भारती
राम नाम में निहित है राष्ट्र निर्माण का भाव, सनातन संस्कृति का ही प्रचलित नाम है हिंदुत्व

आज जब राम मंदिर भूमि पूजन हुआ, अतीत की कुछ बातें यों ही स्मृति पटल पर जीवित हो उठी हैं। भारतीय अस्मिता के ‘अभिप्रायपूर्ण’ प्रतीक होने के बावजूद राम के संबंध में जितना वाद-विवाद एवं वितंडा हुआ, (मेरी जानकारी में) किसी अन्य नाम पर नहीं हुआ।

भारत में राम की ‘ऐतिहासिकता’ पर प्रश्‍न चिह्न लगा कर तथा उन्हें पौराणिक घोषित कर जिस वितंडावाद का आरंभ हुआ, वह केवल उनके अस्तित्व को नकारने बाबत नहीं था अपितु मूल रूप से भारतीय (हिंदू) सभ्यता-संस्कृति की सनातनता पर प्रश्‍न चिह्न लगाने की सोची-समझी चाल (चलन?) का परिचायक था और वह वितंडावाद दीर्घावधि तक चलता रहा।

अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर, 2019 को राम जन्मभूमि के पक्ष में निर्णय देकर राम (सनातन संस्कृति) की ऐतिहासिकता पर मुहर लगा दी। उल्लेखनीय है, यह भी माना कि “मीर बाक़ी ने बाबरी मस्जिद बनवाई।… बाबरी मस्जिद खाली ज़मीन पर नहीं बनाई गई थी। मस्जिद के नीचे जो ढाँचा था, वह इस्लामिक ढाँचा नहीं था।” 

स्मरणीय है, दीर्घावधि से चल रहे वितंडावाद के बावजूद इस देश का लोक और उसके मानस में उपस्थित राम-प्रेम ने उस वितंडावाद को तरजीह नहीं दी। वाद-विवाद-वितंडा के दौरान भी देश-विदेश में राम की स्वीकृति और पूजनीयता निर्विवाद रही।

परंतु भारतीय आधुनिक बुद्धिवादियों की (कु)तार्किक शक्ति के संबंध में कितना और क्या-कुछ कहा जाए? हमारे यहाँ बर्बर आक्रांताओं का महिमामंडित इतिहास लिखा गया और राम के नाम में ‘राजनीतिक कुचक्र’ ही देखा और प्रचारित किया गया।

ऐसी बातों के होते हुए भी इस देश के लोकमानस ने विशिष्ट बुद्धिवादियों की तक़रीर और तहरीर को तरजीह नहीं दी। इसके विपरीत इस दोरान लोक-मन में राम (सनातन संस्कृति) के प्रति आस्था और विश्‍वास दृढ़ से दृढ़तर होता गया। राम जन्मभूमि से संबंधित न्यायालय के निर्णय से भारतीय इतिहास के संदर्भ में कई प्रामाणिक तथ्य भी उजागर हुए। 

बाबरी विध्वंस को राजनीतिक षड्यंत्र के रूप में देखने की बजाय लोकमानस में दीर्घावधि से लंबित मनोकांक्षा की दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। इस देश के लोकमानस ने नानाविध आक्रांताओं की बर्बरता को देखा, अपने देवालयों को टूटते देखा, अपनी आस्थाओं पर प्रहार होते देखा, मुगलवंशी मुस्लिम लीग और उसकी हरक़तों को देखा-झेला, गांधी का मुस्लिम तुष्टीकरण देखा, नेहरू का सत्ता हथियाना और हिंदुओं की भावनाओं को ताक पर रखते देखा, मुस्लिम समुदाय का नस्ली कौमी (मिथ्या) राष्ट्रवाद (एथ्निक नेशनलिज़्म) देखा और उसी के आधार पर (मज़हब के नाम पर) देश के टुकड़े होते देखा, नतीजतन अपने भाइयों की हत्याएँ और माँ-बहन-पत्नी-प्रेयसी की इज़्ज़त-इस्मत लूटते देखा, अल्पसंख्यक अराजकता को देखा-जिया-भोगा, पक्षपाती एवं रीढ़विहीन सरकारों को देखा, न्यायालयों की ‘तारीख पे तारीख’ को भी देखा इत्यादि अनेकानेक पक्ष बाबरी विध्वंस के लिए कारणीभूत रहे हैं।

डॉ भीमराव आंबेडकर ने कहा था – “पाकिस्तान के लिए मुसलमानों की माँग को कोई मंजूर नहीं करेगा, जब तक कि उसे इसके लिए मजबूर न किया जाए।” (भीमराव आंबेडकर, ‘क्या पाकिस्तान बनना चाहिए?’) इस देश के लोगों ने देखा कि ‘मजबूर’ करने के लिए हद दर्जे का ज़ुल्म किया गया, बर्बरता की गई और अंततः भारत के टुकड़े कर ही दिये गये। ऐसी घटनाओं के आलोक में भारतीयों की सर्वसमावेशी सनातन संस्कृति के अनुसरणकर्ता संवाहकों ने यह देखा-जाना कि “मुसलमान एक भिन्न राष्ट्र इसलिए नहीं चाहते कि वे भिन्न रहे हैं बल्कि इसलिए कि यह उनकी कामना है।” (भीमराव आंबेडकर, वही) 

इन तथ्यों को दरकिनार करते हुए हिंदुत्व के आलोचकों ने प्रायः बाबरी विध्वंस को ‘हिंदुत्व जाग उठा’ और ‘नस्लवादी राजनीतिक उभार’ के रूप में ही वर्णित-विवेचित किया और इस देश के जन-मन और जनाधार को प्रासंगिक न मानने की गुस्ताख़ी की।

उन्हें बाबरी विध्वंस से ‘मुस्लिम समाज के आहत’ होने का ख़याल तो आया परंतु उपरोक्त पहलुओं के अतिरिक्त सदियों से आक्रांताओं के दमन-शोषण के बावजूद संस्कारोचित समावेशी अपनत्व का अंगीकार करने वाले सनातन हिंदू समाज का ख़याल नहीं आया। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष एवं उदारवादी आलोचक (आयातीत वैचारिकी से ग्रस्त) हिंदुत्व को किस-न-किसी रूप में दोष देने के रुझान को स्थापित करने में सफल हुए। उनकी रोज़ी-रोटी इसी धंधे पर टिकी रही।

स्मरणीय है कि ‘हिंदुत्व’ सनातन संस्कृति का ही दूसरा प्रचलित नाम है और अखिल विश्‍व में उदारवादी सर्वसमावेशी संस्कृति, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (भौगोलिक-सांस्कृतिक) का एकमात्र उदाहरण है। किंतु आयातीत वैचारिकी की परिपाटी का अनुसरण करने वाली आलोचना ने प्रायः इसे अपने मानदंडों पर आँका और दोषारोपण किया। ऐसी आलोचना के लिए संदर्भोचित तथ्य यह कि बेइमानों में हद दर्जे की ईमानदारी देखी-पाई जाती है, इन आलोचकों में हद दर्जे की बेईमानी सहज ही दिखाई देती है।

यहाँ यह भी स्मरणीय है कि हिंदुत्व की नकारात्मक व्याख्या और उसका विरोध सेक्यूलर, उदारवादी एवं वामपंथियों द्वारा स्थापित फैशन है। नामवर सिंह जैसे सुधी आलोचक भी इस विरोध के ‘कॉम्पलेक्स’ से नहीं बच पाये। ऐसे तमाम आलोचक जिनके नाम के साथ ‘सुधी आलोचक’ उपसर्गात्मक विशेषण जोड़ा जाता है, सूझ-बूझ एवं सुध-बुध खोकर हिंदुत्व की आलोचना में जुटे-डटे रहे (रहते हैं) परंतु इस्लामिक गतिविधियों की फासिस्ट शैली के संबंध में दो-टूक कहने-लिखने से बचते हैं। उन्हें दोष केवल और केवल हिंदुत्व की संस्कृति में दिखाई देता है।

शायर अमीर मिनाई ने संभवतः ऐसे ही लोगों के लिए कहा था– शौक़दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर’ और हिंदुत्व के आलोचकों ने वह नज़र पैदा कर ली। इसी नज़रिए के तहत वे हिंदुत्व को ‘क्रूरता की संस्कृति’ कहते नहीं थकते। द्वि-राष्ट्रवाद का फार्मूला तथा भारत विभाजन से लेकर किसी भी साधारण से अतिसाधारण घटना के लिए वे हिंदुत्व को उत्तरदायी मानते-ठहराते हैं।

उन्हें सोमनाथ मंदिर के लिए लालकृष्ण आडवाणी द्वारा गृह मंत्री के रूप में (मई 2000) 5 करोड़ रुपये अनुदान की घोषणा अखरती है किंतु हज के लिए दी जाने वाली सब्सिडी तथा मदरसों को दिए जाने वाले सरकारी अनुदान पर ‘सब चुप’– “सब चुप, साहित्यिक चुप और कविजन निर्वाक्/ चिन्तक, शिल्पकार, नर्तक चुप हैं/ उनके ख़याल से यह सब गप है/ मात्र किंवदंती।”

प्रसंगोचित स्मरण यह भी कि, वर्ष 2012 में ही सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को वर्ष 2022 तक चरणबद्ध तरीक़े से हज सब्सिडी ख़त्म करने का निर्देश दिया था। वर्ष 2016-17 के बजट के प्रावधानों के तहत हज सब्सिडी के नाम पर हाजियों की हवाई यात्रा के लिए 450 करोड़ रुपये दिए गए थे।

किंतु हिंदुत्व के आलोचकों को सोमनाथ से दिक़्क़त है, राम जन्मभूमि से दिक़्क़त है, समान सिविल कोड से दिक़्क़त है और तो और संस्कृत से दिक़्क़त है, संस्कृति से दिक़्क़त है क्योंकि इसमें उन्हें हिंदुत्व का संबंध-सूत्र दिखाई देता है। क्या यह कॉम्पलेक्स विचारणीय नहीं है?

अपनी खासमखास नज़र से उन्हें हिंदू-फासीवाद का दीदार तो होता है (विशेष सूझ-बूझ, सुध-बुध के साथ!) लेकिन शरियत क़ानून,  मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, ज़िहाद के दीदार नहीं होते। यहाँ उनकी नज़र मनमुआफिक ढंग से मात खा जाती है। इसके विपरीत उन्हें ‘मुस्लिम अलगाववाद’ में ‘अधिकार रक्षा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति’ (ज़माने से दो दो हाथ, पृ. 97) दिखाई देती है परंतु अलीगढ़ आंदोलन, इस्लामपरस्त मुल्क़ की मांग इत्यादि में साज़िश दिखाई नहीं देता।

वे हिमायती हैं गंगा-जमूनी तहज़ीब के, तथाकथित बाबरी मस्जिद के, फारसी बहुल उर्दू (हिंदुस्तानी) के और उन्हें आक्रोश है कि उर्दू भारत की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बनी? उन्हें रोष है लूटेरे आक्रांता के नाम पर बनी तथाकथित मस्जिद गिराने पर, राम मंदिर निर्माण पर, अशोक सिंघल पर, लालकृष्ण आडवाणी पर, अटल बिहारी वाजपेयी पर, कल्याण सिंह पर, उन्हें रोष है सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण पर, वल्लभ भाई पटेल पर, राजेंद्र प्रसाद पर, यहाँ तक कि उन्हें पोखरण पर भी रोष है।

इस रोष और विरोध से यह स्पष्ट हो जाता है कि वे हिंद, हिंदू, हिंदुत्व को समूल नष्ट करने के हिमायती हैं। इसी हिमायत में वे कभी धर्मांतरण को जायज़ ठहराने की हिम्मत और हिकमत करते हैं और अमूमन ‘मुस्लिम अलगाववाद’ के लिए हिंदुओं को कठघरे में खड़ा कर देते हैं।

तुलसीदास ने कहा था– ‘नहि कोउ अबुध, न लच्छन हीना।’ और ‘सब नर करहिं परस्पर प्रीति। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।।’ परंतु ‘परस्पर प्रीति’ में ‘परस्पर’ पर कहाँ किसी का ध्यान होता है। ‘लच्छन हीना’ और ‘हीन लच्छन’ पर कोई क्योंकर कुछ बोलने की हिम्मत नहीं करता?

प्रायः ‘बहुसंख्यक सांप्रदायिकता’ और ‘अराजकता’ ही चर्चा के केंद्र में होती है और फिर ढाक के वही तीन पात– हिंदुत्व में ‘क्रूरता की संस्कृति’ का अजब-गजब दर्शन होता है। फौरी प्रतिक्रियाओं में प्रायः यह सुनने को मिलता है कि ‘परस्पर प्रीति’ में ‘प्रीति’ का ठेका हिंदुओं को नेहरू के समाजवादी और इंदिरा के धर्मनिरपेक्ष टेंडर में बहाल हुआ है।

सुदीर्घ चिंतन के उपरांत मामला कुछ-कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। तुलसीदास की उक्ति– सब उदार सब पर उपकारी’ में ‘सब’ की पुनरावृत्ति पर लक्ष्य केंद्रित रखने की नितांत आवश्यकता है। जब ‘सब’ में उदारता आयेगी, ‘सब’ में परोपकारिता स्वयमेव आयेगी। परंतु हिंदुत्व के आलोचकों पर तुलसी की उक्ति (उग्र बुद्धि उर दंभ विशाला) थोड़ा उलट-फेर के साथ कुछ इस प्रकार लागू होती है– धूर्त बुद्धि उर कपट विशाला

डॉ भीमराव आंबेडकर ने अपने अध्ययन के बाद इस्लाम के संबंध में जो कथन किया था, उससे हिंदू-मुस्लिम कौमी एकता के मद्देनज़र प्रचारित-प्रसारित ‘परस्पर प्रीति’ वाली अननुकरणीय धारणा को उत्तर (चुनौती) मिलता है–

“इस्लाम विश्‍व को दो भागों में बांटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। लेकिन जिस किसी भी देश में जहां मुसलमान रहते हैं परंतु उनका राज्य नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इस दृष्टि से उनके लिए भारत दारुल हरब है। इसी भांति वे मानवमात्र के भ्रातृत्व में विश्‍वास नहीं करते।”

इसी कड़ी में उनका यह कथन भी उल्लेखनीय है कि “इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है।” यह भी कि “इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत की अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने के महत्ती आकांक्षा रही है।”

इन कथनों की सत्यता 15 मिनट के लिए पुलिस को हटा लो, बता देंगे’ वाले बयान और नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरुद्ध हुए ‘अल्पसंख्यक’ उत्पात के दौरान ‘चिकन नेक’ तोड़ने वाली बात से जाना-समझा जा सकता है। हमारे आधुनिक बुद्धिवादी इन तथ्यों के बावजूद ‘मुस्लिम अलगाववाद’ के लिए हिंदू-हिंदुत्व को दोषी मानने-ठहराने का सतत उपक्रम करते (रहे) हैं। इस उपक्रम से उनका हिंदुत्व (भारत) विरोधी चिंतन उजागर होता है। 

बहरहाल, मेरा हिंदुत्व ऐसा है, तेरा हिंदुत्व कैसा है (हिंदुत्व बनाम हिंदुत्व) की चर्चा में इतना कह देना औचित्यपूर्ण होगा कि हिंदुत्व की बात करते हुए ‘मेरा हिंदुत्व ऐसा है’ का पक्ष जिस सकारात्मकता के साथ विवेचित होता है/हुआ है, वही हिंदुत्व सबका हिंदुत्व है। वास्तव में वही हिंदुत्व है।

प्रमाणस्वरूप बचपन के कुछ प्रसंगों का स्मरण हो आता है। मेरे बचपन का लंबा समय (1988-1993) कुंडलेश्‍वर मंदिर (शिव मंदिर) के लिए प्रसिद्ध कुंडलवाडी (बिलोली-नांदेड़-महाराष्ट्र) स्थित राम मंदिर से संलग्न हनुमान मंदिर में बीता। वे दिन मन को मोहने वाले थे और आज भी उन दिनों के स्मरण से मन को शांति और दृढ़ता-स्थिरता मिलती है। घर में अपार ग़रीबी थी और ‘होइहि सोइ जो राम रचि राखा’ की धारणा प्रबल रही। अतः हम सब के लिए राम नाम ही सबसे बड़ा आधार था।

परंतु प्रातः और संध्या समय मंदिर की नित्य पूजा-अर्चना में उपस्थित होना हमारे लिए अनिवार्यता नहीं थी। कभी लगा भी नहीं कि कोई हमारे धार्मिक विश्‍वास को दृढ़ करने का प्रयास कर रहा है। न तो कभी माँ-बाबूजी (आई-अन्ना) ने रामायण अथवा गीता के पारायण के लिए दबाव डाला, न मठ के पुजारी ‘मामा’ ने!

राम मंदिर में रहते हुए भी किसी प्रकार का धार्मिक कर्मकांड करने की अनिवार्यता नहीं थी। हम मंदिर की प्रदक्षिणा करने की बजाय मंदिर में बनी गुफानुमा संरचनाओं में लुका-छिपी खेलते थे और वहाँ उपस्थित सभी धीरे, सँभल कर, गिर जाओगे इत्यादि वचनों से हम सभी बच्चों को आगाह करते थे।

जबकि ननिहाल में ‘देवा दत्ता’ का ‘एक्का’ (एकनाम जाप) हुआ करता था। पूरे-पूरे दिन भर प्रत्येक व्यक्ति ‘देवा दत्ता दत्ता’ का नाम स्मरण करता रहता। यह पारायण अद्भुत हुआ करता था। हम सभी बच्चे मस्ती में झुमते हुए बहुत बार उस जाप में तल्लीन हो जाते थे परंतु यहाँ भी ऐसा करना अनिवार्यता नहीं थी।

घर के सारे काम मूक भाव भंगिमाओं से ही संपन्न होते थे। उस समय न बोलना अखरता न था। बिना बोले ही सारे काम-धाम और ध्यान सहज हो जाते थे। कभी-कभार हम बोला हुआ समझने में असफल हो जाते हैं। बहुत बार बहुत सारी बातें पुनः-पुनः समझाने पर भी समझ नहीं आतीं। परंतु ‘एक्का’ के दिनों में बिना बोले ही सारा काम सुव्यवस्थित रूप से हो जाया करता था।

ऐसी ही स्थितियाँ कमोबेश सबके साथ रही होंगी और हैं ही। वही प्रचलन आज भी है कि धार्मिक शिक्षा के लिए किसी पर कोई दबाव नहीं। प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी इच्छानुसार अपना आराध्य चुन सकता है। यह अनेकता की स्थिति (प्लुरलिज़्म) हमारे यहाँ सहज ही उपस्थित है और शताब्दियों से है। सनातन संस्कृति (हिंदुत्व) की यह सरलता और कुछ भी न लादने वाला संस्कार अत्यंत स्वाभाविक रूप से सर्वत्र उपस्थित है। यह संस्कार, सरलता और स्वाभाविक सहजता किसी अन्य धर्म में दृष्टिगोचर नहीं होती। 

अस्तु, इस सनातन संस्कृति का उद्धार करने वाले राम के नाम पर हिंदुत्व को नकारात्मक जामा पहनाने का काम निरंतर हुआ है। राम का नाम आते ही व्यक्ति का चरित्र (आदर्श) उनके जैसा हो वाली चर्चा आरंभ हो जाती है। राम माने हम सभी सनातनियों के लिए उदात्त चरित्र! यही उदात्तता हम सनातनियों की पहचान है।

बहुत बार ‘कैरेक्टर बिल्डिंग’ और ‘पर्सनैलिटी डेवलपमेंट’ की शिक्षा का ज़िक्र होता है। किसी-न-किसी अवसर पर कई बार मैंने कहा-रेखांकित किया– इस शिक्षा के लिए मूल आधार राम (और रामायण) के अतिरिक्त भला कौन हो सकता है? अतः उदात्तता के परिचायक राम के जन्मस्थान पर एक भव्य एवं दिव्य मंदिर का निर्माण क्यों नहीं होना चाहिए था? आज जब राम मंदिर भूमि पूजन हुआ, लगता है– कोई बात नहीं, देर आए, दुरुस्त आए! 

राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्रोद्धार की दृष्टि से चरित्र-निर्माण एवं व्यक्तित्व विकास की शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन पहलुओं की विशेषताओं की छानबीन करते हुए अनायास ही अयोध्यावासी दशरथ सुत श्री राम एक मील का पत्थर दृष्टिगोचर होते हैं। इनके बिना न चरित्र-निर्माण पर चर्चा संभव है, न व्यक्तित्व विकास ही!

जब वितंडावाद चलता रहा तो राम का नाम नारे में रूपांतरित हो गया। यह भी भारतीय जनमानस की सर्वतः साधारण भावना थी। परंतु अब जबकि राम मंदिर बन रहा है, हमें राम की उदात्तता का अंगीकार करना होगा। कोई भी नारा बहुत लंबे समय तक प्रासंगिक नहीं रह सकता और हमारे राम हमारा नारा नहीं हैं अपितु अस्तित्व हैं, पहचान हैं।

स्मरणीय है, बचपन में अभिवादन के रूप में सभी ‘राम राम’ करते थे और उसका उत्तर ‘जय श्रीराम’ अथवा ‘जय सियाराम’ ‘जय जय सियाराम’ हुआ करता था। पारस्परिक अभिवादन का यही प्रचलन था और उसे आज तक हम लोगों ने बनाए रखा है। हमारे दिन का आरंभ अनायास ही राम नाम से होता था। राम नाम के अभिवादन का प्रचलन रखते हुए हमें राम नाम का मर्म जानना-समझना होगा और राम जैसी चारित्रिक उदात्तता को शनैः-शनैः अपने जीवन-आचरण में लाना होगा।

जिन परिस्थितियों में ‘जय श्री राम’ नारा बना, आज वह परिस्थितियाँ समाप्त हुईं। एक युग का अंत हुआ है और एक नए युग का शुभारंभ हो रहा है! ऐसे में अब जबकि हम हिंदुत्व के आलोचकों का रवैया (पैटर्न) जान-समझ चुके हैं, मुझे सुधी आलोचक नामवर जी स्मरण आते हैं। उन्होंने सारे दोष हिंदुत्व के मत्थे मढ़ते हुए जो लिखा था ‘सुधी आलोचकों’ की आलोचना-दृष्टि देख-जान कर स्मरण आता है– “गनीमत है कि अभी आलोचना के लोचन बचे हुए हैं। बाकी उनका भले ही हो, आँखें अपनी हैं और उन आँखों में दम है!” (ज़माने से दो-दो हाथ, पृ 20) मेरे साथ दूसरी कहानी है। मेरे पास एक ही आँख है, और उस एक ही आँख में ‘दम है’। मेरी यह एक आँख कहती है– ‘सियाराम मय सब जग जानी।’