भारती
मुंबई मेट्रो प्रमुख अश्विनी भीड़े के अनुसार क्यों आरे विरोध मुंबई के लिए लाभदायक नहीं

प्रसंग- मुंबई मेट्रो प्रमुख अश्विनी भीड़े द्वारा आरे को लेकर पर्यावरण एक्टिविस्टों की चिंता का स्पष्टीकरण।

मुंबई मेट्रो की लाइन 3 के लिए आवश्यक कार शेड (डिपो) का निर्माण आरे कॉलोनी में प्रस्तावित है लेकिन इस कार्य हेतु होने वाली 2,298 पेड़ों की कटाई के कारण इसका विरोध हो रहा है। कई गैर-सरकारी संस्थाओं, फिल्म सितारों, एक्टिविस्टों और कुछ राजनीतिक दलों से समर्थन पाकर यह विरोध और प्रचंड हो गया है।

ऐसे में आवश्यकता है हमें पर्यावरण के प्रति हमारी समझ विस्तृत कर मुंबईवासियों के भविष्य पर तार्किक विचार करने की। वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय ने पेड़ों की कटाई स्थगित कर दी है। दूसरी ओर मुंबई मेट्रो की प्रमुख अश्विनी भीड़े हैं जो कई मौकों पर सामने आकर चीज़ें स्पष्ट करने का प्रयास कर चुकी हैं।

पिछले माह उन्होंने डीएनए  को दिए एक साक्षात्कार में इसपर विस्तृत चर्चा की थी जिसके कुछ बिंदुओं को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि आरे कॉलोनी की 30 हेक्टेयर भूमि ली जा रही है जिसमें से मात्र 25 हेक्टेयर भूमि पर ही निर्माण किया जाएगा। वास्तविकता में इस पूरे क्षेत्र में 3,000 पेड़ हैं लेकिन वे 17 प्रतिशत क्षेत्र में ही केंद्रित हैं। वृक्ष प्राधिकरण के निर्देशानुसार वे इस भूभाग से छेड़छाड़ नहीं करेंगे। और इसलिए इस 30 हेक्टेयर क्षेत्र के हीच में 5 हेक्टेयर भूमि छोड़ी जा रही है।

वे अपनी कठिनाइयों के बारे में बताती हैं कि 25 हेक्टेयर के क्षेत्र में 31 मेट्रो ट्रेनों के लिए डिपो डिज़ाइन करना काफी चुनौतीपूर्ण था। लेकिन उन्होंने कुछ लाइनों को घटाकर उनके लिए स्टेशन के निकट दूसरा स्थान ढूंढ निकाला। जैसे बीकेसी और कफ परेड पर दो-दो ट्रेनें लगाने के लिए स्थान उपलब्ध है।

कई एक्टिविस्ट इस डिपो का स्थान परिवर्तित कर कंजुरमार्ग पर निर्मित करने का सुझाव दे रहे हैं। इसपर भीड़े बताती हैं कि सितंबर 2015 से प्रयास करने के बावजूद दिसंबर 2016 तक वहाँ भूमि पर अधिग्रहण नहीं किया जा सका था।

“तब तक टेंडर दिए जा चुके थे तो हमें कार्य को आगे बढ़ाने के लिए डिपो का स्थान सुनिश्चित करना था। दिसंबर 2016 में सरकार ने हमें आरे पर डिपो कार्य शुरू करने की अनुमति दे दी थी और अब 50 प्रतिशत कार्य हो चुका है।”, मेट्रो प्रमुख ने बताया।

कंजुरमार्ग पर स्थानांतरण की उठ रही मांग पर उन्होंने कहा, “क्या वहाँ भूमि उपलब्ध है? नहीं।” वे आगे कहती हैं, “अगल उपलब्ध होती भी तो इसे विकसित करने में ही तीन वर्ष लग जाते क्योंकि यह दलदलीय भूमि है। हम उस परिस्थिति में कैसे प्रतीक्षा कर सकते हैं जब बड़े निवेश किए जा चुके हैं और 3 दिसंबर 2021 तक मेट्रो को क्रियान्वित करना है।”

कार शेड के लिए दूसरे स्थानों की उपयोगिता पर भीड़े कहती हैं कि कालीना विश्वविद्यालय, बीकेसी, महालक्ष्मी रेसकोर्स का अध्ययन किया गया था लेकिन कई कारणों से वे उपयुक्त नहीं लगे। यह कार शेड केवल पार्किंग स्थल नहीं अपितु मरम्मत स्थल भी होगा।

“कालीना को नहीं चुना जा सकता था क्योंकि विश्वविद्यालय की विस्तार योजनाएँ थीं। रेसकोर्स पर भूमिगत डिपो के लिए अध्ययन किया गया लेकिन हमने पाया कि उसे हमेशा वातानुकूलित रखना पड़ेगा जिसके पर्यावरण पर दुष्परिणाम होंगे। आरे की भूमि सबसे उपयुक्त थी क्योंकि तीन दिशाओं से इस तक पहुँचा जा सकता है और जेवीआलएर से भी इसकी पहुँच है।”, भीड़े ने बताया।

लोग इस निर्माण के कारण बाढ़ की संभावना बढ़ने की भी बात कर रहे हैं। इस तर्क को मेट्रो प्रमुख आधारहीन बताती हैं। “केवल 7 हेक्टेयर भूमि को कॉन्क्रीट से पक्का किया जाएगा, शेष 75 प्रतिशत भूमि कच्ची ही रहेगी। यह क्षेत्र मिठी नदी के बाढ़ क्षेत्र नहीं बल्कि जलग्रहण क्षेत्र में आता है और ढलान के अधिक होने से पानी आसानी से बह जाएगा।”, भीड़े कहती हैं।

वर्षा के जल की निकासी के लिए पुराने नाले और प्राकृतिक मार्ग है। भूमि विकास के समय कुछ पुराने नालों को क्षेत्र की परिधि से बाहर किया गया और नालियों से जोड़ा गया। इसके अलावा भीड़े ने स्पष्ट किया कि 33 किलोमीटर की मार्ग रेखा में मात्र 4-5 हेक्टेयर भूमि पर ही स्थाई निर्माण होगा जिससे खुले क्षेत्रों के अभाव के कारण बाढ़ नहीं आएगी।

वृक्षों के प्रति लोगों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंता पर भीड़े ने बताया कि 3,000 प्रभावित वृक्षों में से 65 प्रतिशत का प्रत्यारोपण किया जा चुका है। जितने वृक्ष इस प्रत्यारोपण के बाद जीवित नहीं रह पाएँगे, उनके बदले तीन गुना वृक्ष लगाए जाने का संकल्प पत्र सौंपा गया है।

भीड़े ने बताया, “संजय गांधी नेशनल पार्क में निम्नीकृत हो चुके वन क्षेत्र में भी 21,000 पेड़ लगाए जा रहे हैं। आरे कार शेड के लिए हटाए गए 2,659 पेड़ों में से 450 पेड़ उसी क्षेत्र में लगाए जाएँगे।” इससे उस क्षेत्र के वातावरण की भी क्षति नहीं होगी।

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर हो रहे वाद-विवाद के विषय पर उन्होंने कहा कि न्यायालयों में वे अपने तर्क के आधार पर जीत सकते हैं लेकिन उन्हें चिंता केवल इसके कारण नष्ट होने वाले समय की है। उन्होंने यह भी बताया कि व्यक्तिगत स्तर पर भी वे सोशल मीडिया पर परियोजना संबंधी दुष्प्रचार को रोकना चाहती हैं लेकिन हर तर्क का वितर्क दे दिया जाता है।

“परियोजना का समर्थन करने वाले भी कई लोग हैं लेकिन वे संगठित नहीं है। वे चाहते हैं कि हम सोशल मीडिया पर सही जानकारी दें ताकि वे अपने स्तर पर दुष्प्रचार को रोक पाएँ। इसलिए हम तथ्य साझा करते हैं। यह सोशल मीडिया युद्ध जैसा लग सकता है लेकिन दुष्प्रचार को रोकने के लिए सही जानकारी देना आवश्यक है।”, मेट्रो प्रमुख ने बताया।

विरोध के कारण होने वाली देरी और परियोजना की बढ़ती लागत पर भीड़े ने कहा कि वित्तीय लागत एक ओर है लेकिन मुंबईवासियों को होने वाली परेशानी अधिक चिंतनीय है। यह परियोजना नगरवासियों के लिए एक बेहतर परिवहन साधन लेकर आएगी।

लोगों के संदेहों को दूर करने का प्रयास करते हुए भीड़े ने कहा कि इस परियोजना से शहर का वातावरण बेहतर होगा, प्रदूषण घटेगा व संयोजकता एवं विनमयता बढ़ेगी। “हमें वे जानें बचानी हैं जो रेलवे ट्रैक पर जा रही हैं, सब-अर्बन रेल नेटवर्क और सड़कों पर यातायात को बेहतर करना है, समय बचाकर शहर को सतत बनाना है।”, कहते हुए भीड़े ने जनता का समर्थन मांगा।

उन्होंन जनता की शंकाओं के समाधान के लिए एक प्रणाली भी तैयार की जिसमें विरोध करने वाले 80,000 लोगों में से सुनावाई के लिए मात्र 300-400 लोग आए। यह उन एक्टिविस्टों का खोखलापन दर्शाता है। भीड़े का यह संदेश समझना चाहिए- “परियोजना के पर्यावरणीय लाभ इससे होने वाले अस्थाई नुकसान से कई अधिक हैं इसलिए हर नागरिक को इसका समर्थन कर इसे स्वीकारना चाहिए।”