भारती
वरीयता सूची में बेहतर स्थान से अधिक आवश्यक उच्च शिक्षा संस्थानों का सामर्थ्य विकास

2014 से नरेंद्र मोदी सरकार ने विश्व में भारतीय उच्च शिक्षा की वरीयता बढ़ाने के लिए कई प्रयास किए हैं। ऐसा करना स्वाभाविक है क्योंकि भारत विश्व शक्ति बनने के साथ-साथ विश्व गुरु की अपनी खोई हुई उपाधि को भी वापस प्राप्त करना चाहता है।

अंतर्राष्ट्रीय मैदान में भारत की ओर सबका ध्यान आकर्षित करने में शिक्षा की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका होने वाली है। विश्व के विभिन्न हिस्सों से जब छात्र भारत पढ़ने के लिए आएँगे तो उनके दृष्टिकोण पर भारत का प्रभाव रहेगा, यह एक सर्वश्रेष्ठ नर्म शक्ति है।

वर्तमान में इस क्षेत्र में यूनाइटेड स्टेट्स (यूएस) निर्विवाद विजेता है। विश्व की दूसरी सबसे प्रभावशाली शक्ति चीन तेज़ी से विकास कर रहा है ताकि शिक्षा के क्षेत्र में यूएस के वर्चस्व को चुनौती दे सके। ऐसे में अपने लिए जगह बनाने के लिए भारत के ठोस प्रयास स्वाभाविक हैं।

मोदी सरकार के कुछ नूतन प्रयासों में भारतीय प्रबंधन संस्थानों को दी जाने वाली अभूतपूर्व शैक्षणिक और आर्थिक स्वायत्तता, प्रदर्शन के आधार पर उच्च शिक्षण संस्थानों की विभिन्न-स्तरीय स्वायत्तता, विनियामक नियंत्रण से 20 शीर्ष संस्थानों- 10 सार्वजनिक और 10 निजी- को मुक्त किया जाना और ‘स्वयं’ प्रयास के तहत मासिव ऑनलाइन ओपन कोर्स (मूक) की शुरुआत है जहाँ शीर्ष संस्थानों के अध्यापक मुफ्त में पढ़ाते हैं।

इसके अलावा सात नए आईआईएम, छह नए आईआईटी, इंफ्रास्ट्रक्टर विकास के लिए संस्थानों की वित्तीय सहायता के लिए उच्च शिक्षा फंडिंग एजेंसी की स्थापना, उच्च शिक्षा विनियामक परिषद की स्थपाना, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी जैसे अनेक प्रयास किए गए हैं।

विदेशी शिक्षकों और छात्रों को आकर्षित कर सरकार विश्वविद्यालयों के आंतरिक स्थानों पर भी अंतर्राष्ट्रीयकरण का प्रयास कर रही है। 2018 में शुरू किए गए स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम का उद्देश्य विदेशी छात्रों की संख्या वर्तमान की 40,000 से बढ़ाकर 2 लाख के पार पहुँचाना है।

एक तरफ ये प्रयास अच्छे हैं लेकिन दूसरी ओर सरकार विश्व वरीयता सूची (विशेषकर क्यूएस और टाइम्स) में भारत के विश्वविद्यालयों का स्थान बढ़ाने को अत्यधिक महत्त्व दे रही है। सतही स्तर पर यह प्रयास बुरा नहीं लगेगा लेकिन इसका विवरण जानने पर हम इसे विनाशकारी पाते हैं।

विश्व स्तर पर विश्वविद्यालयों की वरीयता के लिए आवश्यक बिंदु पश्चिम के विश्वविद्यालयों की संरचना के अनुसार कल्पित किए गए हैं। इस प्रकार पश्चिम के विश्वविद्यालय अनायास की लाभ की स्थिति में आ जाते हैं और भारत का वरीयता में नुकसान होता है।

उदाहरण देखें कि यूएस के शीर्ष विश्वविद्यालयों में विभिन्न शाखाओं में 100-200 पाठ्यक्रमों का होना असामान्य बात नहीं है जहाँ अभियांत्रिकी से प्रबंधन और कला से विज्ञान तक सभी पाठ्यक्रम होते हैं।

वहीं भारत में विभिन्न विषयों के लिए अलग-अगल विश्वविद्यालय होते हैं जैसे अभियांत्रिकी के लिए आईआईटी हैं, प्रबंधन के लिए आईआईएम, विज्ञान के लिए आईआईएससी, कानून के लि एएनएलयू, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) उदार कलाओं के लिए, आदि।

भारतीय शासन ने उच्च शिक्षण संस्थानों को ऐसे ही स्थापित किया है। इनका उद्देश्य था कि हर संस्थान किसी विषय पर केंद्रित हो, न कि ऐसे विश्वविद्यालय बनें जहाँ सबके लिए सब कुछ है। लेकिन अब ये विश्व वरीयता में सुधार करने के लिए पश्चिमी विश्वविद्यालयों का अनुकरण कर रहे हैं जबकि वास्तविक संसार में इन वरीयताओं की अधिक भूमिका नहीं होती।

यह प्रयास सफल होगा या नहीं, इसपर अभी कुछ कहा नहीं जा सकता लेकिन जिन क्षेत्रों में उन्हें कम जानकारी है या कम अनुभव है, उसकी शाखाएँ खोलकर वे उन क्षेत्रों पर अपना पूरा ध्यान नहीं दे पाएँगे जिन्हें उन्होंने इतने दशकों में विकसित किया है।

पिछले कुछ वर्षों में आईआईटी और आईआईएम में उदार कलाओं के पाठ्यक्रम चलाने का चलन चला है। इन विषयों में शिक्षकों और पाठ्य सामग्री की गुणवत्ता की वर्तमान स्थिति चिंताजनक है। इस प्रकार हम शैक्षणिक उत्कृष्टता के लिए जाने जाने वाले शीर्ष संस्थानों में छोटे जेएनयूओं को जन्म देंगे।

इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि आईआईटी, आईआईएम सामाजिक विज्ञान को अपने विशेषज्ञता प्राप्त विषयों में मिश्रित न करें। उदाहरण के लिए दिल्ली की ट्रिपल आईटी ने 2017 में एक बीटेक पाठ्यक्रम शुरू किया था जो कम्प्यूटर विज्ञान और सामाजिक विज्ञान का मिश्रण था। इसका उद्देश्य था कि हम ऐसे सामाजिक वैज्ञानिक उत्पन्न कर सकें जो कम्प्यूटेशनल तकनीक को समझते और उपयोग करना जानते हों।

आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों के लिए यह सही और अद्वितीय प्रयास है जहाँ आँख मूंदकर सामाजिक विज्ञान शाखाओं को केवल विश्व वरीयता सूची में बेहतर स्थान प्राप्त करने के लिए न खोला जाए।

विश्व वरीयताओं में दूसरा बिंदु है अंतर्राष्ट्रीयकरण महत्त्व। क्यूएस और टाइम्स  दोनों वरीयता सूचियों में अंतर्राष्ट्रीय छात्रों व अंतर्राष्ट्रीय अध्यापकों की संख्या के आधार पर कुछ अंक दिए जाते हैं। इसी कारण से भारत का स्टडी इन इंडिया कार्यक्रम शुरू हुआ।

ये दोनों प्रयास सराहनीय हैं लेकिन इनके कारण हमारा ध्यान अच्छे शोधकार्य पर निवेश करने से न भटके। शोध एवं विकास पर सरकार द्वारा खर्च की जाने वाली राशि बहुत छोटी है और उससे काफी कम है जो शीर्ष वरीयता प्राप्त करने वाले संस्थानों में खर्च की जाती है।

दूसरा अंतर जो हमें समझना होगा वह यह है कि हमारे शीर्ष शैक्षणिक संस्थान सार्वजनिक हैं और इसलिए वहाँ सामाजिक न्याय के लिए 60 प्रतिशत सीटों पर आरक्षण के कारण प्रतिभा के साथ समझौता करना पड़ता है। यदि हम शोध, आउटपुट, प्लेसमेन्ट, आदि की गुणवत्ता पर बात कर रहे हैं तो इस कारक को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।

विश्व वरीयताओं का पीछा करते हुए उच्च शिक्षा मॉडल में परिवर्तन करने की बजाय हमारे सामर्थ्य को विकसित करने पर कार्य किया जाना चाहिए। 2019 कि क्यूएस रैंकिंग देखें। शीर्ष 200 में हमारे केवल तीन संस्थान आए।

लेकिन जब विषय विशिष्ट वरीयता देखी जाए तो हमने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। अभियांत्रिकी और प्रबंधन के क्षेत्र में क्रमशः शीर्ष आईआईटी और आईआईएम शीर्ष 50 में आए और तीन आईआईटी व तीन आईआईएम शीर्ष 100 में। प्रति प्राध्यापक के साइटेशन में आईआईएससी विश्व में दूसरे स्थान पर था।

यह अच्छा प्रदर्शन है और हम यदि इन्हें अनदेखा कर कुल रैंकिंग को ही देखते रहेंगे तो हो सकता है अच्छा करने की बजाय हम नुकसान कर बैठें।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।