भारती
ओली की भारत-विरोधी आक्रामकता उलटा असर दिखाकर नेपाल में मचा सकती खलबली

नेपाल के प्रधानमंत्री खड्ग प्रसाद शर्मा ओली भारत-विरोधी परियोजना जिसमें नेपाल के राष्ट्रीय चिह्न में दिखाए जा रहे मानचित्र में भारत के उत्तराखंड के भी कुछ भाग हैं, इस सप्ताह संसद में लाने वाले हैं।

इससे घरेलू स्तर पर अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाकर अंधराष्ट्रीयता के माध्यम से वे अपनी कुर्सी की चुनौतियों को टालने में भले ही सफल हो गए हों लेकिन अनिच्छापूर्वक उन्होंने उन संकटों के लिए द्वार खोल दिए हैं जिनसे निपटना उनके लिए कठिन होगा।

इस संकट का संकेत तब मिला जब पिछले सप्ताह जनता समाजबादी पार्टी नेपाल (जसपा) ने देश के संविधान में संशोधन की माँग को पुनः उठाया जिससे ओली दूर भागते हैं।

जसपा मधेशियों की प्रमुख पार्टी है जो नेपाल की जनसंख्या का 19 प्रतिशत भाग हैं और भारत से उनके घनिष्ठ संबंध हैं। इसने माँग की है कि राष्ट्रीय चिह्न को बदलने के लिए संविधान में किए जाने वाले संशोधन के साथ इसकी माँगों को पूरा करने का भी उपयुक्त समय है।

जब से 2015 में नया संविधान स्वीकारा गया है, तब से मधेशियों की माँग है कि इसमें संशोधन करके प्रांतीय सीमाओं को पुनः बनाया जाए, क्षेत्रीय भाषाओं को आधिकारिक दर्जा मिले, नागरिकता संबंधी समस्याओं को संबोधित किया जाए और राष्ट्रीय सभा (नेपाल की द्विसदनीय संसद का उच्च सदन) में प्रतिनिधित्व का विस्तार हो।

नेपाली संसद

2015 (तब ओली प्रधानमंत्री थे) में संविधान के अंगीकरण के बाद अन्य संजातीय समूहों समेत मधेशियों ने तीव्र और कुछ स्थानों पर हिंसक विरोध किए थे जिसके कारण मधेशी के प्रभुत्व वाले तराई क्षेत्र से भारत और नेपाल के मध्य वस्तुओं का आवागमन रुक गया था। ओली ने इस बाधा का आरोप भारत पर लगाते हुए अवसर का लाभ उठाकर चीन से संबंध बढ़ाने शुरू कर दिए।

आंतरिक सत्ता संघर्ष के कारण 2016 के मध्य में ओली को प्रधानमंत्री का पद त्यागना पड़ा लेकिन उन्होंने उनकी सरकार को गिराने का आरोप भी भारत पर ही लगाया। फरवरी 2018 में सत्ता में लौटने के बाद ओली दृढ़ता से भारत-विरोधी रेखा पर चल रहे हैं और देश को चीन के निकट ले जा रहे हैं।

लेकिन कम प्रसासनिक कौशल के साथ हठी और पृथक चलने वाले ओली ने पिछले माह अपनी कुर्सी के लिए एक चुनौती का सामना किया था। चीन के हस्तक्षेप से ही ओली बच पाए।

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में लिपुलेख तक सड़क उद्घाटन ने ओली को घरेलू विफलताओं से ध्यान भटकाने और पार्टी में ही अपने शक्तिशाली प्रतिद्वंद्वियों से कुर्सी बचाने का अवसर दे दिया। भारत सीमा पर नेपाल लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी के कुल 335 स्क्वायर किलोमीटर क्षेत्र का दावा करता है।

वीडियो सम्मेलन के माध्यम से सड़क उद्घाटन करते रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

पहाड़ों के बीच से कैलाश मानसरोवर जाने वाली पगडंडी पर भारत ने 75.5 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क लिपुलेख तक बना दी है, इससे आगे तिब्बत शुरू हो जाता है। इसपर राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाने के लिए ओली ने अपनी अंधराष्ट्रीयता का प्रदर्शन किया। कुछ लोगों का मानना है कि चीन के भड़कावे पर नेपाल ने ऐसा किया।

पिछले सप्ताह नेपाल ने एक नया राजनीतिक मानचित्र सार्वजनिक किया था जिसमें पिथौरागढ़ जिले के 335 स्क्वायर किलोमीटर के भाग को इसने अपना बताया। इसके बाद घोषणा हुई कि संविधान में संशोधन करके राष्ट्रीय चिह्न को नए मानचित्र के अनुसार अद्यतित किया जाएगा।

रविवार (31 मई) को निचले सदन में नेपाल के कानून मंत्री शिव माया तुंबाहंफे ने संशोधन विधेयक प्रस्तावित किया। संवैधानिक संशोधन विधेयक को दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एनसीपी) के पास 59 सदस्य वाले उच्च सदन में तो दो-तिहाई बहुमत है लेकिन निचले सदन में यह बहुमत के आँकड़े से 10 सीट पीछे है।

विधेयक का पारित होना लगभग तय है क्योंकि 63 सदस्यों वाली नेपाली कांग्रेस (एनसी) और 33 सदस्यों के साथ जसपा ने भी इसे “राष्ट्रीय महत्त्व” का मुद्दा मानते हुए इसपर समर्थन व्यक्त किया है। हो सकता है कि सरकार संशोधन विधेयक को सर्व-सम्मति से भी पारित कराने में सफल हो जाए।

लेकिन समस्या मधेशियों की माँग पूरा करने वाले दूसरे संवैधानिक संशोधन विधेयक में है जिसकी माँग जसपा करती है। मधेशियों की माँग का समर्थन करने वाली नेपाली कांग्रेस ने निर्णय किया है कि वह उनकी माँगों को पूरा करने वाला दूसरा सेवाधानिक संशोधन विधेयक प्रस्तावित करेगी।

तत्कालीन प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउवा (वर्तमान में नेपाली कांग्रेस अध्यक्ष) के नेतृत्व में एनसी सरकार 2017 में मधेशियों की माँग को पूरा करने वाला संवैधानिक संशोधन विधेयक लेकर आई थी। लेकिन ओली के नेतृत्व में विपक्ष ने इसमें बाधा डाल दी थी।

शेर बहादुर देउवा

592 सदस्यों की संसद में विधेयक पारित कराने के लिए 395 मतों की आवश्यकता होती है। उस समय उपस्थित 553 सदस्यों में से इसके पक्ष में 347 मत पड़े थे और विरोध में 206 मत। ओली मधेशियों की माँग का निरंतर विरोध करते आ रहे हैं। वहीं मधेशियों का मानना है कि 2015 में स्वीकृत हुआ संविधान उनके प्रति भेदभाव करता है।

मधेशियों का मानना है कि 2015 के संविधान के तहत बने नई प्रांत सीमाएँ उन्हें उचित प्रतिनिधित्व नहीं देती हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि सीमाएँ पुनः बनाई जाएँ। वे तराई क्षेत्र में सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी समेत अन्य क्षेत्रीय भाषाओं को नेपाली के समान दर्जा दिलवाना चाहते हैं।

उनका यह भी मानना है कि नागरिकता के मामले में भी संविधान मधेशियों से भेदभाव करता है। अविवाहित महिलाओं के बच्चों को नागरिकता नहीं दी जाती, साथ ही यदि नेपाली महिला नेपाल में ही रहने वाले गैर-नेपाली से विवाह करे तो उसकी संतान को भी नागरिकता नहीं मिलती है।

मधेशियों के बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के साथ घनिष्ठ संबंध हैं और वे अपनी पुत्रियों को भारतीय पुरुषों से ब्याहते भी हैं, ऐसे में उनके बच्चे नए संविधान के नागरिकता कानून के कारण प्रभावित हो रहे हैं।

उनकी दूसरी प्रमुख माँग 59 सदस्यों वाली राष्ट्रीय सभा में सदस्यों की संख्या बढ़ाने को लेकर है। वर्तमान में सातों प्रांत आठ-आठ प्रतिनिधि चुनते हैं और तीन सदस्यों को सरकार चुनती है। मधेशियों का मानना है कि उच्च सदन में उन्हें उचित प्रतिनिदित्व नहीं मिलता है।

उच्च सदन में केवल तीन मधेशी हैं जो सदस्य संख्या का 5 प्रतिशत है जबकि देश में उनकी जनसंख्या कुल जनसंख्या की 20 प्रतिशत है। मधेशी ओली पर भी संदेह करते हैं और मानते हैं कि उन्होंने कई बार समुदाय के पीछ में छुरा भोंका है। वे मानते हैं कि 2015 में ओली ने उनके साथ भेदभाव किया था। नए संविधान से पहले ओली ने मधेशियों को आश्वस्त किया था कि उनकी माँगे पूरी की जाएँगी।

2018 में मधेशियों की दो प्रमुख पार्टियाँ- समाजबादी पार्टी नेपाल और राष्ट्रीय जनता पार्टी नेपाल ओली सरकार से जुड़ गए यह सोचकर कि उनकी माँगों को पूरा करने के लिए सेवैधानिक संशोधन किया जाएगा। लेकिन सीधे मुँह से दब ओली ने इसे नकारी दिया तो एक साल के भीतर ही कुछ महीनों के अंतराल पर दोनों पार्टियों ने सरकार छोड़ दी।

ओली पर अविश्वास का मधेशियों के पास एक और ठोस कारण है। पिछेल माह अचानक से ओली ने दो अध्यादेश प्रवर्तित किए जो समाजबादी पार्टी में फूट का कारण बन सकते थे। उनकी पार्टी के वरिष्ठ सदस्यों समते संवैधानिक विशेषज्ञों और कानूनविदों ने ओली के इस कृत्य की कड़ी आलोचना की।

इस प्रयास ने उलटा असर दिखाया और उनमें फूट पैदा होने की बजाय दोनों मधेशी पार्टियों ने विलय कर जनता समाजबादी पार्टी नेपाल बना ली। एकजुट हुए मधेशी अब एक दो-तरफा सौदे की माँग कर रहे हैं- संविधा में संशोधन हो तो राष्ट्रीय चिह्न में परिवर्तन के साथ-साथ मधेशियों की माँग पूरी करने वाले संशोधन भी हों।

लेकिन ओली विपक्ष की इस माँग को नकार देंगे देश में एक और असंतोष ले आएगा। सत्ताधारी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेता मधेशियों की माँग के प्रति सहानुभूति रखते हैं और इस विषय पर ओली की कट्टरता का विरोध वे करेंगे।

इस प्रकार आने वाले सप्ताहों में ओली के सामने दोहरी समस्याएँ होंगी- मधेशियों का विरोध जो तीव्र होकर कोरोनावायरस महामारी से जूझ रहे देश में उथल-पुथल मचा सकता है और पार्टी के आंतरिक संघर्षों से उनकी कुर्सी के लिए चुनौती उत्पन्न हो सकती है।

जिस प्रकार मधेशी पार्टियों में फूट डालने की उनकी चाल का उलटा प्रभाव पड़ा था, उसी प्रकार ओली की अंधराष्ट्रीयता और भारत-विरोधी शब्दाडंबरों का भी उलटाअसर हो सकता है।

जयदीप मज़ूमदार स्वराज्य में सहायक संपादक हैं। वे @joyincal09के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।