भारती
मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक परियोजना तकनीक, सक्षमता और पर्यावरण की दृष्टि से भी उत्कृष्ट

पिछले सप्ताह मकर संक्रांति (15 जनवरी) के शुभ अवसर पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने महत्वाकांक्षी परियोजना मुंबई ट्रांस-हार्बर लिंक (एमटीएचएल) पुल का पहला गर्डर लॉन्च किया। 1,000 टन वज़नी गर्डर को 1,400 टन क्षमता वाले लॉन्चिंग गर्डर की सहायता से लगाया गया। 132 मीटर लंबा यह गर्डर 22 किलोमीटर लंबे पुल का पहला ऊपरी भाग बना।

लगभग 10,000 गर्डरों वाली इस परियोजना का पहला गर्डर मुख्यमंत्री ने मुंबई मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) अधिकारियों की उपस्थिति में लगाया। साथ ही इस बात को रेखांकित किया कि निर्माण कार्यों के बावजूद प्रवासी पक्षी अपना डेरा डाले हुए हैं इसलिए एमटीएचएल से पर्यावरण पर होने वाले प्रभाव की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।

मुंबई को नवी मुंबई से जोड़ने वाली इस परियोजना की परिकल्पना 45 वर्ष पहले की गई थी लेकिन अंततः इसे 2012 में स्वीकृति मिली। परियोजना को चार पैकेजों में बाँटा गया है जिनमें से तीन पैकेज निर्माण संबंधी हैं। चौथा पैकेज परिवहन प्रबंधन प्रणाली से संबंधित है जिसका अनुबंध अभी तक किसी को नहीं सौंपा गया है।

शिवड़ी इंटरचेंज समेत मुंबई खाड़ी का 10.38 किलोमीटर लंबा पहला पैकेज एल एंड टी को दिया गया है। शिवाजी नगर इंटरचेंज समेत मुंबई खाड़ी का 7.8 किलोमीटर लंबा दूसरा पैकेज टाटा प्रोजेक्ट्स को मिला है। 3.6 किलोमीटर लंबा तीसरा पैकेज भी एल एंड टी को ही मिला है। इनपर कार्य 24 अप्रैल 2018 को शुरू हो गया था।

18,000 करोड़ रुपये की अनुमानि लागत का 19 प्रतिशत अभी तक खर्च किया जा चुका है। पाइलिंग (नींव), पीयर (स्तंभ) निर्माण और निर्माण सुलभता के लिए अस्थाई पुल का निर्माण तीव्र गति से चल रहा है। पैकेज-1 में लगभग 400 पाइल व 50 पीयर बन चुके हैं। मंगलवार (21 जनवरी) को पहला डाइनामिक पाइल लोड टेस्ट भी किया गया।

डाइनामिक पाइल लोड टेस्ट

निर्माण के बाद यह भारत का सबसे बड़ा समुद्री पुल होगा व अनुमान है कि प्रतिदिन लगभग 70,000 वाहन इसपर चलेंगे। 27 मीटर चौड़ा यह पुल 6-लेन का होगा व साथ ही इसमें दो आपातकाल लेनें भी होंगी। समय, वाहन लागत और ईंधन बचाने में यह पुल महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस प्रकार यह वायु प्रदूषण को भी कम करेगा।

इससे मुंबई शहर में वाहन भीड़ को कम किया जा सकेगा क्योंकि गाड़ियाँ मुंबई शहर से घूमकर आने की बजाय सीधे नवी मुंबई जा सकेंगे। इससे नवी मुंबई के विकास को भी बल मिलेगा। नवी मुंबई हवाई अड्डे, पुणे एक्सप्रेसवे और रायगढ़ जिले से भी मुंबई की संयोजकता बढ़ेगी।

जैसा कि परियोजना को नाम है मुंबई ट्रांस-हार्बर लिंक तो हार्बर यानी बंदरगाह क्षेत्रों में भी यह संयोजकता बढ़ाने का काम करेगी। जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (जेएनपीटी) व मुंबई पोर्ट ट्रस्ट (एमबीपीटी) इस परियोजना से लाभान्वित होंगे।

समुद्री क्षेत्र से गुज़रने के कारण इस परियोजना को पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील माना जा रहा था। 2005 में मिली पर्यावरण स्वीकृति पाँच वर्षों बाद अमान्य हो गई और 2012 में पुनः स्वीकृति लेनी थी। इसी बीच 2011 में महाराष्ट्र सरकार ने तटीय क्षेत्र में निर्माण के लिए नए नियम निकाल दिए थे जिसे लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता निशाना साधने लगे।

वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से वार्ता के बाद अंततः अक्टूबर 2012 में परियोजना को पर्यावरण स्वीकृति मिली। अब एमएमआरडीए पुल के 6 किलोमीटर लंबे भाग में दृष्टि एवं ध्वनि बाधक लगा रहा है। इससे संवेदनशील बार्क को लोगों की नज़र से बचाया जा सकेगा, साथ ही क्षेत्र में शांति बनाकर फ्लैमिंगो व अन्य अप्रवासी पक्षियों के जीवन में पुल के कारण हस्तक्षेप नहीं होगा।

एमएमआरडीए के अतिरिक्त आयुक्त संजय खांडरे ने बताया कि ध्वनि बाधकों के अलावा प्रवासी पक्षियों के लिए वातावरण को गर्म भी रखा जाएगा और साथ ही पारिस्थितिकी (इकोलॉजिकल) के अनुसार संवेदनशील लाइटें भी होंगी जिनसे पक्षी प्रभावित नहीं होंगे।

10 वर्षों के काल में एमएमआरडीए ने पर्यावरण पर खर्च करने के लिए 280 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इससे प्रभावित होने वाले मछुआरों को मुआवज़ा भी दिया जाएगा। परियोजना से प्रभावित होने वाले 47.4 हेक्टेयर मैंग्रोव क्षेत्र की भरपाई के लिए इससे पाँच गुना बड़े क्षेत्र में मैंग्रोव पेड़ लगाए जा रहे हैं।

समुद्र के ऊपर पुल बनाने में एक और बात का ध्यान रखना होता है कि समुद्री यातायात प्रभावित न हो। इस कारण दो स्तंभों के बीच दूरी व पुल की ऊँचाई किसी जहाज़ को पार कराने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए। कई स्थानों पर 180 मीटर तक के स्तंभहीन भाग की भी आवश्यकता थी जिसे कॉन्क्रीट पूरा नहीं कर सकता था इसलिए वहाँ स्टील गर्डर लगाए जा रहे हैं।

स्टील भागों की लंबाई व संख्या

चौड़ाई के अलावा जहाज़ों के आवागमन के लिए पुल की पर्याप्त ऊँचाई की भी आवश्यकता थी जिसके लिए जेएनपीटी ने शुरुआत में 51 मीटर ऊँचाई की मांग की थी जिसे बाद में चर्चा के बाद 35 मीटर तय किया गया। इसके लिए 2012 में जेएनपीटी ने सहमति पत्र दे दिया।

शिवड़ी से शुरू होने वाला पुल का इंटरचेंज भाग भी काफी पेंचीदा है जहाँ से पुल से आने-जाने वाली गाड़ियाँ सड़क से जुड़ती हैं। पुल पर चढ़ने व उतरने दोनों के लिए ही तीन-तीन मार्ग हैं जो अलग-अलग स्थानों को जोड़ते हैं। विभिन्न स्तरों पर बने इन रैम्पों को वाहनचालक की सुलभता के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। लागत और ज़मीन पर आने वाली उपयोगिताओं का भी ध्यान रखा गया है।

पुल पर वाहनों के आवागमन को सुव्यवस्थित करने के लिए ट्रैफिक प्रबंधन प्रणाली स्थापित की जाएगी। इसके तहत प्रति किलोमीटर में तीन सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएँगे जिसपर नियंत्रण कक्ष के माध्यम से नज़र रखी जाएगी और यात्रियों को लिए आवश्यक सूचना डिजिटल संदेशों से दी जाएगी। सूचना संचार के लिए एमटीएचएल में ऑप्टिकल फाइबर केबल डाली जाएगी।

निर्माण कार्य

परियोजना को जनवरी 2013 तक वित्तीय स्वीकृतियाँ मिल गईं थीं। लेकिन इसमें एक समस्या आ रही थी की कोई भी बोली लगाने वाली कंपनी परियोजना का वित्तीय भार उठाने के लिए तैयार नहीं थी। इसके बाद वित्तपोषण के नए विकल्प तलाशे जाने लगे और जापान अंतर्राष्ट्रीय समन्वय एजेंसी (जिका) आंशिक रूप से परियोजना को वित्तपोषित करने के लिए तैयार हो गई।

फरवरी 2016 में केंद्र सरकार ने जिका के ऋण के समक्ष अपनी गारंटी दी। इसके बाद 2016 और 2017 में बोलियाँ मंगवाने और अनुबंध सौंपने की प्रक्रिया पूरी हुई। सितंबर 2022 तक पूरी किए जाने के लक्ष्य से यह परियोजना आगे बढ़ रही है।

उच्च तकनीकी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पहले पैकेज में एल एंड टी को जापान आधारित आईएचआई का साथ मिला है, वहीं कोरिया आधारित दैवू दूसरे पैकेज के लिए टाटा के साथ आई है। एक ओर जहाँ भारतीय कंपनियाँ निर्माण कार्य का पूरा दायित्व ली हुई हैं, वहीं इन विदेशी कंपनियों ने डिज़ाइन प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाई है।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।