भारती
प्याज के बढ़े दाम चिंता का विषय नहीं बल्कि इसपर सरकार की अविचारित नीति चिंतनीय

दिल्ली में प्याज का मूल्य 80 रुपये प्रति किलो पहुँचने के बाद केंद्र सरकार ने प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के अलावा प्याज के आयात के लिए टेंडर निकालने के साथ-साथ भंडार में पड़े 80,000 टन प्याज को मुक्त भी कर दिया है। निर्यात शुल्क भी प्रति टन न्यूनतम 850 डॉलर कर दिया है।

सरकार के इस निर्णय के बाद देशभर के कई जगहों पर किसानों ने प्रदर्शन शुरू कर दिया है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या प्याज के निर्यात पर प्रतिबंध लगा देने से समस्या का समाधान हो जाएगा ?

प्याज की कीमत में बढ़ोतरी के बाद जिस तरह से तत्काल राहत देने के लिए सरकार ने निर्यात पर प्रतिबंध लगाया है, वह कृषि संकट से निपटने के लिए स्थाई निदान नहीं है। बल्कि जनता के क्रंदन को रोकने का मात्र एक प्रयास है।

सरकार में बैठे अफसरशाह नीति बनाने की बजाय प्रतिबंध लगाना ज्यादा तर्कसंगत समझते हैं और जब भी किसी तरह का नीतिगत संकट आता है तो वे उस वस्तु पर प्रतिबंध लगा देते हैं। ये उनके लिए अधिक सुविधाजनक इसलिए है क्योंकि यह सार्वजनिक जीवन में साक्षात दृष्टिगोचर है और लोगों में यह संदेश जाए कि वे कुछ कर रहे हैं।

दूसरी ओर मुनाफाखोरी को रोकने के लिए खाद्य एवं आपूर्ति मंत्रालय द्वारा निर्यात पर तत्काल प्रभाव से रोक के अलावा सरकार ने अपने आदेश में खुदरा एवं थोक व्यापारी को क्रमशः 100 किलो और 500 किलो से अधिक प्याज संरक्षित न करने को कहा है।

प्याज के इस बढ़े मूल्य का कारण पिछले वर्ष का सूखा और प्याज उगाने वाले प्रमुख प्रदेशों में मानसून का देर से पहुँचना है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक में मॉनसून देरी से पहुँचा, जिसके कारण फसल को पकने में देरी हुई।

बढ़े प्याज के दाम और इसपर सरकारी प्रतिक्रिया हमारी कृषि नीतियों की कमियाँ उजागर करती हैं। मांग और आपूर्ति की शक्तियों में यह सरकारी हस्तक्षेप हानिकारक है। मूल्य को अधिक बढ़ने से रोकने के लिए भंडार को मुक्त करना सही है लेकिन निर्यात पर रातोंरात लगा प्रतिबंध मात्र तुष्टीकरण है।

जब कभी मूल्य से किसानों को लाभ मिलने लगता है तो इस बीच में सरकारी हस्तक्षेप कृषि सुधारों को असीमित नुकसान पहुँचाता है। इससे किसानों की निराशा के साथ-साथ कर्ज़माफी, सब्सिडी और खैरातों की मांग बढ़ेगी ही।

पिछले साल महाराष्ट्र विधायिका ने कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम में संशोधनों को मंजूरी दे दी थी, लेकिन इससे पहले कि विधान परिषद (उच्च सदन) इसे पारित कर सके व्यापारियों और लोडरों के विरोध के कारण विधेयक को वापस ले लिया गया।

महाराष्ट्र कृषि विपणन (विकास और विनियमन) अधिनियम 1963 में संशोधन करने के पीछे सरकार का उद्देश्य था कि किसान एपीएमसी के बाहर आवश्यक वस्तुओं की बिक्री कर सकें, लेकिन व्यापारियों और श्रमिकों (प्रधान लोडरों) ने विरोध किया। दबाव में आकर महाराष्ट्र सरकार ने विधान परिषद से बिल वापस ले लिया।

दूसरी ओर वैश्विक वृद्धि की धीमी गति का कारण चल रहा व्यापार युद्ध था जो अब यूएस-जापान के समझौते के साथ समाप्ति की ओर है। इसी प्रकार भारत भी यूएस के साथ कई समझौते कर सकता है लेकिन इससे पहले हमें हमारी कृषि नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा, विशेषकर मनमानी आयात और निर्यात नीतियों पर।

कुछ दिनों के लिए प्याज के बढ़े दाम किसानों को लाभ पहुँचा सकते थे, भले ही इसके लिए उपभोक्ता को अतिरिक्त राशि व्यय करनी पड़ती। फिर भी हमने हस्तक्षेप करके व्यापारियों और किसानों के इस लाभ पर रोक लगा दी।

यह अवश्य है कि बढ़े प्याज के दामों को गरीबों पर दुष्प्रभाव होता लेकिन यह ऐसी वस्तु नहीं है जिसके बिना कुछ दिनों तक गुज़ारा न चल सके। ऐसी गैर अति आवश्यक वस्तुओं में सरकार को मांग-आपूर्ति को आपस में संतुलन बनाने के लिए उपयुक्त स्वतंत्रता देनी चाहिए।

हमें यह समझना होगा कि कृषि भी एक व्यापारिक गतिविधि ही है। तकनीक, भंडारन व्यवस्था और संचालन व्यवस्था में निवेश आवश्यक है। दुर्भाग्यवश बिना निजी क्षेत्र के ये सब संभव नहीं है।

सरकार की भूमिका को सीमित कर निजी पूंजी निवेश का स्वागत करना चाहिए। अगर हम टेलीकॉम, इंटरनेट और कूरियर सेवाओं को देखें तो पाएँगे कि भी निजी क्षेत्र के आगमन के बाद ही विकास की गति तेज़ हुई थी।

संभवतः ऐसा ही तब होगा जब भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के एकाधिकार को भंग करके कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) व आवश्यक वस्तु अधिनियम से छुटकारा पाया जाए। सौभाग्यवश सरकार एपीएमसी अधिनियम में सुधार पर काम कर रही है, लेकिन वर्तमान निर्यात और नियंत्रण काफी निराशाजनक हैं।

भारत के कृषि परिदृश्य को बदलने के लिए सरकार के पास एक स्वर्णिम अवसर है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के कारण हमारे पास ऐसा तंत्र है जो किसानों को प्रत्यक्ष आय सहायता प्रदान कर सके।

इसके बाद सरकार को किसानों से खरीदी बंद करके सार्वजनिक विपणन प्रणाली (पीडीएस) को भी ध्वस्त कर देना चाहिए जिससे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके।

हमारी मूल्य नीति इतनी विकृत और किसान-विरोधी है कि कृषि क्षेत्र के पास अतिरिक्त सामग्री नहीं बचती जिसका विनिर्माण क्षेत्र में  उपयोग हो जाए। इसी मूल्य नीति के चलते किसानों को अपनी फसल के योग्य सही राशि नहीं मिलती है।

एफसीआई को मात्र विशेष कार्य दिए जाने चाहिए जो भंडारण और संचालन की देख-रेख करे। निजीकरण से भारत की कृषि आपूर्ति श्रृंखला में व्यवसायिक प्रबंधन लाया जा सकेगा। साथ ही किसानों और कृषि कंपनियों को भी आयकर के दायरे में लाया जा सकेगा।

एक तरफ सरकार ने 2022 तक किसानों की आय को दुगुनी करने का लक्ष्य रखा है और दूसरी ओर निर्यात प्रतिबंध जैसे कदम इसकी स्वयं की नीतियों के लिए हानिकारक हैं। उपयुक्त नीति वह होगी जब आयात-निर्यात पर तत्काल लिए जाने वाले निर्णयों को त्यागा जाए और बाज़ार में व्यवधान उत्पन्न न किया जाए।

लेकिन ऐसी ठोस नीतियों में राजनीतिक उद्देश्य आड़े आ जाते हैं। कृषि नीतियों में सुधार कभी कष्टमुक्त नहीं हो सकते हैं। अल्पावधि के लिए भले ही वे आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित करेंगे लेकिन यदि हम दीर्घावधि में किसानों को अधिक कुशल और उच्च आय अर्जनकर्ता बनाना चाहते हैं तो बाज़ार सुधार ही कुंजी है।

यदि हम वास्तव में किसानों और उपभोक्ताओं को लाभ पहुँचाना चाहते हैं तो बाज़ार-समर्थक प्रयास ही विकल्प हैं। इस प्रकार के तत्कालिक निर्णय किसी समस्या का समाधान नहीं करने वाले।