भारती
चीनी आक्रामकता से निपटने के लिए भारत की विदेश नीति में क्या परिवर्तन हों

चीन ने हमें चुनौती दी है जिसे हम अनदेखा नहीं कर सकते। लदाख सीमा में चीन की घुसपैठ पर वार्ता निष्फल रही है और वनप्लस, वीवो, एमजी रोवर जैसी चीनी कंपनियाँ भारतीय मीडिया में तेज़ी से प्रचार कर रही हैं।

कई भारतीय ग्राहकों ने चीनी उत्पादों के बहिष्कार की बात की, उसके बावजूद ऐसा होना कम्युनिस्ट पार्टी की रणनीति लगती है जो यह देखना चाहता है कि भारत चीन से आर्थिक युद्ध में किस हद तक जा सकता है। अग हमने अभी पलके झपकीं तो हम यह युद्ध हार जाएँगे।

हम एक बार गलती कर चुके हैं जब तनाव कम करने के लिए हमने वार्ता शुरू की लेकिन सैन्य कमांडरों और विदेश मंत्री एवं राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की वार्ता से भी कुछ नहीं मिला। चीन दिखावटी रूप से पीछे हटा है लेकिन पैन्गोंग सो जैसे रणनीतिक क्षेत्रों से वह पीछे नहीं हटा है। भारतीय सेना अब जान चुकी है कि उसे लंबे समय के लिए तैयारियाँ करनी होगी, साथ ही इन ऊँचाइयों पर कड़ी सर्दी के लिए भी तैयार होना होगा।

ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के अध्यक्ष समीर सारन कहते हैं कि चीन की हाल की गतिविधियों से पाँच बातें सीखने वाली हैं- पहली या कि शी ज़िनपिंग के लिए वैश्विक मत महत्त्व नहीं रखता है। वे भारत को अपना शत्रु समझते हैं और ‘भारत के स्थान, प्रगति, प्रभाव और उपस्थिति को कम करना विदेश नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य।”

इसका अर्थ हुआ कि चीन भारत को कभी भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में स्थाई सदस्य नहीं बनने देगा न ही परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) से जुड़ने देगा। पाकिस्तान के आतंकी समूहों के विरुद्ध भारत की कार्रवाइयों में भी वह बाधा बनेगा।

सारन के अन्य बुंदु ये हैं- 1) चीन एक ओर युद्ध छेड़कर दूसरी ओर व्यापार जारी रखने में सहज है, 2) चीन जानता है कि लोकतांत्रिक देशों में उनके आंतरिक शत्रु कैसे उत्पन्न किए जाएँ ताकि वे चीन के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई न कर सकें।

इसका उदाहरण हम राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी में देख सकते हैं तथा कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) की तो बात करने की भी आवश्यकता नहीं है, ये लोग भारत-चीन तनाव का उत्तरदायी मुख्य रूप से भारत को बना रहे हैं।

सारन का चौथा बिंदु हुआवे से संबंधित है जो कहता है कि उसे भारतीय 5जी मोबाइल सेवाओं में प्रवेश नहीं मिलना चाहिए और पाँचवा बिंदु गलवान घाटी की झड़प में 16 बिहार रेजीमेन्ट के जवानों का चीनी सैनिकों को मुँहतोड़ जवाब पर चीन के पुनः विश्लेषण की बात कहता है।

अगर सारन सही हैं तो उनका विश्लेषण कि नरेंद्र मोदी की चीन नीति की धज्जियाँ उड़ी हुई है, उसपर संदेह करने का कोई कारण नहीं। वे लदाख जाकर विस्तारवाद के काल के अंत की बात कर सकते हैं लेकिन चीनियों पर शब्दों का प्रभाव नहीं होता। वे योजना के साथ आए हैं और उस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया है जहाँ दोनों पक्ष सिर्फ शस्त्रहीन गश्ती दल भेजा करते थे, ऐसे में इकी संभावना नहीं है कि वे जल्द ही क्षेत्र खाली करेंगे।

अगर मोदी को अपनी छवि और चीन नीति बचानी है तो ये पाँच बातें अनिवार्य हैं।

पहली, आर्थिक नुकसान झेलने के लिए तैयार रहना है क्योंकि भारत 59 चीनी ऐप से लेकर हुआवे और अन्य निर्यातों को रोकेगा। भारत-चीन व्यापार को काटना होगा और भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर में चीन के स्थान को पहले सीमित करके फिर पूर्णतः हटाना होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान के बावजूद यह सब करना होगा। व्यापार करके आप शत्रु को सशक्त नहीं कर सकते।

दूसरा, व्यापार युद्ध को लागू होने में थोड़ा समय लगेगा लेकिन त्वरित आवश्यकता एक संदेश भेजने की है कि भारत चीन के व्यापार प्रतिकारों या सैन्य आक्रामकता से नहीं डरता है। जब तक मई की शुरुआती यथास्थिति पुनः स्थापित न हो तब तक समझौते का कोई प्रश्न नहीं है।

ये संदेश मौखिक रूप से भेजने की कोई आवश्यकता नहीं है। भारतीय नागरिक और प्रबंधक जो चीन में काम कर रहे हैं, उन्हें वापस बुलाना चाहिए ताकि यदि सीमा पर स्थिति खराब हो तो चीन उन्हें बंदी बनाकर भारत पर दबाव न बना सके। इससे संदेश जाएगा कि भारत किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार है।

दूसरा यह किया जा सकता है कि सैन्य स्तर की वार्ताएँ समाप्त कर दी जाएँ। जब चीन का यही मानना है कि यथास्थिति पर पुः नहीं लौटा जाएगा तो वार्ता को कोई अर्थ ही नहीं। वार्ता यथास्थिति पर पुनः लौटने के बाद ही होनी चाहिए। हमें चीन को कह देना चाहिए कि जब तक सीमा की स्थिति 1 मई की यथास्थिति जैसी नहीं होती, कोई वार्ता नहीं होगी।

तीसरा, प्रधानमंत्री को औपचारिक रूप से देश को बताना चाहिए कि चीन ने उन क्षेत्रों पर अतिक्रमण कर लिया है जहाँ दोनों देश पहले गश्त किया करते थे। इस बात का दिखावा करने से बात नहीं बनेगी कि कुछ नहीं हुआ है, उल्टा यह सरकार के आर्थिक युद्ध के उपायों की बाधा रहेगा।

अगर भारतीयों को सीमा के खतरे की जानकारी नहीं होगी तो वे क्यों सस्सते चीनी उत्पाद लेने से कतराएँगे। इस बात को स्वीकार करने से मोदी की छवि दुर्बल लग सकती है कि चीन ने हमें धोखा दिया लेकिन घरेलू युद्ध जीतने के लिए लोकमत महत्त्वपूर्ण है और चीन की आँख से आँख मिलाकर हमें तब ही लड़ पाएँगे ब बातें हमें पता होंगी।

चौथा, चीन के साथ कम व्यापार का मत बनाने के लिए भारत को आर्थिक और सैन्य कूटनीति बढ़ानी होगी और चीनी कंपनियों पर भी प्रतिबंध बढ़ाने होंगे। अभी तक मात्र यूएस और ब्रिटेन ने हुआवे के विरुद्ध कदम बढ़ाया है लेकिन यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और भारत जैसे देशों के भी आगे आने से बात बनेगी। सभी देशों को आर्थिक नुकसान के बावजूद चीन पर प्रतिबंध बढ़ाने होंगे।

पश्चिमी एशिया में उइगर मुस्लिमों की स्थिति का डंका पीटना होगा ताकि वे भी चीन को ऊर्जा आपूर्ति के प्रतिबंध पर विचार कर सकें। लेकिन यूएस की विदेश नीति ने चीन के लिए दूसरा द्वारा खोल दिया है। चीन ने ईरान पर प्रतिबंध लगा दिया है तो अब ईरान चीन के साथ समझौते के लिए तैयार होगा।

पाँचवा, यह सबसे महत्त्वपूर्ण है, भारत को यूरोप, यूएस, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और पश्चिमी एशिया में अपना प्रोपगैंडा बढ़ाना होगा ताकि चीन की विश्वनीयता पर वे देश भी विचार करें।

मीडिया युद्ध को चतुरता से लड़ना है, चीन की तरह अपरिष्कृत तरीके से नहीं। भारत की विश्वसनीयता चीन से अधिक है लेकिन पश्चिमी मीडिया भारत-विरोधी मुद्र अपना रही है जब से 2014 में मोदी सत्ता में आए हैं।

मोदी के पास अधिक समय नहीं है, हम चार ‘सी’ से युद्ध लड़ रहे हैं- कोविड, चीन, कॉरपोरेट (उद्यम) और कस्टमर (उपभोक्ता)। चीन से निपटने के उपायों की घोषणा के साथ भारतीय उपभोक्ताओं और कंपनियों के लिए विकल्प की भी घोषणा होनी चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।