भारती
नाम में बहुत कुछ रखा है- धर्मांतरितों को एक संदेश

नियाज़ खान नाम के एक अफसर ने कहा है कि वे अपना नाम बदलना चाहते हैं, क्योंकि खान नाम से उन्हें मॉब लिंचिंग का डर है। कोई उन्मादी भीड़ उन्हें कभी भी घेरकर मार सकती है। दाढ़ी-टोपी वाला कोई सुरक्षित नहीं है, जो कि मजहब का पवित्र लिबास है। नियाज ने फिल्म के खान सितारों को भी नाम बदलने की सलाह दी है, क्योंकि उनकी फिल्में भी अब पिटने लगी हैं।

अखबार की सुर्खियों में नियाज़ का परिचय मध्य प्रदेश सरकार के एक अफसर के रूप में छपा है। वे परिवहन विभाग में उप सचिव हैं। मतलब पढ़े-लिखे हैं। मदरसों की छाप वाले कठमुल्ले नहीं हैं। उनके बयान से यह भी जाहिर है कि हमारे यहाँ बोलने की आज़ादी ओवरफ्लो है। किसी भीड़ ने उन्हें नहीं घेरा है तो सहिष्णुता भी शेष है।

अब आते हैं नाम बदलने की बात पर या सीधे कहें तो बदले हुए नाम पर। कहा भले ही जाता है कि नाम में क्या रखा है, लेकिन असल बात यह है कि नाम में बहुत रखा है। अगर वे अपना नाम बदलना चाहते हैं तो उनके संज्ञान में यह होना ही चाहिए कि यह “बदलाव’ नहीं “सुधार’ होगा। नाम तो अतीत की किसी घायल सदी में उनके किसी मजबूर पुरखे ने नामालूम किस जलालत में बदला होगा। अगर अब वे ऐसा करते हैं तो यह एक “भूल सुधार’ ही होगा। अगर वे यह ज]रूरी सुधार करते हैं तो किसी गुमनाम और अब तक मिट्‌टी में मिल चुकी कब्र में सोए उस बेबस पुरखे की रूह को भी सुकून होगा। बिना कब्रस्तान जाए वह तो असली फातिहा पढ़ने जैसा काम पहली बार होगा।

मैं इतिहास का एक गहन जिज्ञासु हूँ। पिछले 25 सालों से भारत के बीते एक हजार साल के भीषण इतिहास की अंधेरी सुरंगों में लगातार भटकता रहा हूँ। दिल्ली में 700 साल की सुलतानों-बादशाहों की हुकूमत के दौरान लिखे गए दस्तावेजों में तलवार के जोर पर लगातार हुए धर्मपरिवर्तन के ब्यौरे भरे पड़े हैं।

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी ने अरबी और फारसी के नींद हराम कर देने वाले इन डरावने दस्तावेजों का तर्जुमा हिंदी में कराया। जिसे अपने नाम काे लेकर कोई शुबहा या डर हो, वह आइने की तरह अपना चेहरा कत्लोगारत और खूनखराबे से भरे इन भीषण ब्यौरों में देख सकता है। यकीनन उसे अपने बदकिस्मत और बेइज्जत पुरखों के दीदार इनमें जरूर हो जाएँगे। हर सदी में हजारों की तादाद वे बेबस माँएँ दिखाई देंगी, जो माले-गनीमत की शक्ल में हरम में भेजी जाती रहीं। जंग में जीत के बाद जुनूनी सुलतानी-बादशाही फौजों के कहर में मुल्क के कोने-कोने में बेहिसाब नाम बदले गए हैं। पीढ़ियों तक सजा के नाम पर एक नई पहचान उनके माथे से चिपकाई जाती रही।

वे अरब, तुर्क और फिर गजनी से आ-आकर सिंध, मुलतान, लाहौर, दिल्ली, बंगाल, गुजरात, कश्मीर, बीजापुर, गोलकुंडा, अहमदनगर समेत अनगिनत छोटी-मोटी रियासतों पर काबिज होते गए। उनकी बेरहम फौजें दरअसल एक “उन्मादी भीड़’ ही थीं, जिनके पास अपने झंडे थे, नारे थे, निशान थे और सबसे ऊपर एक मजहबी जुनून था। वे खुद को सुलतान, बादशह, नवाब और निजाम कहा करते थे, जो लगातार जारी रहने वाली बेहिसाब लूट पर पलते थे। उन्होंने अपने आतंक के राज की कीमत इसी मुल्क से वसूली।

उनके मजहबी इंसाफ में शिकस्त खाने वालों के सामने सजा के यही दो गौरतलब विकल्प थे-मरो या नाम बदलो। जान बचाने के लिए जिन्होंने दूसरी सजा कुबूल फरमाई, वे बदले हुए नामों के साथ नमूदार हुए। इस लिहाज से जो खुद को किसी विचारधारा का अमनपसंद अनुयायी मानने के भुलावे में अब तक हैं, वे दरअसल “अनुयायी’ नहीं बल्कि “पीड़ित’ हैं। फॉलोअर नहीं सजायाफ्ता विक्टिम। याददाश्त पर जमी धूल पौंछने की जरूरत है। असली पहचान आइने की तरह साफ और सामने ही है। फिर एक “सुधार’ तो लाजमी है।

सब कुछ सीधा और एकदम साफ था। इस्लाम कुबूल नहीं करना है तो जिम्मी यानी दूसरे दरजे के बाशिंदों की तरह हमेशा बेइज्जत किए जाओगे। जजिया चुकाना पड़ेगा। घोड़े की सवारी नहीं कर सकते। तिलक-जनेऊ पर बंदिश। मैला ढोना पड़ेगा। बेमौत मरना पड़ेगा और मौत बिल्कुल आसान नहीं होगी।

जिन्हें मजहब के नाम पर थोपी जाने वाली यह जिल्लत कुबूल नहीं थी, वे दीवारों में चुनवाए गए, उनकी खालें खिंचवाकर भूसे से भरी गईं, उन्हें बैलों और गधों की खालों में सिलवाकर फिंकवाया गया, हाथी के पैरों तले रौंदा गया, नुकीली बल्लियों के पिंजरों में ऊपर से फैंका गया, गर्दनें उड़ाई गईं, नाखून उखड़वा दिए गए, जीभें खींची गईं, आँखों में गरम सलाई फिराई गईं। तुगलक के समय तो बहादुरी के इन कारनामों के लिए एक अलग विभाग ही खोल दिया गया था। उसके किले के बाहर रोज ही भूसे से भरी ताजा इंसानी खालें या जानवराें की ताजा खालों में सिले हुए लाश बन चुके लोग टंगे रहते थे।

दिल दहला देने वाले इन दृश्यों का असर यह हाेता था कि बदले हुए नाम तेजी से बदले जाने लगते थे। जान की खैर कौन न मानता? जान बचाकर नाम बदल लेना आसान था और बदले हुए नाम के साथ फिर उन इबादतगाहों में दिन में पांच बार जाने की बंदिश, जो बुतखानों के मलबे पर खड़ी की गईं थीं। पीढ़ियों तक भोगे गए इस बेइंतहा जुल्म और जिल्लत की कल्पना तो कीजिए। क्या “क्वालिटी ऑफ लाइफ’ थी! और पिछले ही दिनों एक मोहतरमा दानिशमंद लीडर के साथ अपने मशहूर इंटरव्यू में कह रही थीं कि हम एक ऐसे मुल्क में रह रहे हैं…! लीडर ने पूछा कि क्या आप यमन, सीरिया या पाकिस्तान में रहना चाहती हैं?

आतंक की इन अंतहीन तरकीबों से बचना चाहते हैं तो “जौहर’ की सेल्फ सर्विस का विकल्प हर कहीं खुला हुआ था, जिनमें हज़ारों की तादाद में औरतों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा। आम लोगों का हाल तो छोड़िए, पिछले 300 सालों के फ्रेम में ही गुरू तेगबहादुर सिंह और संभाजी राजे भोंसले की जिंदगी के आखिरी पन्ने ही पढ़ लीजिए। रूह कंपा देने के लिए इतिहास के ये दो महान किरदार ही काफी हैं।

उस दौर में भारत में ढाए गए जुल्मों की दास्तानें सुलतानों-बादशाहों ने अपनी बहादुरी के कारनामों की शक्ल में लिखवाई ताकि तारीख को पता चले कि गुलाम बनाए गए एक मुल्क में हुकूमत ताकत अौर डर के किस जोर पर मुमकिन है? जो जिद्दी नहीं माने उन्होंने मैला ढोने जैसा घृणित काम भी मंजूर किया और पीढ़ियों तक उसी काम में फंसा दिए गए, जो एक अस्पृश्य जाति के रूप में सामने आए। हिंदी के अमर लेखक अमृतलाल नागर की “नाच्यौ बहुत गोपाल’ उपन्यास की शक्ल में लिखी गई एक कमाल थीसिस है, जो कारण सहित मेहतरों और भंगियों के क्षत्रिय गोत्रों की तह में हारे हुए हिंदू राज्यों के हतभाग्य राजकुलों तक हमें जाती है।

1299 में अलाउद्दीन खिलजी के गुजरात हमले में फतह के बाद राय कर्ण की कई रानियों समेत सबसे खूबसूरत रानी कमला दी और उसकी छह महीने की बेटी देवलदी दिल्ली लाई गईं। कमला दी को खिलजी ने अपने हरम में रखा और देवलदी जब बड़ी हो गई तो अपने बेटे खुसरो खां से उसका निकाह करा दिया। खिलजी के समय एक मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क हदीस की 400 किताबों के साथ मुलतान आया।

यहाँ से उसने खिलजी की शान में एक किताब लिखकर दिल्ली भेजी। वह लिखता है-“मैंने बादशाह के दो-तीन गुण ऐसे सुने हैं, जो मजहब के पक्के हर बादशाह में होने चाहिए। उनमें से एक यह है कि हिंदुओं को लज्जित, पतित, अपमानित और दरिद्र बना दिया गया है। हिंदुओं की औरतें और बच्चे मुसलमानों के दरवाजों पर भीख माँगा करते हैं। ऐ इस्लाम के बादशाह तेरी यह धर्मनिष्ठा तारीफ के काबिल है!’

मोरक्को से तुगलक के जमाने में भारत आए इब्नबतूता ने कम्पिला नामक एक हिंदू राज्य का जिक्र किया है। यह मोहम्मद बिन तुगलक के बाप गयासुद्दीन तुगलक के समय का कारनामा है। सुलतान की फौज ने कम्पिला के राजा को जंग में निपटा दिया। राय के राजपरिवार की महिलाओं समेत नगर के कई अमीर, वजीर और आम लोगों ने भी एक विशाल अग्निकुंड में जलकर अपनी जान दे दी। फौज के शहर में दाखिल होते ही लोगों के पकड़वाने का सिलसिला शुरू हुआ। राजा के 11 बेटे भी इनमें शामिल थे। सबको सजा के वही दो विकल्प दिए गए। मरो या मानो। इन्होंने अपने नाम बदल लिए। इब्नबतूता खुद इनमें से तीन से मिला था। इनके बदले हुए नाम उसने नासिर, बख्तियार और मुहरवार बताए हैं। इनका उपनाम अबू मुस्लिम रखा गया। इन तीनों से इब्नबतूता की दोस्ती हो गई थी।

यह तो दिल्ली पर कब्जे के सिर्फ 100 साल बाद के ही नज़ारे हैं। ऐसे दृश्य औरंगज़ेब तक और दूरदराज़ में काबिज निजामोंं-नवाबों की अनगिनत रियासतों तक हज़ारों की संख्या में हर सदी में हर कहीं फैले हुए हैं। औरंगज़ेब ने शिवाजी के हाथों आगरा में सीधे मुँह की खाने के बाद शिवाजी के एक बहादुर कमांडर नेतोजी पालकर को धोखे से दक्षिण में बंदी बनाया और उस वक्त की “जेड-प्लस’ सुरक्षा में उन्हें दिल्ली लाया गया।

शिवाजी को नीचा दिखाने के लिए इस बदनाम बादशाह ने नेतोजी के सामने वही दो विकल्प पेश किए- इस्लाम कुबूल करो या मरो। नेतोजी ने “मजहब के नाम पर इस मजहबी सज़ा’ से निकल भागने की उम्मीद में खून के घूंट की तरह कलमा पढ़ा। उनका बदला हुआ नाम इतिहास में दर्ज है-मोहम्मद कुली खान।

27 मार्च 1667 का दिन था वह। बहुसंख्यक काफिरों के लिए असीमित असहिष्णुता की उस सदी में महाराष्ट्र से नेतोजी पालकर के पूरे परिवार को उठवाकर दिल्ली लाया गया। उनके पत्नी बच्चों को भी यही इस्लाम कुबूल करने की सजा दी गई। चूँकि नेतोजी पालकर अब मोहम्मद साहब के नाम सहित कुली खान हो चुके थे तो उनकी पत्नी से उनका एक बार फिर इस्लामी पद्धति से निकाह का तमाशा रचा गया। इतना कुछ कर चुकने के बाद औरंगज़ेब ने नेतोजी पालकर को काबुल-खैबर की लड़ाई में झौंक दिया। कम्बख्त काफिर, मरो अपनी बला से जीयो अपनी किस्मत से!

नेतोजी पालकर शिवाजी के बहुत पुराने भरोसमंद साथी थे। बदले हुए नाम का कलंक वे औरंगज़ेब की सरदारी में नौ साल तक ढोते रहे और एक बार मौका आने पर किसी घात लगाए सिंह की तरह छलांग मारकर छत्रपति के पास महाराष्ट्र लौट आए और अपने जीते-जी बदले हुए नाम का भूल सुधार करते हुए मोहम्मद कुली खान से नेतोजी पालकर हो गए। उन्हाेंने नाम बदलने का ज़रूरी काम अपनी आने वाली किसी पीढ़ी के अगले खान के भरोसे छोड़कर नहीं रखा। ऐसे भी बेशुमार नमूने हैं जब मौका लगते ही बदले हुए नाम फिर से उसी पीढ़ी में सुधरे भी।

अल्लामा इकबाल के पुरखे सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राह्मण थे और इकबाल इस पर फख्र करते थे। लेकिन यह बदले हुए नाम में अटका हुआ एक फख्र था, जो सुधार की सीढ़ी तक नहीं आ सका। भारत में कई नए धर्म आए, लेकिन किसी की प्रसार-प्रक्रिया में यह कहावत किसी ने कभी नहीं सुनी कि किसी को कभी मार-मारकर बौद्ध, जैन या सिख बनाया गया। लेकिन मार-मारकर मुसलमान बनाने की एक कहावत हिंदुस्तान के गाँव-गाँव में इस तरह फैली है कि किसी भी किस्म की जोर-जबर्दस्ती किए जाने पर एक बेपढ़ा आदमी भी कह देता है-क्यों मार-मारकर मुसलमान बना रहे हो, छोड़ो भी!

इतिहास की इन कंदराओं में भटकते हुए कभी-कभी सोचता हूं कि जो औरतें-बच्चियाँ जीती हुई जंग के बाद लूट के माल में उठाई गईं और फौेजियों में गनीमत का माल समझकर बांटी गईं, उनकी औलादें आज किस शक्ल में कहाँ और कैसी होंगी? तब आज के जिन्ना, जिलानी, जरदारी, गिलानी, आजाद, अब्दुल्ला, आजम, औवेसी, भट्‌ट, भुट्टो, इरफान, इकबाल, इमाम, खान, सलमान, सुलेमान, हबीब, हाफिज सब के सब आँखों के सामने तेजी से घूमने लगते हैं।

उन बदले हुए नामों की औलादें, फिर उनकी औलादें और फिर उनकी भी औलादें कहीं तो रही-बसी होंगी। आज उनकी पहचानें किस रूप में की जाएँ? कमलादी और देवलदी की कहानी उनके साथ ही थोड़े ही खत्म हो गई। नासिर, बख्तियार, मुहरवार बेऔलाद थोड़े ही कब्रों में जा सोए होंगे। ये तो हजारों पन्नों के उस नृशंस अतीत के चंद ब्यौरे हैं। और सन् 47 में पैदा हुए पाकिस्तान के सिंध की वह आबादी कहां हजम हो रही है, जो अब दो फीसदी से कम बची है?

अगर आज कोई कहीं अपना नाम बदलता है तो इस मामूली से भूल सुधार से नामालूम कहाँ-कौन सी रूह जाने कितने वक्त बाद सुकून के अहसास में होगी। नामालूम किस जलालत में किस पुरखे ने, औरत ने या आदमी ने अपना नाम बदला होगा और उसी जलालत में वह नामालूम कहां की कब्र में दफना दिया गया होगा। कौन कहता है कि नाम में क्या रखा है? मियां जरा आइने में ठीक से अपना चेहरा देखो। थोड़ा याददाश्त पर जमी चंद सदियों की धूल को साफ करने की कोशिश करो। याद रखो, नाम में बहुत कुछ रखा है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com