भारती
गंगा की सफाई के लिए नमामि गंगे परियोजना देरी से पहुँची बिहार और पश्चिम बंगाल

सोमवार (27 जनवरी) को पाँच-दिवसीय गंगा यात्रा की शुरुआत की गई जिसका उद्देश्य उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने गंगा के किनारे पड़ने वाले “1,038 गाँवों के लोगों को नमामि गंगे के अभियान से जोड़कर पवित्र नदी को प्रदूषण-मुक्त करना, स्वच्छ पेय जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना, प्राकृतिक खेती, बागवानी से रोजगार प्रजनन और लोगों की आय बढ़ाना व तालाबों का विकास” बताया।

वहीं, दिल्ली में चुनावों की गर्मी के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि “यदि वे प्रतिबद्ध होते तो यमुना भी गंगा जितनी साफ होती”। उधर, उत्तर प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने दावा किया है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल की रिपोर्ट के अनुसार गंगा पहले से अधिक प्रदूषित है।

खैर, इन राजनीतिक बयानबाज़ियों से परे, हमारा काम है नमामि गंगे परियोजना की प्रगति का आँकलन करना। यह सत्य है कि गंगा को स्वच्छ रखने के लिए उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में कई काम हुए, लेकिन वहीं हम पाते हैं कि बिहार और पश्चिम बंगाल में अधिक प्रगति देखने को नहीं मिली।

गंगा में प्रदूषण का सबसे बड़ा स्रोत है सीवेज (मलजल) और नमामि गंगे के अधीन कुल 310 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ स्वीकृत हुई हैं जिनमें से 114 पूरी की जा चुकी हैं। दिसंबर 2019 तक की प्रगति को दर्शाता यह डाटा हमें नमामि गंगे की ही वेबसाइट से प्राप्त हुआ है।

उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में क्रमशः 34 और 35 सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ पूरी हुई हैं, जबकि बिहार और बंगाल में क्रमशः छह और 29। यदि इन राज्यों से गुज़रने वाले गंगा के भाग के अनुपात में हम देखेंगे तो ये कार्य प्रगति काफी कम है। उत्तराखंड में गंगा का 310 किलोमीटर लंबा भाग है जबकि बिहार और बंगाल में क्रमशः 445 व 520 किलोमीटर। उत्तर प्रदेश से 1,140 किलोमीटर लंबाई के साथ गंगा गुज़रती है।

गंगा की लंबाई के अनुपात को छोड़कर यदि हम केवल इन राज्यों के लिए तय लक्ष्य से भी इनकी कार्य प्रगति की तुलना करेंगे, तब भी बिहार और बंगाल को पीछे ही पाएँगे। उत्तराखंड में एसटीपी क्षमता के 20.6 प्रतिशत लक्ष्य को प्राप्त किया गया है और उत्तर प्रदेश में 25.7 प्रतिशत लक्षित क्षमता को। वहीं बिहार में 5.7 प्रतिशत और बंगाल में 7.1 प्रतिशत लक्ष्य को ही प्राप्त किया जा सका।

एसटीपी क्षमता (एमएलडी)

हालाँकि, जनवरी के अंत तक इस दिशा में प्रगति देखने को मिली है। एक ओर जहाँ बंगाल के भाटपाड़ा में 31 और 10 मिलियन लीटर मलजल के प्रतिदिन (एमएलडी) उपचार क्षमता वाले एसटीपी बनकर तैयार हुए, वहीं पटना में भी नए एसटीपियों को काम तेज़ी से चल रहा है जो शहर को 2035 की आवश्यकता जितनी मलजल उपचार क्षमता देगा।

पटना में निर्माणाधीन सीवरेज इंफ्रास्ट्र्क्चर

पटना के वर्तमान एसटीपियों की इतनी क्षमता नहीं है कि वे शहर में उत्पन्न होने वाले पूरे मलजल का उपचार कर सकें, इसके परिणामस्वरूप गंगा में अनुपचारित अपशिष्ट जल भारी मात्रा में बहाया जाता है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा के अनुसार बिहार से गंगा में जाने वाले पूरे अपशिष्ट जल का आधा भाग अकेले पटना और भागलपुर से आता है। इस समस्या के समाधान के लिए पटना में कुल 3,500 करोड़ रुपये की लागत वाली 11 परियोजनाएँ चल रही हैं।

पटना को सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए कुल छह ज़ोनों में बाँटा गया है। 1,140 किलोमीटर लंबी सीवरेज लाइन बिछाने के साथ-साथ 350 एमएलडी मलजल के उपचार की क्षमता बनानी है।

चार ज़ोनों- पहाड़ी, करमालीचक, दीघा और कंकड़बाग- के सीवरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का दायित्व जनवरी की शुरुआत में वीए वाबाग नामक कंपनी को दिया गया। 1,187 करोड़ रुपये के इस अनुबंध में दीघा और कंकड़बाग ज़ोनों में 150 एमएलडी क्षमता वाले एसटीपियों की स्थापना और 450 किलोमीटर लंबी सीवेज लाइन का बिछाया जाना तय किया गया है। दिसंबर 2020 तक पूरा करने के लक्ष्य के साथ बन रही यह परियोजना शहर की आधी जनसंख्या द्वारा उत्पन्न मलजल का उपचार करने में सक्षम होगी।

बेउर, सैदपुर, करमालीचक और पहाड़ी में निर्माणाधीन जिन चार एसटीपियों का काम 2019 के अंत तक पूरा हो जाना था, वह अब जून 2020 तक पूरा हो पाएगा। कार्य में देरी की वजह जल जमाव, प्रक्रियाओं में विलंब और सीवरेज लाइन बिछाने के लिए सड़क विभागों की अनुमति बताई जा रही है।

इनमें से पहाड़ी और करमालीचक पर वीए वाबाग ही काम कर रही है। पहाड़ी एसटीपी अप्रैल तक बनकर तैयार हो जाएगी और जून तक इसे पाइप से जोड़ दिया जाएगा। वहीं सैदपुर एसटीपी बनकर तैयार है व इसका ट्रायल चल रहा है। बेउर एसटीपी का इनलेट चैंबर सितंबर-अक्टूबर में जल जमाव के कारण क्षतिग्रस्त हो गया था इसलिए उसमें देरी हो रही है।

इन एसटीपियों से उपचारित जल का उपयोग राष्ट्रीय थर्मल पावर निगम लिमिटेड (एनटीपीसीएल) द्वारा बिजली बनाने और खेती के लिए होगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ऐसा करने के लिए सिंचाई विभाग को निर्देश दिया है और एनटीपीसी से भी इसके लिए समझौता हो चुका है।

पश्चिम बंगाल में बने नए एसटीपी

नमामि गंगे परियोजना के अंतर्गत पश्चिम बंगाल के भाटपाड़ा में 31 और 10 एमएलडी क्षमता के एसटीपी इसी सप्ताह में बनकर तैयार हुए। साथ ही 120 किलोमीटर लंबी सीवेज लाइनें बिछाने का भी काम पूरा हुआ। इस प्रकार शहर की कुल मलजल उपचार क्षमता 61 एमएलडी हो गई है।

31 एमएलडी वाला यह एसटीपी देश का पहला ग्रीन एसटीपी है जिसमें फिक्स्ड-बेड बायोफिल्म एक्टिवेटेड स्लज तकनीक है जो वातावरण को बदबू-रहित रखती है। इससे 52,000 घरों के मलजल का उपचार होगा।

भाटपाड़ा से ही कुछ किलोमीटर दूर हालिशहर है और यहाँ भी 16 एमएलडी वाला एसटीपी लगभग पूरा बन चुका है। 227 किलोमीटर लंबी सीवेज पाइप डाली जा चुकी है। वरिष्ठ परियोजना अभियंता शौर्यदीप मित्रा ने बताया कि अभी गंगा में 150-250 मिलिग्राम बीओडी वाला अपशिष्ट जल डाला जाता है और परियोजना के बाद 5 मिलिग्राम बीओडी वाला जल गंगा में बहाया जाएगा।

इसी प्रकार अंग्रेज़ों के समय से चल रहे टोली नाले को रोकने के लिए 26 एमएलडी का एसटीपी बनाया जाना है जिसके लिए टेंडर मंगवाए जा रहे हैं। बैरकपुर में 150 किलोमीटर लंबी सीवेज लाइन भी बिछाई जा रही है जो 35,000 घरों को जोड़ेगी।

दुर्भाग्यवश हमारे पास गंगा में प्रदूषण सूचकांक का डाटा उपलब्ध नहीं है जिससे हम इन कार्य प्रगतियों का प्रभाव देख पाएँ। हालाँकि नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को प्रमुख स्थलों पर गंगा की जल गुणवत्ता सार्वजनिक रूप से दर्शाने के लिए कहा था लेकिन ऐसा अभी तक देखने को नहीं मिला है।

वायु प्रदूषण सूचकांक की तरह यदि सार्वजनिक बोर्डों पर जल प्रदूषण सूचकांक भी दिखेगा तो शायद हम इसके प्रति संवेदनशील बनेंगे और साथ ही कम से कम शर्म के कारण अधिकारी अपनी कार्यविधि में संभावित तेज़ी लाएँ। अभी हम 2022 तक गंगा के सीवेज-मुक्त होने के लक्ष्य की प्रतीक्षा ही कर सकते हैं।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।