भारती
राष्ट्र की उन्नति हेतु चिंतन का सकारात्मक उपक्रम है राष्ट्रवाद— चयनात्मक संवेदना भाग-3

प्रसंग- चयनात्मक हो चुकी राष्ट्र की संवेदना पर विश्लेषण का तीसरा भाग।

स्वतंत्रता से पूर्व ‘अखंड भारत’ का वास्तविक अर्थ कुछ इस प्रकार रहा–हम एक हैं। अखंड, एक तत्व है, शक्ति है जैसे आत्मा या ब्रह्म एक है और वह अनेक जीवों में अपने को प्रकट करता है। उसी तरह से एक अखंड अविभाज्य भारतीय आत्मा है। वह भारतीय आत्मा ही जैसे अपने को विविध रूपों में अभिव्यक्त करती है। यह प्रदेश और राज्य और भाषाएँ और संस्कृतियाँ और धर्म उससे उद्धृत होते हैं।(नामवर सिंह, ज़माने से दो-दो हाथ, राजकमल प्रकाशन, 2010, पृ 131)

परंतु कालांतर में आयातित विचारधारा के दुष्ट-धूर्त संवाहकों और प्रचारकों ने वर्ग-वार, जाति-वार, लिंग-वार, क्षेत्र-वार वैमनस्य भाव उत्पन्न कर एक में दूसरे के प्रति घृणा का इतना विष भर दिया है कि हर कोई अपनी-अपनी जगह अकेला-अकेला खड़ा है। इस स्थिति में रामानंद सागर निर्मित ‘रामायण’ के गीत की ये पंक्तियाँ सहज ही स्मरण आती है–

यही रात अंतिम, यही रात भारी। नहीं बंधु-बांधव, न कोई सहायक। अकेला है लंका में लंका का नायक। सभी रत्न बहुमूल्य रण में गँवाए, लगे घाव ऐसे कि भर भी न पाए। दशानन इसी सोच में जागता है कि जो हो रहा है उसका परिणाम क्या है? यह बाजी अभी तक न जीती, न हारी।

गहराई से सोचने-विचारने से प्रतीत होता है कि औपनिवेशिक दासता और हस्तांतरण से सत्ता हस्तगत करने वालों ने हमारी अखंडता को पूरी तरह खंड-खंड कर दिया है। हमारे लोक-जीवन में उपस्थित हमारा मतैक्य, सर्वपंथ-मान्यता, अनंतरूपता में एकरूपता और उदारता के बरक्स कपोल कल्पित नैरेटिव गढ़कर उसे पतन के गर्त में धकेलने हेतु हरसंभव प्रयास किए गए हैं।

हमारे जीवन में सहज उपस्थित सहअस्तित्व, सहजीवन, समन्वय, समरसता, सौहार्द को ध्वस्त करने वाले विभाजनकारी विमर्श गढ़े और परोसे गए हैं। एक के मन में दूसरे के प्रति घृणा भाव जाग्रत कर दिया गया है। अतः संवेदना पतनोन्मुख हो चुकी है, स्वत्व-परत्व का संकीर्ण भाव तमाम दुराग्रहों के कारण बृहत्तर होता गया है/जा रहा है।

‘सघन अनुभूति’ का स्थान ‘सघन चयनात्मक अभिव्यक्ति’ ने ले ली है। पहले हम सभी साथ थे, पास थे और एक-दूसरे के लिए खास भी थे। आज हमारी पोशाकों की तरह हमारी संवेदनाएँ भी या तो चयनात्मक होती हैं अथवा वह ‘शो-ऑफ’ के लिए ही होती हैं।

सिलेक्टिव संवेदना के गहराते इस संकट के दौरान हमें हमारे विस्मृत तत्व-चिंतन, बोध-परंपरा की स्मृति को पुनर्जाग्रत करना होगा। गांधी ने उन दिनों कहा था– शिक्षित लोगों के अंदर दया-भाव सूख गया है। इस बात से मैं हमेशा चिंतित रहता हूँ।” (सं. विष्णु प्रभाकर, संगठन में ही शक्ति है, सस्ता साहित्य मंडल, दिल्ली 1969, पृ 63)

अब तो विष्णु प्रभाकर की तरह कहना भी कठिन हो गया है कि “कवि अपने प्रति ईमानदार है और अपने परिवेश के प्रति उत्तरदायित्व से परिचित है। उसकी अनुभूति तीव्र और दृष्टि व्यापक है। (वर्जनाओं के बीच, बुलाकीदास ‘बावरा’, संजीव प्रकाशन, बीकानेर 1979, भूमिका) 

समकालीन समय में जनसाधारण की स्थिति फिर भी ठीक है। कवि-लेखक-चिंतक-आलोचक-पत्रकार की दुर्गति यह है कि न वह अपने प्रति ईमानदार है और न परिवेश के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह करने का विवेकवान विचार ही उसमें शेष है। यह स्थिति मर गया देश, अरे जीवित रह गए तुम वाली स्थिति से क़तई भिन्न प्रतीत नहीं होती। यह कथन ‘करेला ऊपर से नीम चढ़ा’ जैसा है।

भारतीय कवि-लेखक-चिंतक-आलोचक-पत्रकार को रुचेगा नहीं परंतु मानवीय भाव-बोध एवं संवेदना में होते पतन को दृष्टिगत रखते हुए उनके पुनरुज्जीवन एवं विकास के लिए इस सत्य का सेवन करना अत्यंत अनिवार्य है। मानवीय संवेदना को हुआ मधुमेह इससे संतुलित ही नहीं अपितु पूर्णतः ठीक हो सकेगा।

प्रश्‍न स्वीकृति और बोध का है। हमें इसका सहज बोध भी आवश्यक है और निर्विवाद स्वीकृति भी! ज्ञान भी आवश्यक है और संवेदना भी! इनकी अनुपस्थिति और ह्रास की स्थिति में हम पसु बिनु पूँछ विषानही कहलाने योग्य होंगे। धर्मपाल ने सबको सचेत करते हुए यथेष्ट ही लिखा है–

अपनी पराजय को लेकर क्रंदन या विलाप या शोक करते रहना बंद करना होगा। विश्‍व के सभी समाज जय-पराजय के अलग-अलग क्रमों से, उतार-चढ़ाव से गुज़रते रहे हैं। हम अपने को बहुत अलग, अनोखा या बहुत विशेष हीन न मानें। (वही, पृ 80)

संपन्न एवं सदसद्‌विवेक के साथ राष्ट्रहित में एकजुट होने के प्रण और उसकी सिद्धि से ही संवेदनाओं के ह्रास को रोका जा सकता है। तब ही अखंड भारत का सुंदर संपूर्ण चित्र देखने लायक हो सकता है। हमें अपनी जड़ों की खोज करनी होगी और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ना होगा। यह तब ही संभव है, जब हम खंड-खंड कर देने वाले ‘बौद्धिक साम्राज्यवादी’ परंपरा से सचेष्ट और यथेष्ट बचेंगे। धर्मपाल ने उचित ही लिखा है–

अपने राजनीति-तंत्र (पॉलिटी) के पुनर्गठन की प्रक्रिया में हमें समाज की विविध इकाइयों के आज के संबंध बदलने होंगे तथा अपनी मान्यताएँ भी विवेक की कसौटी पर कसते रहनी होंगी। जिस प्रकार अभिजनों में वृहत् समाज से अपने संबंध की मान्यता विकृत हुई है, वैसी ही कई अन्य मान्यताएँ भी विकृत हुई हैं। परंपरागत मान्यताओं के स्वरूप के संबंध में भ्रांतियाँ बढ़ी हैं तथा समझ गलत हुई है। भ्रांति को मिटाना होगा तथा समझ को सही करना होगा।” (वही, पृ 102)

प्रसिद्ध साहित्यकार निर्मल वर्मा ने स्वतंत्रता के पचास वर्ष पूर्ण होने पर ‘मेरे लिए भारतीय होने का अर्थ’ लेख में लिखा था– स्वतंत्रता को मिले पचास वर्ष गुज़र गए। मैं क्या सोचता हूँ? लोग पूछते हैं, परिचर्चाएँ होती हैं, जश्‍न मनाए जाते हैं– लेकिन फिर भी लगता है, जैसे हाथ से कुछ छूट गया है, कोई भरा-पूरा प्रतीक, जिसको हम उस ज़मीन, ज़मीन के टुकड़े के साथ संपृक्त कर सकें, जिसे देश की संज्ञा दी जाती है; क्या मैं उसे प्यार करता हूँ? क्या ज़मीन के एक टुकड़े से प्यार किया जा सकता है, जिसका अपना आकाश है, समय है, अतीत है; जहाँ जीते हुए लोग ही नहीं, मृतात्माएँ भी बसती हैं।

देशभक्ति, देशप्रेम… क्या ये सिर्फ थोथे शब्द हैं, जिन्हें हमारे आधुनिक बुद्धिजीवी मुँह पर लाते हुए झिझकते हैं, जैसे वे कोई अपशब्द हों, सिर्फ एक सतही सस्ती भावुकता, और कुछ नहीं? कौन स्वतंत्र हुआ? वे हिकारत से पूछते हैं… गरीब, अमीर, छोटे, बड़े, कौन? और यदि कोई उत्तर में कहे… मैं और तुम नहीं, बल्कि… वह, जो हमारे बीच में है, हमें बाँधता हुआ, शताब्दियों से हमें ‘हम’ बनाता हुआ, खुद अदृश्य होते हुए भी हमें एक परिदृश्य में अंकित करता हुआ… क्या है यह? क्या इस अनाम भावना को कोई नाम दिया जा सकता है?” (सौजन्य– हिंदी समय)

यही ‘अनाम भावना’ हमारे लिए राष्ट्रवाद (राष्ट्र सर्वोपरि) की ख़ुराक है। भारत की आत्मा को बचाने के लिए इस ‘अनाम भावना’ को पुनः जाग्रत करने की आवश्यकता है (आधुनिक बुद्धिजीवियों की परवाह किए बग़ैर!)। भारत के लिए ऐसी ‘अनाम भावना’ रखने वालों के लिए नामवर आलोचकों ने ‘भारत व्याकुल’ जैसी संज्ञाएँ दी हैं।

नैरेटिव गढ़ने वाले ‘आधुनिक बुद्धिजीवियों’ ने राष्ट्रवाद को ‘उग्र’ और ‘विषैला’ इत्यादि नकारात्मक ‘टैग’ के साथ उसे ‘कट्टरतावाद’ कहने और प्रचारित-प्रसारित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ी है। ऐसा करते हुए वे जर्मनी में यहूदीवाद के विरुद्ध हुए एडोल्फ़ हिटलर की तानाशाही का प्रकारांतर से वर्णन करते हैं। उनके अनुसार राष्ट्रवाद की अंतिम परिणति संप्रदायवाद में होती है। परंतु, ऐसे वर्तमान में ‘राष्ट्रवाद’ को नए सिरे से अवधारणाबद्ध करने की आवश्यकता है।

हमें ‘राष्ट्रवाद’ को समझने से पूर्व कबीर के गुरु संबंधी वचनों को सुनने-समझने की आवश्यकता है। कबीर ने कहा था– “जाका गुरु भी अंधला चेला खरा निरन्ध। अंधे अंधा ठेलिया दोऊ कूप पड़त।।” ऐसा गुरु भला क्या पथ दिखाएगा? इसीलिए कबीर में ‘सतगुरु’ शब्द की बारंबारता अधिक दृष्टिगोचर होती है। “सतगुरु की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघारिया, अनंत दिखावन हार॥” जिस गुरु में सत्, सत्त्व एवं स्वत्व होगा वह राष्ट्रहित में राष्ट्रवाद की आवश्यकता को उचित रूप में परिभाषित करेगा।

जानने-समझने की आवश्यकता है कि राष्ट्रवाद राष्ट्र की उन्नति हेतु सदसद्‌विवेक के साथ चिंतन और सत्कर्म करने का सकारात्मक उपक्रम है। अतः मनोवैज्ञानिक आधार पर आधुनिक बुद्धिजीवियों द्वारा प्रचारित-प्रसारित उग्रता और कट्टरता का स्वयमेव खंडन हो जाता है कि उग्रता एवं कट्टरता से व्यक्ति में रोष उत्पन्न होता है और क्रोध का प्रभाव व्यक्ति के चित्त, चेतना और चिंतन पर पड़ता है।

कहा जा सकता है कि कुछ व्यक्तियों की सोच उग्र हो सकती है। हमें व्यक्ति की सोच में परिष्कार करने और उसे राष्ट्रहित में समन्वयवादी भावना से खड़ा करने की आवश्यकता है। राष्ट्र केवल देश का भूगोल नहीं है, अपितु उस भूगोल में निवास करने वाला ‘लोक’ भी है। इस चिंतन में लोक-वैविध्य (विविधता से निःसृत एकता!) भी अविस्मरणीय तथ्य है।

इस देश के तथाकथित नवप्रबुद्धों ने एक नया प्रचार आरंभ कर दिया है– जो प्रधानमंत्री मोदी की किसी बात का समर्थन करता है उसे ‘अंधभक्त’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है परंतु यह जोखिम उठाते हुए उनकी सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्‍वास वाली बात को पुनः रेखांकित करना होगा। हमारे समय में राष्ट्रवाद का यह नारा मार्गदर्शक बन सकता है। 

हमें दो जापानी युवकों की एक कहानी का स्मरण करना होगा कि वे अपने राष्ट्रोन्नयन के लिए किस प्रकार एकजुट और कटिबद्ध थे। दूसरे देश में अध्ययनरत कक्षाओं में एक जापानी युवक अपने देश में बनी पेन्सिल से नोट्स लिखता है और दूसरा उस पेन्सिल को छीलकर धारदार बनाकर देता जाता है। उनके बगल में बैठे दूसरे छात्र उनसे कहते हैं कि जब बाज़ार में अच्छी से अच्छी पेन्सिल सस्ते से सस्ते दाम में उपलब्ध है, तब इतने परिश्रम के साथ इसी पेन्सिल का उपयोग क्यों करते हो?

जापानी युवकों ने एक स्वर में जो कहा वह अनुकरणीय है– हमारे देश में बने उत्पादों पर सबसे पहले हमें विश्‍वास करना होगा। यदि हमारे देश के उत्पाद हम ही नहीं खरीदेंगे तो किसी और से अपेक्षा कैसे की जा सकती है? हमारे लघु से लघुतर सहयोग से ही हमारा देश प्रगति कर सकता है और हमें विश्‍वास है कि हमारा देश प्रगति करेगा।

हमें भलीभाँति पता है कि आज विश्‍व में जापान क्या महत्त्व रखता है। यद्यपि यह कहानी है, परंतु इसमें अभिव्यक्त मर्म राष्ट्र के संबंध में सकारात्मक भावना का द्योतक है। हमें अपने राष्ट्र पर गर्व करना होगा। उसके लिए सतत सदसद्‌विवेक से चिंतन एवं सकारात्मकता के साथ सत्कर्म करने होंगे। यद्यपि हमारा समाज विविधतापूर्ण है परंतु उससे निःसृत एकता के पाठ जन-मानस में उचित रूप एवं परिमाण में प्रचारित-प्रसारित नहीं किए गए।

भारत की नए सिरे से ‘डिस्कवरी’ करने वालों द्वारा जाति, धर्म, भाषा की खाइयाँ अत्यंत कुटिलता के साथ विस्तृत कर दी गईं हैं। परंतु हमें ‘प्रशांत मन’ से सोचने की आवश्यकता है कि क्या ‘सर्वहारा’ की थ्यौरी से सर्वहारा की जीत हुई है? क्या यह सत्य नहीं कि विमर्शों की आड़ में एक-दूसरे के विरुद्ध दीवारें खड़ी की जा रही हैं? क्या इन विमर्शों में प्रतिक्रियावाद की गंध भरपूर ठूँस-ठूँसकर भरी हुई नहीं है? क्या ऐसे सभी विभाजनों से हमारा राष्ट्र खंडित नहीं हो रहा है? 

हमें साम्यवादी बौद्धिक साम्राज्यवाद के षड्यंत्र को समझने की आवश्यकता है। वर्तमान पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों को उत्तम समाज एवं राष्ट्र देने हेतु इसी क्षण से एकजुट होकर काम करना होगा। आइए, हम सभी उस ‘स्मृतिभ्रंशता’ और नानाविध रचे-गढ़े गए नैरेटिवों से निकलें और राष्ट्रहित में एकजुट हो जाएँ।

यदि राष्ट्र बचा रहेगा तो लोक भी बचेगा और लोक बचा रहेगा तो संस्कृति भी बचेगी। स्वामी विवेकानंद के उक्त उद्धृत विचार में ‘संस्कृति’ पर बल दिया गया है। संस्कृति हमारे चित्त, चेतना और चिंतन को संस्कारित करेगी। कहने की आवश्यकता नहीं कि संस्कृति विखंडन से नहीं सृजनकामी चेतना से बनती है। हमें उस सृजनकामी चेतना को नए सिरे से उभारना होगा।

अनायास ही पंडित विनयचंद्र मौद्गल्य द्वारा लिखित गीत हिंद देश के निवासी स्मरण आता है जो कि पाठशालेय जीवन में राष्ट्रीय पर्वों पर गाया जाता था– हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं/ रंग रूप वेष भाषा चाहे अनेक हैं/ हिंद देश के निवासी सभी जन एक हैं/ रंग रूप वेष भाषा चाहे अनेक हैं।“, उल्लेखनीय है स्वीकार्यता एवं सकारात्मकता ही जीवन का आधार है। इसी आधार से राष्ट्रहित की कामना की जा सकती है। 

राष्ट्रवादी चिंतन (राष्ट्र सर्वोपरि) को वृथा एवं विषैला मानने वाले सबको विभाजित कर राष्ट्र-लोक-संस्कृति को मिटाने को उद्यत हैं। राष्ट्रवाद के संबंध में औपनिवेशिक दासत्व का वरन एवं निर्वाह करने वाले ‘आधुनिक बुद्धिजीवियों’ ने तरह-तरह के नैरेटिव गढ़ रखे हैं। वे यह कहते नहीं थकते कि राष्ट्रवाद सार्वभौमवाद और जनतंत्र का विरोधी है। जबकि भारतीय संविधान के अनुसार भारत ‘सार्वभौम लोकतंत्री गणराज्य’ है, जो ‘व्यक्ति की प्रतिष्ठा’ और ‘राष्ट्र की एकता’ का आश्‍वासन देता है।

यहाँ यह भी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि हमारे लिए सार्वभौमवाद के दो आयाम हैं– राष्ट्रीय सार्वभौमिकता और अंतर्राष्ट्रीय सार्वभौमिकता (वसुधैवकुटुंबकम्)। इसके आधारस्वरूप राष्ट्रपति डॉ सर्वेपल्लि राधाकृष्णन का कथन स्मरणीय है – हमारे सामने यह विकल्प नहीं है कि हम राष्ट्रवाद अथवा अंतर्राष्ट्रीयवाद दोनों में से किसको स्वीकार करें। अंतर्राष्ट्रीयवाद बड़ा आदर्श है, जो हमारी राष्ट्रवाद की कल्पना से मेल खाता है।”(गणराज्य–दिवस संदेश)

साथ ही महात्मा गांधी के विचार भी यहाँ प्रसंगोचित एवं उल्लेखनीय हैं– मैं अपने घर के चारों ओर दीवारें खड़ी नहीं करना चाहता और न अपनी खिड़कियों को बंद करना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि सब देशों की संस्कृतियों की वायु पूरी स्वतंत्रता के साथ मेरे घर के आस–पास बहे। किंतु मैं उनमें से किसी को अपने पांव नहीं उखाड़ने दूँगा।” इन कथनों से ‘आधुनिक बुद्धिजीवियों’ के नकारात्मक नैरेटिव को समझने की दृष्टि मिलती है। यह आलोचनात्मक प्रस्तुति उस दृष्टि को बृहत्तर बनाने की मंशा से पूरित है। 

अंततः हमें जानना-समझना और संभलना होगा कि राष्ट्र की अस्मिता खंडित होकर नहीं अखंडित रहकर ही बची रह सकती है। भारत के जितने टुकड़े हुए हैं, वे क्या कम थे (हैं)? वास्तव में आज हम विखंडित के साथ-साथ संकटग्रस्त भारत में जी रहे हैं– संवेदनहीनता का संकट, संवादहीनता का संकट, विचारहीनता का संकट, स्मृतिभ्रंशता का संकट, अनास्था का संकट और न जाने कितने ही संकट मुँह-बाए खड़े हैं और ‘अकल्पनीय महासंकट’ की ओर संकेत कर रहे हैं! ऐसा प्रतीत होता है मानो सबकुछ विभक्त और संकटग्रस्त है।

अतः ऐसी स्थिति-परिस्थिति-परिवेश में हमें आत्मानाम् विधिः से आरंभ कर इदं राष्ट्राय स्वाहा तक की यात्रा पूरी करनी होगी। अर्थात् स्वयं को जानो! और जीवन राष्ट्र को अर्पित करो! इसी प्रक्रिया से गुज़रकर हम सभी संकटों से उबर सकते हैं और हमारी संवेदनाओं पर मंडराते संकट से बचा जा सकता है।

हमें राष्ट्रहित में मानव कल्याण हेतु ‘उच्चतर मानदंड’ ही नहीं अपितु ‘श्रेष्ठतर मानदंड’ स्थापित करने की आवश्यकता है। भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ के बारहवें श्लोक से विविध ‘हीनता’ और ‘संकटों’ से मुक्ति हेतु प्रस्तुत इस विस्तृत आलोचना को विराम– विद्या-योग्यता-दक्षता, तप-चिंतन-साधना, दान-करुणा-परोपकार, ज्ञान-प्रज्ञा-विवेक, शील-सदाचार-नीतिमत्ता, गुण-चरित्र-कीर्ति और धर्म-कर्म-निष्ठा के बिना राष्ट्रहित की कामना नहीं की जा सकती–

येषां न विद्या न तपो न दानम्, ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः। ते मर्त्यलोके भुवि भार भूता, मनुष्य रूपेण मृगाश्‍चरन्ति ॥12॥ (भर्तृहरि-शतक, टीकाकार– रामजी शर्मा ‘मधुवनी’, महाशय श्यामलाल वर्म्मा आर्य बुकसेलर, बरेली 1926, पृ 5–6)

अर्थात् जिन मनुष्यों में विद्या (योग्यता-दक्षता), तप (चिंतन-साधना), दान (करुणा-परोपकार), ज्ञान (प्रज्ञा-विवेक), शील (सदाचार-नीतिमत्ता), गुण (चरित्र-कीर्ति) और धर्म (कर्म-निष्ठा) का अभाव हो वे मर्त्यलोक में पृथ्वी पर भार हैं। साक्षात् पशु हैं, जो मनुष्य के रूप में विचरते हैं। 

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं। इस शृंखला का दूसरा भाग यहाँँ और पहला भाग यहाँ पढ़ें