भारती
मुंबई की विकृत शहरी संरचना को ठीक करने का अवसर कैसे बनाएँ कोविड-19 को

विश्व के प्रमुख मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र कोविड-19 का केंद्र बने हुए हैं। यूएस में न्यूयॉर्क सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्र है। यूएस के कुल मामलों का 20 प्रतिशत अकेले न्यूयॉर्क सिटी में है। ऐसा ही भारत के मुंबई में है जहाँ 13 अप्रैल तक देश के कुल मामलों के 14 प्रतिशत मामले पाए गए।

ऐसे में शहर के लिए सबसे बड़ी चुनौती संक्रमण के प्रसार को रोकने की होगी। यह चुनौती और बड़ी इसलिए हो जाती है क्योंकि ये शहर राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के इंजन हैं।

लॉकडाउन और सामाजिक दूरी का शहरों और देशों की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ा है। भारत में 25 मार्च से 14 अप्रैल तक लॉकडाउन घोषित किया गया था जिसे अब बढ़ाकर 3 मई तक किया जा चुका है।

यद्यपि 20 अप्रैल के बाद परिस्थिति के अनुसार कुछ क्षेत्रों को सीमित व सशर्त छूट देने की बात कही गई है लेकिन मुंबई कोविड-19 संक्रमण का हॉस्पॉट केंद्र बना हुआ है और सामुदायिक प्रसार के बढ़ते खतरे के बीच कम ही संभावना है कि मुंबई को छूट मिलेगी।

साथ ही लंबे समय तक लॉकडाउन को जारी नहीं रखा जा सकता है। भारत जैसा विकासशील देश मुंबई जैसे मुख्य आर्थिक केंद्र को लंबे समय तक निष्क्रिय करके नहीं रख सकता।

वहीं दूसरी ओर मुंबई शहर की कुछ अजीब बातें इसके लिए लॉकडाउन से बाहर निकलने के कार्य को चुनौतीपूर्ण बनाएँगी। एक क्षेत्र ऐसा है जो कोविड-19 को नियंत्रित करने और शहर को पटरियों पर पुनः उतारने में विरोधाभासी भूमिका निभाएगा, वह है सार्वजनिक परिवहन, विशेषकर लोकल ट्रेनें।

मुंबई लोकल ट्रेन

शहरों में प्रायः आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्र अलग-अलग होते हैं जिस कारण इधर-उधर आना जाना अपरिहार्य बन जाता है। साथ ही सार्वजनिक परिवहन, यातायात को सबसे सस्ता साधन रहता है और इसी कारण यहाँ सर्वाधिक भीड़ भी होती है।

शहरों के इसी गुण के कारण कोविड-19 संक्रमण कर्व के धीमे पड़ने के बावजूद लॉकडाउन समाप्त करने में सबसे बड़ी समस्या होगी। जिन शहरों में आवासीय और व्यावसायिक क्षेत्रों में दुराव है और सार्वजनिक परिवहन की अहम भूमिका है, वहाँ यह समस्या और बड़ी हो जाती है।

दुर्भाग्यवश मुंबई में दुराव और निर्भरता दोनों ही काफी मात्रा में है। 2011 की जनगणना के अनुसार मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र (एमएमआर) के 20 लाख लोग, जो पूरे कार्यबल का एक-तिहाई है, परिवहन के लिए ट्रेनों का ही उपयोग करते हैं। जनगणना में इस कार्यबल में कृषि और घरेलू उद्योगों के अलावा निरंतर कार्यरत लोगों को गिना गया है।

यह रेल यात्रा ठाणे जिले के कस्बों से आने वाले लोगों के लिए लंबी होती है। 2011 की जनगणना के अनुसार काम करने के लिए ठाणे से आने-जाने वाले लोगों को एक तरफ की यात्रा में लगभग 30 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है और वे लगभग 50 मिनट पटरियों पर व्यतीत करते हैं।

जो लोग मुंबई जिले में ही रहते हैं और एमएमआर के भौगोलिक केंद्र में आते हैं, वे एक तरफ की यात्रा में लगभग 14 किलोमीटर का सफर करते हैं और 34 मिनट पटरियों पर बिताते हैं।

ट्रेनों में आवागमन करने वाले अन्य यात्री भी लगभग इतना ही समय व्यतीत करते हैं। व्यस्त घंटों (सुबह 7 से 11 और शाम 4 से 8 के बीच) में 1,100 यात्रियों की क्षमता वाली एक लोकल ट्रेन में 4,000 लोग यात्रा करते हैं, विल्मर स्मिथ की 2012 की रिपोर्ट के अनुसार।

कोविड-19 के प्रसार को नियंत्रित करने में सर्वाधिक प्रचलित इस परिवहन माध्यम में अत्यधिक भीड़ ही सबसे बड़ी चुनौती है। अगर सभी यात्री भी मास्क पहनें तब भी लोकल ट्रेनों में संक्रमण फैलने की बड़ी संभावना है क्योंकि मास्क भी संक्रमित छोटी बूंदों का 100 प्रतिशत निषेध सुनिश्चित नहीं कर सकते हैं।

इन ट्रेनों की इतनी भीड़ एमएमआर के असंतुलित विकास की ओर भी संकेत करती है। एमएमआर की लगभग 40 प्रतिशत जनसंख्या बृहन् मुंबई के क्षेत्र से बाहर रहती है, अधिकांश रूप से ठाणे जिले में। लेकिन ये बाहरी नगर केवल 30 प्रतिशत ही रोजगार के अवसर उत्पन्न कर पाते हैं।

विशेषकर यदि हम वित्तीय और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के मध्यम और उच्च आय नौकरियों की बात करें तो बृहन् मुंबई की सीमा के बाहर ऐसे केवल 20 प्रतिशत अवसर ही उत्पन्न हो पाते हैं।

ये आँकड़े 2011 की जनगणना और 2013 के आर्थिक सर्वेक्षण के हैं। बहुत संभावना है कि 2020 तक अंतर की यह खाई और गहरी हो गई होगी।

अभी के लिए यह किया जा सकता है कि जितना हो सके उतने संस्थान घर से काम करने पर लाभ दें और लोकल ट्रेन की बजाय दूसरे परिवहन माध्यम प्रदान करने पर विचार करें। लेकिन छोटी अवधि के लिए ये उपाय सीमित ही हैं, विशेषकर वैकल्पिक परिवहन साधन प्रदान करने वाला।

वैकल्पिक साधन सड़क आधारित होंगे, अधिकांश रूप से बस जो पहले से ही भीड़ वाली और धीमी गति की सड़कों पर और भार डालेंगी, भले ही ये लॉकडाउन के बाद का कम भीड़ वाला समय ही क्यों न हो।

इस निराशा की स्थिति में एक आशा की किरण भी है। महामारी के कारण थम गई इस नगरी में नीति संबंधित परिवर्तन किए जा सकते हैं। आम तौर पर भीड़ और व्यस्तता के कारण यह संभव नहीं होता लेकिन कोविड-19 ने यह समय और अवसर प्रदान किया है।

नीति निर्माता लंबे समय से मुंबई में भीड़ कम करने और वैकल्पिक व्यावसायिक जिले विकसित करने पर विचार कर रहे हैं। लेकिन इन दोनों ही दिशाओं की उपलब्धियाँ वृद्धि और जनसंख्या के विस्तार से पीछे रह गई हैं।

बाहरी क्षेत्रों में बसने के लिए कंपनियों को लाभ दिया जा सकता है जिससे कर्मचारियों के लिए ट्रेन यात्रा की आवश्यकता घट सके। ये लाभ नगर नियोजन के माध्यम से या, और रेल यात्रा का शुल्क बढ़ाकर दि जा सकते हैं।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि लोकल ट्रेन की यात्रा का मूल्य बहुत ही कम होता है और सामान्य समय में भी शुल्क तार्किक ही होने चाहिए।

इससे भी अधिक ठोस कदम बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स की तर्ज पर कल्याण-डोंबिवली कॉम्प्लेक्स का निर्माण कार्य शुरू करना होगा। अधिकांश कंपनियाँ वहीं बसना चाहती हैं जहाँ अन्य कंपनियाँ बसी हुई होती हैं।

बांद्रा-कुरला कॉम्प्लेक्स

सामाजिक दूरी बनाए रखने के प्रतिबंधों के कारण जो इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ उभरेंगी, वे रोजगार के कम होते अवसरों की पूर्ति में सहायक होंगी और साथ ही एमएमआर की शहरी संरचना के असंतुलन को संतुलित करने में योगदान देंगी।

बाहरी क्षेत्रों में कंपनियों का बसना काफी प्रचलित है। मुंबई को छोड़कर भारत के सभी मेट्रो शहरों के बाहरी क्षेत्र मजबूत व्यावसायिक क्षेत्र हैं, उदाहरण के लिए दिल्ली के लिए नोएडा व गुरुग्राम एवं पुणे के लिए मगरपट्टा।

एक ओर जहाँ हम प्रतिबद्ध होकर कोविड-19 के विरुद्ध लड़ रहे हैं, हम इस आपदा को काफी समय से लंबित कार्यों को करने में उपयोग में ला सकते हैं, जैसे एमएमआर की शहरी संरचना को सही करना।

सामान्य समझ और मानवीय समझदारी के लिए यह त्रासद होगा यदि कोविड-19 के बाद एमएमआर के कर्मचारी को संक्रमण के भय के साथ लोकल ट्रेनों की उसी भीड़ में जाना पड़े।