्पष्ट रास्ता था- अगर मुक्त बाज़ार हो और सरकार हस्तक्षेप नहीं करे तो जो कीमत तय होगी, वह लागत मूल्य से कम हो ही नहीं सकती। यदि हिंदुस्तान के किसानों का भला चाहते हैं तो सीएसीपी, एपीएमसी, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और पीडीएस बंद किए जाएँ। इनकी जगह केवल भावी बाज़ार खोल दो। जिन गरीबों की सरकार मदद करना चाहती है, उन्हें खाद्य कूपंस दे दें।

कुछ कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसान कर्ज़ का बोझ सहन न कर पाने के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। ऐसे में सरकार की कर्ज़ की रकम दोगुनी कर देने की सरकारी नीति से किसानों को कोई खास लाभ नहीं होनेवाला है। एक तरफ सरकार कर्ज़ दे रही है दूसरी तरफ वह ऐसी नीतियाँ बना रही है कि किसान कर्ज़ लौटा न पाए।

ग्राहक राजनीतिक रूप से अधिक सक्रिय हैं इसलिए उनके आधार पर ही फैसले होते हैं। “किसी वर्ष प्याज के भाव बढ़ जाने के कारण सरकार पाँच सीटों पर उप-चुनाव में हार गई तो अगले साल तुरंत ग्राहकों के हितों की रक्षा के लिए निर्यात पर पाबंदी लगा दी। जब प्याज के दाम 1 रुपये किलो थे तब फिल्मों के बाल्कनी के टिकट के दाम 2.5 रुपये थे। अब बाल्कनी के टिकट के दाम 250 रुपये हैं। इस हिसाब से प्याज के दाम 100 रुपये होने चाहिए।”, उन्होंने कहा था। किसान को ग्राहक जितना ही राजनीतिक रूप से सक्रिय होने के लिए जोशी प्रोत्साहित करते हुए कहते हैं, “किसान राजनीतिक दृष्टि से सक्रिय नहीं हो सका क्योंकि डॉ अंबेडकर जितने बड़े पैमाने पर राजनीतिक ध्रुवीकरण कर पाए, उतने बड़े पैमाने पर मैं नहीं कर पाया। यह मेरी बहुत बड़ी असफलता है।”

आज देश कृषि संकट के दौर से गुज़र रहा है। हालाँकि आज सरकारों ने मोटे समर्थन मूल्य घोषित कर दिए हैं। सरकारों का कहना है लागत से डेढ़ गुना हैं। मगर सरकार किसानों से सारा अनाज खरीद नहीं सकती। बाज़ार में समर्थन मूल्य मिलता नहीं। इसलिए किसानों में भारी आक्रोश है। परिणाम स्वरूप सरकारों को कई लोकलुभावन योजनाएँ शुरू करनी पड़ रही हैं। कहीं भावांतर योजना तो कहीं रैयत बंधु योजना। इन लोकलुभावन योजनाओं से तात्कालिक लाभ भले ही हो जाए मगर यह उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हैं।

अर्थशास्त्री अजीत रानडे शब्दों में जोशी कृषि जिंसों के लिए वायदा कारोबार के समर्थक थे, ताकि किसान सट्टेबाजी द्वारा अपनी हानि एवं जोखिम में कमी ला सकें। जोशी ने खुदरा व्यापार में बड़े निजी, विदेशी अथवा घरेलू निवेश की पैरोकारी भी की थी। उन्होंने किसान उत्पादकों की मिश्रित पूंजी कंपनियों, कृषि प्रसंस्करण एवं मूल्य शृंखला में निवेश का भी समर्थन किया था। वे कृषि उत्पादों के लिए बिचौलिये रहित समेकित राष्ट्रव्यापी बाजार के शुरुआती पैरोकारों में एक थे और किसानों के लिए मुक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुँच के इच्छुक थे।

परंतु धारा के विपरीत, उन्होंने विश्व व्यापार संगठन एवं कृषि में एक अंतर-राष्ट्रीय सौदे का समर्थन किया, क्योंकि वे उदारीकरण में भारतीय किसानों के लिए एक अवसर देखते थे। यों तो हमने जोशी के कुछ विचारों का थोड़ा-बहुत क्रियान्वयन किया है, पर यह अभी भी भारतीय किसानों के लिए उनके विजन के पूर्ण अनुपालन से कोसों दूर ही है। वे किसानों के लिए दया और भीख नहीं, गरिमा तथा आजादी चाहते थे। शरद जोशी हमेशा कहते रहे कि यदि सरकार खेती में हस्तक्षेप बंद कर दे और किसानों को खुली मंडी में अपनी उपज बेचने दे तो न किसान आत्महत्या करेंगे और न बदहाल रहेंगे।