भारती
सड़क इंफ्रास्ट्रक्चर पर 20 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना के लक्ष्य व चुनौतियाँ

राष्ट्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपालइन (एनआईपी) पर टास्कफोर्स ने जो अंतिम रिपोर्ट सौंपी है उसमें सड़क क्षेत्र पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

ऊर्जा क्षेत्र के बाद सड़क क्षेत्र ही है जिसने पिछले दशक में सर्वाधिक निवेश को आकर्षित किया है। वित्तीय वर्ष 2020 से वित्तीय वर्ष 2025 तक इंफ्रास्ट्रक्चर पर होने वाले 111 लाख करोड़ रुपये के निवेश में से 20 लाख करोड़ रुपये सड़क क्षेत्र के लिए हैं यानी 18 प्रतिशत जो कि ऊर्जा क्षेत्र के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

कुछ मील के पत्थर

31 मार्च 2019 तक भारत में 59 लाख किलोमीटर लंबी सड़क थी। इनमें से राष्ट्रीय राजमार्ग व एक्सप्रेसवे 1,32,500 किलोमीटर लंबे और राज्य राजमार्ग 1,56,694 किलोमीटर लंबे हैं। प्रमुख जिला सड़कें और ग्रामीण सड़कें 56 लाख किलोमीटर लंबी हैं।

अन्य क्षेत्रों की तुलना में इस क्षेत्र में निजी खिलाड़ियों के निवेशों में परिपक्वता और निजी सार्वजनिक साझेदारी (पीपीपी) मॉडल जैसा नवाचार देखने को मिला है। साथ ही इस क्षेत्र में एक मजबूत संविदा संरचना भी है।

लेकिन संयोजकता बढ़ाने की और आवश्यकता है क्योंकि राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्ग कुल सड़कों का मात्र 4.7 प्रतिशत हैं। 2013 से 2017 के बीच इंफ्रास्ट्रक्चर में कुल निवेश का 17 प्रतिशत सड़क पर खर्च हुआ और इसकी वार्षिक चक्रवृद्धि दर 16 प्रतिशत है।

वित्तीय वर्ष 2015 से राष्ट्रीय राजमार्ग निर्माण दोगुने से भी अधिक हो गया है। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (मॉर्थ) ने वित्तीय वर्ष 2019 के लिए लक्षित 16,420 किलोमीटर सड़क निर्माण की तुलना में 10,855 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया जिसका औसत प्रतिदिन 30 किलोमीटर सड़क निर्माण का है।

औसत प्रतिदिन सड़क निर्माण में इतनी बड़ी वृद्धि का कारण रहा कि ईपीसी (अभियांत्रिकी, खरीद और निर्माण) एवं एचएएम (हाइब्रिड ऐन्युटी मॉडल) जैसे मॉडलों की सहायता से निजी क्षेत्र के लिए खतरा कम किया गया।

भूमि अधिग्रहण व अन्य कामों को सुगम बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार सुधार तथा पुनर्वास अधिनियम, आदि जैसे सुधारों ने चमत्कारी परिणाम दिए हैं।

वैश्विक संपत्ति धन एवं पेंशन फंड ने भी इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है और वे अधिग्रहण एवं खरीद के माध्यम से निवेश कर रहे हैं।

टास्कफोर्स द्वारा बताई गई मुख्य चुनौतियाँ

पहली, नई परियोजनाओं के वित्तीय समापन में विलंब।

दूसरी, जबसे आरबीई ने गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के लिए कड़े दिशानिर्देश बनाए हैं, तब से सड़क एवं राजमार्ग क्षेत्र के निजी खिलाड़ियों को ऋण देने से बैंक झिझकते हैं। मध्यम स्तर के खिलाड़ियों के लिए यह समस्या और विकट है जिन्होंने हाल ही में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की परियोजनाओं का अनुबंध जीता है।

एनएचएआई का एक कार्यक्रम

तीसरी, भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा एवं पारदर्शिता का अधिकार सुधार तथा पुनर्वास अधिनियम 2013 ने भूमि अधिग्रहण को महंगा कर दिया है। 80 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर से तीन गुना होकर भूमि मूल्य 2.38 करोड़ रुपये प्रति हेक्टेयर हो गया है।

परियोजना में देरी से बचने के लिए एनएचएआई केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए निविदा निकालती है जिनका भूमि अधिग्रहण 80 प्रतिशत पूरा हो गया है। सन्निहित भूमि क्षेत्र का प्रावधान न होने से देरी होती है और ठेकेदारों की लागत बढ़ती है।

भूमि अधिग्रहण की लंबी प्रक्रिया परियोजना को धीमा कर देती है और प्रवाधान के कारण सीमित निविदाएँ ही जारी की जा रही हैं। हालाँकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 80 प्रतिशत भूमि अधिग्रहण समेत पूरी तैयारी करने के बाद ही परियोजना को शुरू करना उचित माना गया है।

ठेकेदार चुने जाने के बाद पूर्ववर्ती आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण नियुक्ति दिनांक में विलंब ठेकेदारों की बोली लगाने की क्षमता को प्रभावित करती है। ऐसे में एनएचएआई को अनुबंध सौंपने से पहले सभी अनुमतियाँ ले लेनी चाहिए और कम से कम 90 प्रतिशत सन्निहित भूमि का भी अधिग्रहण कर लेना चाहिए।

चौथी, अनुबंध देने में देरी से अनुमतियाँ और स्वीकृतियाँ मिलने में भी देरी होती है। इससे अनुबंध की पवित्रता में समस्याएँ खड़ी होती हैं।

पाँचवी, विवाद निपटान में देरी। विवाद निपटान में देरी और अनुबंध के क्रियान्वयन में देरी से ठेकेदारों के लिए तरलता की समस्या उत्पन्न होती है।

निजी क्षेत्र की प्रतिभागित बनाए रखने के लिए मध्यस्थता दावों को निष्पक्ष, उपभोक्ता सहायक और मूल्य कुशल तरीके से शीघ्र सुलझाया जाना चाहिए। अनुबंध की 75 प्रतिशत राशि के भुगतान का हाल का कैबिनेट निर्णय सहायक सिद्ध हुआ है।

यह भी देखा गया है कि ठेकेदार कंपनियाँ मध्यस्थ द्वारा सौंपे गए अनुबंध के विरोध में न्यायालय में जाती हैं और ऐसे में न्यायालय को अनुबंध पर अपना निर्णय देना होता है लेकिन इसमें बहुत विलंब हो जाता है जो विवाद के शीघ्र निपटान के प्रयास के विपरीत है।

छठी, पुरानी लंबित परियोजनाएँ। इस सूची में कई सड़कें ऐसी हैं जिनका निर्माण हो चुका है और टॉट, इन्वाइट या परिसंपत्ति सुरक्षा मॉडलों से इनका मुद्रीकरण किया जा सकता जिससे वे ऋण स्तर बढ़ाइ बिना और ग्रीनफील्ड परियोजनाएँ शुरू कर सकें।

ग्रीनफील्ड परियोजनाओं (शुरुआती स्तर की परियोजनाएँ) को वित्तपोषित करने के लिए ब्राउनफील्ड परिसंपत्तियों (समाप्ति की ओर अग्रसर परियजनाएँ) के आर्थिक उपयोग को बढ़ाना चाहिए।

एनएचएआई ने 6,000 किलोमीटर लंबी 12 सड़क गुच्छों के मुद्रीकरण का प्रस्ताव दिया है। इसे शीघ्र किया जाना चाहिए ताकी नई सड़कों के लिए वित्त उपलब्ध हो सके।

सातवीं, परिसंपत्तियों के शीघ्र मुद्रीकरण की आवश्यकता है। इंफ्रास्ट्रक्चर देखरेख और दुर्घटना निरीक्षण के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) का भी उपयोग होना चाहिए।

भविष्य के लिए दृष्टि

  • 60,000 किलोमीटर लंबे राजमार्ग विकसित करने का लक्ष्य है जिसमें से 2,500 किलोमीटर लंबे एक्सप्रेसवे होंगे, 9,000 किलोमीटर लंबे आर्थिक गलियारे, 2,000 किलोमीटर लंबी तटीय और बंगदरगाह सड़कें। 2024 तक ये सड़कें 45 नगरों से गुज़रती हुई 100 पर्यचन स्थलों को जोड़ेंगी।
  • भारतमाला के प्रथम चरण के पूरे होने के साथ दूरस्थ क्षेत्रों को अंतिम छोर तक जोड़े जाने की कल्पना की जा रही है।
  • प्रमुख हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, सैन्य और अन्य रणनैतिक स्थानों को अंतर-शहरी बसों, मेट्रो, फेरी टर्मिनलों, आदि से जोड़ा जाएगा। राष्ट्रीय राजमार्गों में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाने पर विचार करना होगा।
  • इन्वाइट, टॉट, पोर्टफोलियो सुरक्षित करने जैसे परिसंपत्ति मुद्रीकरण विकल्पों को परिसंपत्ती संचयनकर्ताओं, निजी इक्विटी खिलाड़ियों के पक्ष में करना, बेहतर पीपीपी मॉडल और खतरा साझा करने वाले अधिक संतुलित अनुबंधों को बढ़ावा देना होगा।
  • 2024 तक परिसंपत्ति मुद्रीकरण से 1 लाख करोड़ रुपये कमाने का लक्ष्य है। आवश्यकता है परियोजना विकास के लिए वित्त के नवाचार मॉडलों की जिनका नेतृत्व एनआईआईएफ करे।
  • फास्टैग और आरएफआईडी जैसी आधुनिक तकनीक के उपयोग से टॉल प्लाज़ा पर प्रतीक्षा समय घटे एवं राजस्व बढ़े।
  • ‘जितना उपयोग उतना भुगतान’ सिद्धांत पर आधारित शुल्क हो जो परिवहन लागत को कम करे, ट्रैफिक प्रबंधन में उन्नत तकनीक का उपयोग हो, लिडार19 गन और ड्रोन के माध्यम से सुरक्षा सुनिश्चित हो, सड़कों पर गति नियंत्रक, डिजिटल संदेश बोर्ड हों।
  • भीड़ की स्थिति में वैकल्पिक लेन या मार्ग बताने वाले स्वचालित ट्रैफिक नियंत्रण उपकरण हों, स्वचालित सड़क अवस्था निरीक्षण प्रणाली और इंटेलीजेंट भौगोलिक ट्रैफिक निरीक्षण प्रणाली पर भारी निवेश हो जो दुर्घटना विश्लेषण के लिए पुलिस डाटा का उपयोग करे।