भारती
नार्स के अध्ययन के बावजूद अन्य अध्ययनों में खुले में शौचमुक्ति पर संदेह क्यों

प्रसंग- नार्स की रिपोर्ट में स्वच्छ ग्रामीण मिशन की प्रगति के आँकड़ों और अन्य स्वतंत्र अध्ययन के आँकड़ों में तुलना।

स्वच्छ भारत ग्रामीण मिशन डैशबोर्ड पिछले पाँच वर्षों से हमें इस अभियान की दैनिक प्रगति की जानकारी देता रहा है कि कितने जिले, शहर और गाँव खुले में शौचमुक्त हुए। इस अभियान के लक्ष्य के पूरे होने के बाद इस डैशबोर्ड पर एक गर्वीला डाटा देखा जा सकता है- खुले में शौचमुक्त गाँवों का प्रतिशत- 2 अक्टूबर 2014- 38.7 प्रतिशत व 2 अक्टूबर 2019- 100 प्रतिशत

इसके बावजूद कई स्वतंत्र अध्ययन कहते आ रहे हैं कि शौचालयों के निर्माण से खुले में शौचमुक्ति सुनिश्चित नहीं की जा सकती। यह अलग बात है कि वार्षिक राष्ट्रीय ग्रामीण सुरक्षा सर्वेक्षण (नार्स) 2018-19 भी एक स्वतंत्र सर्वेक्षण है जो मार्च 2019 में प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में कहता है कि 93.1 प्रतिशत घरों में शौचालय है और शौचालय तक पहुँच रखने वाले 96.5 प्रतिशत लोग उनका उपयोग भी करते हैं।

जल शक्ति मंत्रालय में सचिव और स्वच्छ भारत ग्रामीण के प्रमुख परमेश्वरन अय्यर से जब एक साक्षात्कार में मिंट  द्वारा यह प्रश्न पूछा गया तो उनका उत्तर भी नार्स के डाटा के ओर ही गया। वहीं दूसरी ओर डाउन टू अर्थ  ने इस सर्वेक्षण को संदेहास्पद माना व  हिंदू  ने बिना किसी रिपोर्ट का संदर्भ दिए हुए बताया कि कई स्थानों पर शौचालयों का उपयोग आधे से कम लोग कर रहे हैं।

डाउन टू अर्थ  की रिपोर्ट में रिसर्च इंस्टीट्यूट फ़ॉर कम्पैशनेट इकॉनोमिक्स (राइस) की जनवरी 2019 की रिपोर्ट व शिक्षा की वार्षिक स्थिति के प्रतिवेदन का उल्लेख है। खैर द हिंदू  का कथन कि आधे से कम लाभार्थी शौचालय का प्रयोग कर रहे हैं, राइस की रिपोर्ट से मेल खाता है तो मान सकते हैं कि ये दोनों रिपोर्ट एक ही अध्ययन पर आधारित हैं।

क्या है यह अध्ययन

24 अगस्त से 30 दिसंबर 2018 के मध्य राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व बिहार में 11 जिलों के 120 गाँवों के 1,558 घरों का अध्ययन किया गया। उनसे परिवार के हर व्यक्ति के लिए पूछा गया कि वे खुले में शौच करते हैं या नहीं। साथ ही उनके लिंग, उम्र के साथ उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति का पता लगाने के लिए कुछ अन्य प्रश्न भी पूछे गए।

इससे पाया गया कि सर्वेक्षण किए गए लोगों में से 42 प्रतिशत खुले में शौच करते हैं। जब इन आँकड़ों को 2011 की जनगणना के अनुसार लिंग और आयु के प्रभाव में निकाला गया तो आया कि 44 प्रतिशत लोग ऐसा करते हैं। और इन्हीं आँकड़ों को जब आर्थिक-सामाजिक स्थिति के प्रभाव में निकाला गया तो यह और बढ़कर 57 प्रतिशत हो गया।

हालाँकि राइस ने जनगणना के प्रभाव में निकाले गए डाटा को ही प्राथमिकता दी है। संभवतः इसलिए क्योंकि आर्थिक-सामाजिक स्थिति तौलने वाले कई पैमाने व्यक्तिपरक होते हैं, वस्तुनिष्ठ नहीं। तो डाटा हुआ कि 44 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं और शौचालयों तक पहुँच होने के बावजूद 23 प्रतिशत लोग खुले में शौच करते हैं।

खुले में शौच करने वालों का विभिन्न वर्गों में प्रतिशत

2014 में इसी संस्था ने ऐसा ही सर्वेक्षण किया था और 2018 के सर्वेक्षण के 88 प्रतिशत घर 2014 के सर्वेक्षण का हिस्सा रहे थे व अन्य 12 प्रतिशत नए घरों को जोड़ा गया था। पिछले सर्वेक्षण से तुलना दर्शाती है कि खुले में शौच करने वालों में 26 प्रतिशत बिंदु की कमी आई है। कितगावा तकनीक से वे बताते हैं कि इनमें से 25 प्रतिशत बिंदु गिरावट शौचालय निर्माण और मात्र 1 प्रतिशत व्यवहारिक परिवर्तन से आई है।

नार्स का अध्ययन

2018-19 का सर्वेक्षण नार्स का दूसरा सर्वे था और इसकी अवधि भी राइस अध्ययन की भाँति चार माहों की थी- नवंबर 2018 से फरवरी 2019। कांतार पब्लिक के प्रतिनिधित्व में हिंदुस्तान थॉम्पसन लिमिटेड के साथ आईपीई ग्लोबल को इस सर्वेक्षण का अनुबंध मिला था।

इस अध्ययन का उद्देश्य- 1. खुले में शौच के प्रचलन में कमी, 2. खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) स्थान का दर्जा पा चुके गाँवों की स्थिति और 3. कूड़ा व मलजल प्रबंधन के दायरे में आई जनसंख्या का पता लगाना था। इस अध्ययन में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के 6,136 गाँवों के 92,040 घरों को सर्वेक्षण के दायरे में लिया गया था।

सर्वेक्षण के प्रश्न, ज़मीनी कार्य और गुणवत्ता की जाँच राष्ट्रीय सांख्यिकीय आयोग के पूर्व सदस्य प्रोफेसर अमिताभ कुंडु की अध्यक्षता और भारत सरकार के पूर्व सचिव डॉ एनसी सक्सेना की उपाध्यक्षता में एक विशेषज्ञ कार्यकारी समूह ने की। इस समूह में वर्ल्ड बैंक, यूनिसेफ, वॉटर एड, बीएमजीएफ, एनएसएसओ, नीति आयोग और भारत स्वच्छता संघ समेत कई संस्थाओं के प्रतिनिधि थे।

इस सर्वेक्षण की विशेषता यह है कि इसमें प्रत्येक राज्य व यूटी में सर्वेक्षण के दायरे में लिए गए गाँवों का अनुपात राष्ट्रीय स्तर पर उनके ग्रामीण घरों के अनुपात में ही है। साथ ही सर्वे में लिए गए ओडीएफ व अन्य गाँवों की संख्या भी राज्य स्तर पर ओडीएफ व गैर-ओडीएफ गाँवों के अनुपात में ही है।

6,136 गाँवों में से 2,891 ओडीएफ गाँव हैं व 3,245 अन्य गाँव। प्रत्येक गाँव में 200 सूचीबद्ध घरों में से कंप्यूटर आधारित व्यक्तिगत साक्षात्कार (सीएपीआई) द्वारा 15 घरों को चुनकर उनका सर्वेक्षण किया गया।

तुलना

एक ओर जहाँ 92,040 घरों का सर्वेक्षण किया गया, वहीं दूसरी ओर 1,558 घरों का। एक सर्वेक्षण का आकार दूसरे से 59 गुना बड़ा है। यह एक तथ्य है कि नमूने के आकार के साथ-साथ सर्वेक्षण के परिणामों की गुणवत्ता भी बढ़ती है।

राइस के सर्वेक्षण में विभिन्न राज्यों में अध्ययन किए गए गाँवों का उन राज्यों की जनसंख्या से कोई लेना-देना नहीं था , वहीं दूसरी ओर नार्स के सर्वेक्षण में लिए गए नमूनों की संख्या राज्य की ग्रामीण जनसंख्या के अनुपात में थी।

राइस के सर्वेक्षण में ओडीएफ एवं गैर-ओडीएफ गाँवों की परवाह नहीं की गई है, वहीं नार्स के सर्वेक्षण में इनकी संख्या 6 जून 2018 तक ओडीएफ घोषित व अन्य गाँवों के अनुपात में ली गई है। इससे हम इस संभावना पर विचार कर सकते हैं कि राइस के सर्वेक्षण में ओडीएफ गाँवों की संख्या कम होने के चलते परिणाम अधिक खुले में शौच की ओर संकेत करते हैं।

नार्स के सर्वेक्षण की अवधि राइस के सर्वेक्षण के दो माह बाद की है तो इससे यह भी समझा जा सकता है कि इस अवधि में और प्रगति हुई होगी जिससे नार्स के सर्वे में कम खुले में शौच रिपोर्ट किया गया।

उपरोक्त तथ्यों से हम पाते हैं कि नार्स का सर्वेक्षण अधिक विश्वसनीय है लेकिन फिर भी कुछ मीडिया संस्थान राइस के सर्वेक्षण के कारण नार्स के सर्वेक्षण के प्रति संदेह व्यक्त कर चुके हैं। निस्संदेह ही राइस के अध्ययन क्षेत्रों में खुले में शौच अधिक होता होगा लेकिन इसे राष्ट्रीय स्तर पर देखना गलत है।

हम राइस के अध्ययन दल के सदस्यों के प्रयास व उनके सामर्थ्य पर विश्वास करते हैं लेकिन एक ओर जहाँ उनका अध्ययन क्षेत्र संकुचित है, वहीं नार्स का क्षेत्र विस्तृत और साथ ही कई विशेषज्ञों से समर्थन प्राप्त। इसके अलावा 16.3 प्रतिशत घर के साक्षात्कारों में स्वतंत्र संस्था का निरीक्षक भी सर्वेक्षणकर्ता के साथ था, 9.1 प्रतिशत घरों में संस्था ने पुनः निरीक्षण भी किया। 2 प्रतिशत घरों में स्वच्छता मंत्रालय पुनः निरीक्षण करने गया व 3 प्रतिशत घरों में कॉल से पुनः निरीक्षण किया।

नार्स के सर्वेक्षण से अधिक राइस के सर्वेक्षण पर विश्वास मात्र एक कारण से हो सकता है और वह है- सहूलियत और नैरेटिव (कथात्मक) के अनुसार चयनात्मक डाटा को महत्त्व देना। नार्स के डाटा में सरकारी पक्षपात मानना भी गलत होगा क्योंकि इसमें कई अंतर्राष्ट्रीय स्वतंत्र संस्थाएँ भी सम्मिलित थीं।

यह सत्य है कि “जो पाया उसमें खो न जाएँ, जो खोया उसका ध्यान करें” और इसी प्रेरणा के साथ हमें स्वच्छता के प्रति और सक्रिय होना है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम अपनी उपलब्धि पर गौरवान्वित न महसूस करें।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं व @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करते हैं।