भारती
आक्रामक कार्रवाई उपयुक्त स्थान पर अच्छी होती है, अन्यथा दूसरे माध्यम- कुरल भाग 36

प्रसंग- 2 अगस्त 1969 के स्वराज्य अंक में प्रकाशित कवि तिरुवल्लुवर के आक्रामक कार्रवाई पर चयनित कुरलों का हिंदी अनुवाद।

राजाओं की आक्रामक कार्रवाई पर लिखे कुरल व्यावहारिक कौशल के साथ परिचालन अनुभव के लंबे इतिहास को भी दर्शाते हैं।

  1. पूरे सोच-विचार के बाद ही निर्णय लिया जाना चाहिए। लेकिन एक बार निर्णय करने के बाद कार्य करने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।
  2. कुछ कार्य होते हैं जिन्हें लंबे समय में किया जाना चाहिए। कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें तुरंत किया जाना चाहिए, उनमें देरी घातक होती है।
  3. जहाँ उपयुक्त हो, वहाँ आक्रामक कार्रवाई अच्छी होती है। जहाँ इसे सफल करना कठिन हो, वहाँ अन्य माध्यम अपनाएँ।
  4. किसी आक्रामक परिचालन को शुरू करना और शत्रु को पूरी तरह से पराजित किए बिना छोड़ देना सबसे घातक है। अकुशल आक्रामकता और शत्रुता के कारणों का पूरी तरह सफाया असुरक्षित है, पूरी तरह न बुझाई गई आग की तरह। समय के साथ समस्या बढ़ भी सकती है।
  5. आक्रमण शुरू करने से पहले जय या पराजय निश्चित करने वाले पाँच बिंदुओं पर संपूर्ण विचार कर लें- उपकरण, सैन्यबल, समय और स्थान की अनुकूलता या प्रतिकूलता व अभियान की प्रकृति।
  6. पूरा दृश्य समझने के लिए सोचें कि अभियान के दौरान किन समस्याओं का सामना करना होगा और अभियान में सफलता से क्या प्राप्त होगा।
  7. ये सब सोचने के बावजूद किसी ऐसे व्यक्ति से परामर्श करना चाहिए जिसे ऐसे अभियान का अनुभव हो ताकी वह कुछ आंतरिक जानकारियाँ दे सके।
  8. जैसे एक हाथी की सहायता से दूसरे हाथी को नियंत्रित किया जाता है, उसी प्रकार से एक अभियान के अनुभव दूसरे अभियान की सफलता में सहायक होते हैं।
  9. अपने सहयोगियों से सौहार्द अभिव्यक्त करने से अधिक चपलता शत्रु से मतभेदों को शांत करने में दिखाएँ।
  10. अगर आपका सैन्यबल कम है तो आगे बढ़कर शांति प्रस्ताव रखें। अपनी सेना को हार और हतोत्साह का स्वाद न चखने दें।