भारती
पोषक अनाजों, दालों और तेलबीजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि लाभदायक कैसे

सोमवार (1 जून) को नरेंद्र मोदी सरकार ने 2020-21 (जुलाई से जून) के लिए खरीफ फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में वृद्धि करते हुए पोषक अनाजों, दालों और तेलबीजों को महत्त्व दिया है।

सरकार ने सबसे कम एमएसपी वृद्धि धान के लिए 53 रुपये प्रति क्विंटल और रामतिल के लिए सर्वाधिक 755 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की है।

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने नए एमएसपी की घोषणा करते हुए मीडिया से कहा कि सभी एमएसपी उत्पादन की औसत लागत का कम से कम डेढ़ गुना हैं। प्रेस इंफॉर्मेशन ब्यूरो की विज्ञप्ति में कहा गया कि अधिक एमएसपी किसानों द्वारा उगाई जाने वाली फसल की विविधता बढ़ाने में सहायता करेगा।

केंद्र क्यों चाहता है कि किसान फसलों की विविधता बढ़ाएँ, इसके तीन कारण हैं।

पहला कारण  है कि देश के पास गेहूँ और चावल जैसी फसलों का पहले से ही अथाह भंडार है। सरकार द्वारा तय अनिवार्य भंडार मानकों से कम से कम तीन गुना भंडार हमारे पास उपलब्ध है।

अनिवार्य भंडार को कई कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। साथ ही इस भंडार का उपयोग सूखा और बाढ़ जैसी आपातकालीन परिस्थितियों के लिए भी होता है।

दूसरा कारण  है कि भंडार की अधिक मात्रा होने के कारण कटाई के बाद अनाज के होने वाले नुकसान की भी मात्रा बढ़ती है। कई अध्ययनों में अनुमान लगाया गया है कि मौसम, कीड़ों और कृंतकों जैसे कारणों की वजह से लगभग 10-20 प्रतिशत अनाज नष्ट हो जाता है।

तीसरा कारण  है कि विविधता किसानों को अवसर देती है कि वे दालों या तेलबीजों जैसी फसल उगा सकें। घरेलू उत्पादन की सीमा को पार करके बढ़ती हुई माँग के कारण भारत को अच्छी-खासी मात्रा में दाल का आयात करना पड़ता है।

साथ ही खाद्य तेल के शीर्ष आयातकों में से भी भारत एक है। हम वार्षिक रूप से 1.5 करोड़ टन खाद्य तेल का आयात करते हैं क्योंकि घरेलू आपूर्ति माँग को पूरा कर पाने में अक्षम है। एसईए द्वारा जारी डाटा देखें-

दूसरी ओर स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती सजगता के बीच रागी, बाजरा, जोवार और मक्का जैसे पोषक अनाजों की भी अच्छी-खासी माँग है।

एसएसपी में विशेष वृद्धि को 2018-19 से देखा जा सकता है जब केंद्र ने निर्णय लिया था कि किसानों को उत्पाद लागत का कम से कम डेढ़ गुना सरकारी मूल्य के रूप में मिले। 2022 तक किसानों की आय को दोगुनी करने के प्रयास का ही यह परिवर्तन भी अंश है।

आँकड़े दर्शाते हैं कि जब से 2014 में मोदी सरकार केंद्र में आई, तब से पोषक अनाजों की एमएसपी अब तक डेढ़ गुना हो चुकी है, वहीं दालों की एमएसपी में 49 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। तेलबीजों की एमएसपी में भी 45 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

वहीं 2014-15 से धान की एमएसपी मात्र 37 प्रतिशत बढ़ी है। जबकि रागी और बाजरा जैसे पोषक अनाजों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में क्रमशः 112 प्रतिशत और 72 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

दालों को देखें तो तूर दाल के साथ-साथ उड़द दाल के एमएसपी में भी 37 प्रतिशत की बढ़त हुई है। चना के लिए एमएसपी 53 प्रतिशत बढ़ी है, वहीं मूंग और मसूर के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य में 56 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

तेलबीजों की बात करें तो मूंगफली की एमएसपी 31 प्रतिशत बढ़ी है, सूरजमुखी के बीज की एमएसपी में 56 प्रतिशत की बढ़त हुई है। वहीं सोयाबीन की एमएसपी में 51 प्रतिशत की वृद्धि हुई है तो तिल और सरसों में क्रमशः 49 और 42 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है।

खरीफ 2020-21 के लिए एमएसपी

कई किसान चावल और गेहूँ जैसे दैनिक अनाजों को ही मुख्य रूप से अभी भी उगा रहे हैं लेकिन निस्संदेह ही दालों, मोटे अनाजों और तेलबीजों के कृषि क्षेत्र बढ़े हैं।

पिछले वर्ष खरीफ फसलों के औसत क्षेत्र से 8 प्रतिशत अधिक क्षेत्र में खरीफ फसलें उगाई गईं थीं। लेकिन चावल के क्षेत्रफल में मात्र 2 प्रतिशत की ही वृद्धि हुई थी।

जून से सितंबर के बीच मानसून के समय में भी कई क्षेत्रों में सूखा वातावरण बने रहने के कारण मोटे अनाजों और तेलबीजों के अधीन आने वाले क्षेत्रफल में थोड़ी गिरावट हुई थी। लेकिन रबी काल में मोटे अनाजों का क्षेत्रफल 7 प्रतिशत से बढ़ा। वहीं तेलबीजों की खेती थोड़ी कम ही रही।

लेकिन यदि पिछले वर्ष जून से अगस्त के बीच कम वर्षा का वातावरण न रहता तो खेती के क्षेत्रफल के साथ-साथ उत्पादन भी रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जाता।

पोषक अनाजों, दालों और तेलबीजों के लिए एमएसपी बढ़ाने की केंद्रीय नीति का सकारात्मक फल यह है कि इनका उत्पादन गेहूँ और चावल के बढ़ते उत्पादन के साथ ही बढ़ रहा है।

2013-14 से गेहूँ के उत्पादन में 10 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। यह मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि पिछले वर्ष की तुलना में फसल के क्षेत्रफल में 32 लाख हेक्टेयर की बढ़त हुई। और ऐसा इसलिए हो पाया क्योंकि मानसून के बाद वाली वर्षा और अनुकूल मौसम ने किसानों को बड़े स्तर पर गेहूँ उगाने के लिए प्रोत्साहित किया।

2014 से धान के उत्पादन में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और पिछले वर्ष इसके अधीन आने वाले क्षेत्रफल में 9 लाख हेक्टेयर की बढ़त हुई थी।

हम देख सकते हैं कि पोषक अनाजों की खेती को प्रत्साहित करने वाली नीति फलीभूत हो रही है क्योंकि 2014 से 2019 के बीच इनके उत्पादन में 11.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इस महीने में समाप्त होने वाले इस मौसम में उत्पादन अवश्य ही कम हुआ है लेकिन इसका कारण है कि बेमौसम बरसात के कारण फसलें प्रभावित हुईं हैं।

दालों के उत्पादन में भी 2014 से 2019 के बीच 11 प्रतिशत की वृद्धि देखने को मिली है। वहीं तेलबीजों का उत्पादन 9 प्रतिशत से बढ़ा है।

मोदी सरकार ने जो एक बड़ी समस्या का सामना किया है, वह यह है कि 2014 से मानसून ने अपनी अनुपस्थिति से तीन बार परेशान किया है जिसके कारण योजनाएँ असंतुलित हो गई हैं।

इस वर्ष भारत मौसम विभाग (आईएमडी) ने एक सामान्य मौसम की भविष्यवाणी की है। साथ ही इस अनुमान का एक विशिष्ट भाग यह है कि विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा के समान वितरण की बात कही गई है।

इसका अर्थ हुआ कि देश का कोई भी भाग अस वर्ष वर्षा से वंचित नहीं रहेगा। अपेक्षा है कि इसका सकारात्मक प्रभाव अगले मौसम के कृषि उत्पादन पर भी देखने को मिलेगा जो जुलाई से शुरू हो रहा है।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।