भारती
प्याज की कीमत बढ़ने के क्या रहे कारण, मांग-आपूर्ति ताकतों में फँसा फसल का मूल्य

प्याज की बढ़ती कीमत बुधवार (4 दिसंबर) को संसद चर्चा का भी विषय बनी। लोकसभा में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने सरकार पर बढ़ते दामों के लिए प्रश्न उठाया जिसके उत्तर में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि मूल्यों को काबू में करने के लिए सरकार ने कई प्रयास किए हैं।

अक्टूबर से बढ़े प्याज के दामों के लिए केंद्र ने सब्ज़ी के आयात का निर्णय लिया है। 9 नवंबर को तय किया गया कि मूल्य नियंत्रण हेतु 1.2 लाख टन प्याज का आयात किया जाएगा।

एमएमटीसी जैसी शासन अतिरिक्त संस्था को आयात के अनुबंध तैयार करने के लिए कहा गया। हालाँकि इसके बाद ज़्यादा कुछ सुनने को नहीं मिला, बस यह पता चला कि 6,100 टन आयात का अनुबंध मिस्र से हुआ। सोमवार (2 दिसंबर) को एमएमटीसी तो तुर्की से 11,000 टन प्याज खरीदने के लिए कहा गया है।

यह आयात इस माह के मध्य से जनवरी की शुरुआत के बीच भारत आएगा। आयात बढ़ाने और निर्यात पर प्रबंध जैसे कई प्रयासों के बावजूद केंद्र प्याज मूल्यों को नियंत्रित करने में परेशानियों का सामना कर रहा है। कई खुदरा दुकानों पर प्याज का दाम 100 रुपये प्रति किलोग्राम छू रहा है।

नाशिक में कृषि उत्पाद मार्केटिंग समिति (एपीएमसी) मंडी में 2 दिसंबर को अधिकांश प्याज 6,501 रुपये प्रति क्विंटल पर बिके थे। प्राथमिक कृषि बाज़ारों का यह मूल्य खुदरा दुकानों पर दोगुना होकर उभरता है।

देशभर में कई कृषि उत्पादों का मूल्य बताने वाली वेबसाइट एगमार्केट का डाटा बताता है कि 28-30 नवंबर में प्याज का दाम 5,000 रुपये प्रति क्विंटल से नीचे गिरने के बाद दिसंबर में पुनः उछाल मार रहा है।

2 दिसंबर को समाप्त होने वाले सप्ताह का डाटा दर्शाता है कि सप्ताहांत तक 644 टन प्याज आया जो कि इसी काल में पिछले वर्ष आए 3,103 टन प्याज का 1/5 है। प्याज के मूल्यों में उछाल के कारण नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना हो रही है। सोशल मीडिया पर मीम प्रसारित हो रहे हैं जो प्याज को सोने जितना कीमती बता रहे हैं।

सिर्फ यह कहने से कोई लाभ नहीं है कि आने वाले कुछ सप्ताहों में भी मूल्य इसी स्तर पर रहेंगे लेकिन इसके पीछे के कारणों को समझना अवश्य ही महत्त्वपूर्ण है। ऐतिहासिक रूप से प्याज की कीमतें सितंबर से चढ़ना शुरू होती हैं। इनका उतार-चढ़ाव खरीफ फसल के आगमन पर निर्भर करता है जो प्रायः सितंबर के अंत तक बाज़ार में आती हैं।

भारत में जुलाई-अगस्त में बोए जाने के बाद शुरुआती खरीफ प्याज अक्टूबर से दिसंबर के बीच काटे जाते हैं। बाद वाली खरीफ फसल अक्टूबर-नवंबर में बोई जाने के बाद जनवरी से मार्च के बीच काटी जाती है और रबी प्याज दिसंबर-जनवरी में बोए जाने के बाद मार्च अंत से मई तक बाज़ारों में आते हैं।

इस प्रकार मई और अक्टूबर के बीच नए प्याज के आगमन में एक बड़ा कालखंड है जिस कारण से मूल्य बढ़ते हैं। इस काल की आपूर्ति किसानों और व्यापारियों द्वारा संग्रहित करके रखे गए प्याज से की जाती है। यह तथ्य कि रबी फसल को खरीफ फसलों से अधिक समय तक संग्रहित करके रखा जा सकता है, प्याज की आपूर्ति को बरकरार रखने में लाभकारी सिद्ध होता है।

उद्यान उत्पाद विभाग के अनुसार सितंबर-अक्टूबर में हुई भारी वर्षा ने कटाई के लिए तैयार प्याज की फसल को नुकसान पहुँचाया है। मध्य प्रदेश में कटाई के लिए तैयार 58 प्रतिशत फसल को नुकसान हुआ। खरीफ प्याज को सबसे पहले बाज़ार में पहुँचाने वाले राज्य कर्नाटक में 18 प्रतिशत नुकसान हुआ। आंध्र प्रदेश में 2 प्रतिशत फसलों का नुकसान रिपोर्ट किया गया।

महाराष्ट्र में अक्टूबर में कटाई के लिए तैयार फसल को महा चक्रवात के कारण भारी वर्षा का सामना करना पड़ा तथा वे प्रभावित हुईं। सर्वादिक प्याज का उत्पादन करने वाले इस राज्य में बेमौसम बारिश के कारण काफी फसल बर्बाद हुई।

भारतीय कृषि शोध परिषद और प्याज एवं लहसून शोध निदेशालय के अनुसार महाराष्ट्र की पूरी फसल वर्षा के कारण प्रभावित हुई है। बाद में आने वाली खरीफ फसल के भी अक्टूबर में हुई वर्षा से प्रभावित होने की आशंका है।

बारामती और पुरंदर जैसे जिलों में 80 प्रतिशत फसल बर्बाद हुई है। बीमारी के कारण 60 प्रतिशत प्याज की पसल प्रभावित हुई है व वर्षा के कारण 50 प्रतिशत प्याज की नर्सरियों पर भी असर पड़ा है जो रबी फसल के प्रति हमारी चिंताओं को और बढ़ाता है।

ऐसी परिस्थितियों में केंद्र की आलोचना करना गलत है। यदि कम आपूर्ति के कारण दाम नहीं बढ़ेंगे तो इसका अर्थ हुआ कि देश की अर्थव्यवस्था और बाज़ार में कुछ गड़बड़ है।

स्वराज्य  ने अक्टूबर-नवंबर के काल में पिछले 10 वर्षों के आयात का डाटा खंगाला। नाशिक आधारित उद्यान उत्पादों की शोध एवं विकास संस्था का डाटा दर्शाता है कि इस वर्ष अक्टूबर का आयात दशक का दूसरा सबसे कम रहा। 2011 में सबसे कम प्याज का आयात किया गया था जो मात्र 4.23 लाख टन था।

पिछले 11 वर्षों में नवंबर का सबसे कम आयात 3.88 लाख टन था। नवंबर 2008 में 3.45 लाख टन प्याज का आयात किया गया था। 2010 के बाद यह पहली बार है कि नवंबर का आयात अक्टूबर से कम रहा है। दिसंबर 2010 और जनवरी 2011 में प्याज के दामों ने सर्वाधिक ऊँचाई भरी थी और खुदरा दुकानों पर 100 रुपये प्रति किलोग्राम के मूल्य को छू रहे थे।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि 2015 से अक्टूबर-नवंबर की कुल आपूर्ति 10 लाख टन से अधिक रही है और 2016 में यह 15 लाख टन का आँकड़ा पार गई थी। पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष आपूर्ति 41 प्रतिशत कम है और यही कारण है मूल्यों के बढ़ने का।

इससे स्पष्ट होता है कि बाज़ारी ताकतों के कारण दाम बढ़े हैं। मांग और आपूर्ति की खींचातानी किसी भी अन्य बाहरी कारक से अधिक प्रबल है। ऐसा ही दिसंबर 2010-जनवरी 2011 में हुआ था। उस समय प्याज व्यापारियों और अच्छा नेटवर्क रखने वाले कुछ बड़े व्यापारियों की जमाखोरी के कारण मूल्य और बढ़े थे।

सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संस्थान व बेंगलुरु स्थित कृषि विकास और ग्रामीण रूपांतरण केंद्र द्वारा भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के लिए किया गया एक अध्ययन दर्शाता है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के किसानों की कुछ बाज़ारों में मिलीभगत के कारण प्याज के दाम बढ़े।

इस वर्ष मांग और आपूर्ति के गणित से चल रहे बाज़ार में संदेह नहीं है कि ग्राहकों को प्याज के लिए अधिक मूल्य चुकाना होगा। हो सकता है यह कीमत उठाल नव वर्ष तक भी चले।

एमआर सुब्रमणि स्वराज्य के कार्यकारी संपादक हैं। वे @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।