भारती
मुस्लिम भीड़ ने महिलाओं को आगे कर दिल्ली पुलिस पर किया पूर्व-नियोजित हमला

वज़ीराबाद सड़क (क्रमांक 59) जो हिंदू-बहुल यमुना विहार और मुस्लिम-बहुल चांदबाग को विभाजित करती है, वह 24-25 फरवरी को दिल्ली दंगों का एक बड़ा केंद्र बन गई थी।

इसी स्थान पर मुस्लिम भीड़ ने पुलिस दल को घेरा था और उन्हें पीटा था जिसमें हेड कॉन्सटेबल रतन लाल वीरगति को प्राप्त हो गए थे व कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे।

दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोप-पत्र (जिसे स्वराज्य ने पढ़ा) में सीएए-विरोधी प्रदर्शनकारियों के गहरे षड्यंत्र की बात कही गई है और दावा किया गया है कि प्रदर्शनकारियों ने जान-बूझकर 24 फरवरी का दिन चुना था क्योंकि उसी दिन यूएस राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत आ रहे थे द्वि-दिवसीय दौरे पर।

चांदबाग स्थित प्रदर्शन स्थल के आयोजक लोकप्रियता प्राप्त करना चाहते थे और विरोध को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना चाहते थे, आरोप-पत्र में कहा गया।

इतना ही नहीं, आरोप-पत्र के अनुसार बिना किसी उकसावे के प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए जिससे सभी पुलिसकर्मी एक जगह पर जुट गए। उसके बाद षड्यंत्र के तहत पुलिस को तीन तरफ से महिला प्रदर्शनकारियों ने घेर लिया ताकि वे बलप्रयोग न कर सकें। उनके पीछे एक 5 फीट ऊँची रेलिंग थी।

महिलाओं ने मान ढाल का काम किया, उन्हें आगे करके दंगाई पीछे से पुलिसकर्मी पर पत्थर बरसाते रहे। कुछ फुलिसकर्मियों ने रेलिंग कूदकर दूसरी ओर जाने का प्रयास किया लेकिन कुछ ही इसमें सफल हुए। शेष को दंगाइयों ने पीटा।

इस घटना को कैमरे में रिकॉर्ड किया गया था और सोशल मीडिया पर यह वीडियो प्रसारित भी हुआ था जिसने सबको आक्रोशित किया था। लेकिन यह पहली बार है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर पूर्व-नियोजित षड्यंत्र के तहत ऐसा करने का आरोप लगाया है।

जब अतिरिक्त पुलिस बल और पड़ोसी क्षेत्र से हिंदू भीड़ आई तो पुलिसकर्मी बच सके और तब ही अनियंत्रित मुस्लिम भीड़ नर्म पड़ी, आरोप-पत्र में कहा गया। 24 फरवरी की दोपहर की हिंसा के विषय में दिल्ली पुलिस की चार्जशीट का एक अंश नीचे संलग्न है।

जब हिंदू भीड़ सड़क घटनास्थल पर पहुँची और मुस्लिम दंगाइयों से भिड़ने लगी तब यह पूर्ण रूप से एक हिंदू-मुस्लिम दंगा बन गया। इसके बाद एक मुस्लिम दंगाई शाहिद आलम की सप्तऋषि इस्पात एंड अलॉय प्राइवेट लिमिटेड की छत पर गोली लगने से मौत हो गई। इस दुकान पर मुस्लिम भीड़ ने कब्ज़ा किया हुआ था।

एनडीटीवी और रवीश कुमार की भूमिका

5 मार्च को एनडीटीवी पर रवीश कुमार के प्राइम टाइम में कुछ वीडियो दिखाए गए थे जिसमें कुछ दंगाइयों को मोहन नर्सिंग होम एंड हॉस्पिटल की छत से ईंटें-पत्थर बरसाते देखा जा सकता, जहां से वीडियो शूट किया गया है उस ओर।

मोहन नर्सिंग होम सप्तऋषि इस्पात के सामने ही है जहाँ से मुस्लिम दंगाई हिंदू भीड़ पर हमला कर रहे थे। इससे इस बात की पुष्टि की जा सकती है किएनडीटीवी द्वारा प्रसारित यह वीडियो किसी मुस्लिम दंगाई ने शूट किया होगा जो सप्तऋषि इस्पात की छत पर रहा होगा।

एनडीटीवी द्वारा दिखाए गए एक और वीडियो में शाहिद आलम को गोली लगने के बाद दंगाइयों के समूह द्वारा छत से नीचे लाते हुए देखा जा सकता है। हिंदू दंगाइयों के कुछ अच्छी गुणवत्ता (हाई रिज़ॉल्यूशन) वाले चित्र भी एनडीटीवी  ने दिखाए हैं (जो सप्तऋषि की छत से खींचे गए होंगे, जैसा कि ऊपर के चित्र में देखा जा सकता है कि एक व्यक्ति के पास डीएसएलआर कैमरा भी है)।

रवीश कुमार ने इस शो में वह वीडियो भी दिखाया जिसमें बुरकाधारी महिलाएँ पुलिसकर्मियों को घेरे हुए हैं और मुस्लिम भीड़ उनपर पत्थर बरसा रही है। पुलिस को पीटने का वीडियो भी प्रसारित किया गया।

लेकिन रवीश कुमार और एनडीटीवी की गलती यह हुई कि उन्होंने शुरुआती तीन वीडियो को सही संदर्भ में नहीं दिखाया। एनडीटीवी के वीडियो से नैरेटिव यह बनता है कि मोहन नर्सिंग होम से मुस्लिम-बहुल कॉलोनी पर दंगाइयों की गोलीबारी के कारण एक ऑटो चालक की मौत हो गई।

इसने इस बात पर प्रश्न नहीं किए कि सप्तऋषि की छत पर शाहिद आलम और अन्य मुस्लिम दंगाई क्या कर रहे थे। एनडीटीवी  ने इस बात पर भी संकेत किया कि शाहिद की मौत दूसरी तरफ से चली हिंदू दंगाइयों की बंदूक के कारण हुई होगी जो मोहन नर्सिंग होम की छत पर थे।

हालाँकि पुलिस ने जाँच में पाया कि इसकी संभावना न के बराबर है। दिल्ली पुलिस ने 5 मार्च के शो में दिखाए गए वीडियो की माँग करते हुए 8 मार्च को एनडीटीवी को पत्र भेजा। लेकिन एनडीटीवी ने पुलिस की बात नहीं मानी और पुलिस ने पुनः 14 मई को पत्र भेजा।

जब पुलिस को वीडियो मिला तो उसका विश्लेषण किया गया और ज़मीनी स्तर पर जानकारी देने वालों (इन्फॉर्मर्स) को सक्रिय किया गया ताकि दंगाइयों की पहचान की जा सके।

“दोनों इमारतों (सप्तऋषि और मोहन नर्सिंग) के बीच 78 मीटर की दूरी है। मृतक के शरीर से तीन तांबे के अंश मिले हैं, एफएसएल परिणाम नहीं आए हैं लेकिन अब तक जो पता चला है उससे लगता है कि यह किसी छोटी बंदूक के अंश हैं और इसलिए इस बात की बहुत कम संभावना है कि मोहन नर्सिंग होम की ओर से गोली चली हो।”, पुलिस चार्जशीट में लिखा गया।

साथ ही मुस्लिम दंगाई भी समान स्तर पर, यदि अधिक नहीं, मोहन नर्सिंग होम एवं सड़क पर हिंदुओं की तरफ पत्थर और बोतलें फेंक रहे थे। दिल्ली पुलिस ने शाहिद के सात उपस्थित और दंगों में सम्मिलित छह आरोपियों को गिरफ्तार किया है।

ये छह हैं- मोहम्मद फिरोज़, रईस खान, चांद मोहम्मद, मोहम्मद जुनैद, इरशाद और अकील अहमद। इन सभी ने पुलिस दल पर हमला करने और फिर सप्तऋषि से तीन लोगों को बाहर निकालकर (इन लोगों ने भी आरोपियों की पहचान की है और बयान दिया है) वहाँ कब्ज़ा करने एवं छत से हिंदू भीड़ पर पत्थर और गोलियाँ बरसाने का अपराध स्वीकार कर लिया है। कॉल डाटा रिकॉर्ड से भी स्पष्ट होता है कि आरोपी घटनास्थल पर थे।

कुल मिलाकर बात यह हुई कि एनडीटीवी और रवीश कुमार मुस्लिम दंगाइयों के काम आए जिन्होंने हिंदू दंगाियों के वीडियो चैनल को दिए होंगे जबकि वे लोग मुस्लिम दंगाइयों का प्रतिकार ही कर रहे होंगे।

सबसे अच्छी संभावना यह है कि चैनल और एंकर मुस्लिम दंगाइयों के लिए काम आने वाले मूर्ख बन गए। और बुरी संभावना यह है कि जान-बूझकर उन्होंने प्रोपगैंडा फैलाने वाला वीडियो प्रसारित किया जो दंगाइयों द्वारा ही शूट किया था जिससे वे भी अपराध में भागीदार बन जाते हैं।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं।