भारती
मेट्रोलाइट- छोटे शहरों की मेट्रो रेल और द्वितीय स्तर के शहरों में मेट्रो नियोजन

प्रसंग- छोटे शहरों के लिए मेट्रोलाइट के लिए सरकार का सुझाव कितना सही।

जयपुर मेट्रो का चरण 1-ए अपने शुरुआती 22 महीनों में लक्ष्य से मात्र 19.17 प्रतिशत यात्रियों को ही आकर्षित कर पाया। अनुमान है कि प्रतिदिन इसके द्वारा 17,000 लोग ही यात्रा करते हैं। लखनऊ मेट्रो ने अच्छी शुरुआत की और लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन के अनुसार प्रतिदिन इसके द्वारा 60,000 लोग यात्रा करते थे लेकिन अंतिम छोर तक संयोजकता न होने के कारण पिछले कुछ महीनों में यात्री संख्या में 40 प्रतिशत की गिरावट हुई है।

कोच्चि मेट्रो का भी कुछ ऐसा ही हाल है। प्रतिदिन 2.75 लाख यात्रियों के लक्ष्य के साथ बनी यह मेट्रो औसत रूप से 40,000-45,000 यात्रियों को ही आकर्षित कर पा रही है। इसी वर्ष शुरू हुई अहमदाबाद मेट्रो ने अपने शुरुआती महीनों में प्रतिदिन 1,000 यात्रियों को आकर्षित किया था लेकिन अभी इसके सवारी आकर्षण का आँकलन करना जल्दी होगी।

जयपुर मेट्रो तो अपना क्रियान्वयन खर्च भी नहीं निकाल पा रही है। हालाँकि इसके बुरे प्रदर्शन का कारण सरकार का खराब नियोजन भी है जिसे 2018 में राजस्थान सरकार पर कैग रिपोर्ट में भी रेखांकित किया गया था। लेकिन हमारा उद्देश्य इसपर चर्चा करना नहीं है। उपरोक्त उदाहरण संकेत कर रहे हैं कि द्वितीय स्तर (टियर-2) के शहरों में मेट्रो प्रभावी नहीं हो रही।

कानपुर, पुणे और नागपुर भी ऐसे ही टियर-2 शहर हैं जहाँ मेट्रो निर्माणाधीन है। इसके अलावा सूरत, विशाखापट्टनम, गुवाहाटी, पटना, इंदौर, भोपाल, वाराणसी और तिरुवनंतपुरम भी कुछ टियर-2 शहर हैं जहाँ मेट्रो विचाराधीन हैं।

किसी भी परियोजना से पहले उसकी संभाव्यता (फीज़िबिलिटी) रिपोर्ट बनती है और उसी से हम लक्षित सवारी संख्या पर पहुँचते हैं। यदि ये मेट्रो परियोजनाएँ अपने लक्ष्य के निकट होतीं तो इन्हें प्रभावी कहा जा सकता था लेकिन लक्ष्य से इतनी बड़ी दूरी दर्शाती है कि मेट्रो सवारी के लिए सहायक इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है।

मेट्रो परियोजनाएँ भारी पूंजी की माँग करती हैं। यदि हम भारत के मेट्रो को ढाँचागत स्तर पर देखें तो यह बहुत प्रभावशाली है। अच्छे स्टेशन और सुचारु मेट्रो डिब्बे, टिकट काउंटर से प्लैटफॉर्म तक सब कुछ भव्य लेकिन कम यात्री संख्या के आगे यह भव्यता फीकी पड़ जाती है। जयपुर मेट्रो तो देश का पहला मेट्रो बना था जिसका मार्ग ट्रिपल एलिवेटेड था यानी सड़क के ऊपर एक पुल और उस पुल के ऊपर पुल पर मेट्रो मार्ग लेकिन यह अभियांत्रिकी कुशलता क्रियान्वयन कुशलता में फलीभूत नहीं हो पाई।

नियोजनकर्ताओं को नए सिरे से सोचना होगा। मेट्रो के लिए सहायक परिवहन प्रणाली भी बनानी होगी। कम सवारी वाले शहरों को कम पूंजी वाली मेट्रो व्यवस्था पर विचार करना होगा। इसके लिए शहरी कार्य मंत्रालय मेट्रोलाइट व्यवस्था के लिए मानक विशेष विवरण के साथ प्रस्तुत हुआ है।

मेट्रोलाइट हल्की शहरी रेल परिवहन प्रणाली है जिसकी क्षमता आम मेट्रो से कम होगी। यह 2,000-15,000 पीक आवर पीक डायरेक्शन ट्रैफिक (पीएचपीडीटी) के अनुसार नियोजित की जाएगी। पीएचपीडीटी का अर्थ है कि सबसे व्यस्त घंटे में सबसे व्यस्त दिशा में जाने वाले यात्रियों की संख्या। सरकार के निर्देशानुसार यह तीन कोच और 300 यात्रियों की क्षमता वाली रेल होगी।

वर्तमान में मेट्रो बनाने में सर्वाधिक खर्च मेट्रो के लिए पुल या सुरंग बनाने में होता है। मेट्रोलाइट की विशेषता यह है कि जहाँ तक संभव हो, इसका निर्माण सड़क के स्तर पर ही होगा जिससे बड़ी लागत को बचाया जा सकेगा। मेट्रोलाइट की गति क्षमता 60 किलोमीटर प्रति घंटे (केएमपीएच) की है लेकिन सड़क के स्तर पर होने के कारण दुर्घटना की संभावना को ध्यान में रखते हुए सरकार ने गति को 25 केएमपीएच तक सीमित किया है।

ज़मीनी स्तर पर मेट्रोलाइट शेल्टर की रूपरेखा

अफ्रीका, एशिया, यूरोप, उत्तर अमरीका व दक्षिण अमरीका के कई शहरों में यह प्रणाली क्रियान्वित है। वहाँ इसकी गति को 30 से 60 केएमपीएच रखा गया है। लॉस एंजलस की ब्लू लाइन की गति 60 केएमपीएच और ग्रीन लाइन की गति 34 केएमपीएच रखी गई है।

सड़क से अलग करने के लिए इसका निर्धारित मार्ग होगा और इसके मार्ग को घेरा भी जाएगा। आवक-जावक दोनों लाइनों के लिए कम से कम 7.6 मीटर की चौड़ाई की आवश्यकता होगी। जहाँ सड़क इस आवश्यकता को पूरा नहीं कर पाएगी, वहाँ एक ही लाइन डाली जाएगी और दूसरी लाइन को किसी समानांतर सड़क पर डाला जा सकता है।

जहाँ संभव न हो, वहाँ भूमि स्तर से 10.2 मीटर ऊपर मेट्रो रेल होगी। इसके लिए आवश्यक स्तंभ (पीयर) को सड़क के मीडियन (सड़क के दो भागों का विभाजक) पर बनाया जाएगा जिससे यह अतिरिक्त जगह न घेरे। मेट्रोलाइट के भूमि से ऊपर वाले मार्ग पर गिट्टी नहीं डाली जाएगी और भूमि मार्ग पर मेट्रोलाइट रेल को ज़मीन से निचले स्तर पर डाला जाएगा।

भूमि स्तर से ऊपर स्थित मेट्रोलाइट शेल्टर की रूपरेखा

इन स्टेशनों में प्रवेश करने पर एक्स-रे बैगेज स्कैनर और डोर फ्रेम मेटल डिटेक्टर नहीं होंगे। साथ ही टिकट जाँचने के लिए स्वचालित द्वार नहीं होंगे बल्कि ट्रेन में या शेल्टर में ही टिकट प्रमाणक लगाए जाएँगे। इस प्रकार इन अतिरिक्त सुविधाओं पर होने वाला खर्च भी बचाया जा सकेगा।

इस प्रणाली में जो चुनौतियाँ हो सकती हैं, उसमें सबसे बड़ी ट्रैफिक प्रबंधन की है। सड़क के बीच में विशिष्ट मार्ग की प्रणाली कई शहरों में बीआरटीएस (बस रैपिड ट्रान्ज़िट सिस्टम) के लिए भी अपनाई गई थी लेकिन ये बसें चौराहों पर जाकर अटक जाती थीं। इसके लिए एकीकृत रोड और रेल सिग्नलिंग प्रणाली लाई जाए जो मेट्रोलाइट को प्राथमिकता दे। निर्देशों में सुझाया गया है कि शुरुआती दौर में अनुशासन सुनिश्चित करने के लिए ट्रैफिक मार्शल को नियुक्त किया जाए।

ट्रैफिक प्रबंधन के अलावा दूसरी चुनौती यात्रियों को लुभाने की होगी। द्वितीय स्तर के शहरों में मेट्रो आंशिक रूप से विफल इसलिए हुई क्योंकि लोगों को परिवहन के दूसरे माध्यम बेहतर लगे। मेट्रोलाइट के साथ भी यह समस्या हो सकती है और इसके दो कारण हैं। पहला यह कि इसका मार्ग सड़क मार्ग के समानांतर ही होगा और दूसरी यह कि इसकी गति 25 केएमपीएच निर्धारित की गई है।

छोटे शहरों में ट्रैफिक के बावजूद भी औसत गति 25 केएमपीएच से ऊपर की ही होती है और वही मार्ग रहने के कारण समय की कोई विशेष बचत नहीं होगी। इस प्रकार समय के दृष्टिकोण से यात्री इसे नहीं चुनेंगे। मूल्य और सहजता के दो आयाम बचते हैं जिससे मेट्रोलाइट यात्रियों को लुभा सकती है।

कम लागत से बनने वाली मेट्रोलाइट का शुल्क भी कम ही होगा जो इसके पक्ष में आता है। इसके अलावा शहर को यह किस प्रकार की संयोजकता प्रदान करेगी, अंतिम छोरों को कैसे जोड़ेगी, अन्य परिवहन माध्यमों से कैसे सामंजस्य स्थापित करेगी, आदि विशेषताओं पर इसकी सफलता निर्भर करेगी। इस प्रकार नगर विशेष नियोजन इसकी प्रभावशीलता निर्धारित करेगा।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।