भारती
मैन्युअल स्कैवेंजिंग से भारत को मुक्त करने का देर से शुरू हुआ कार्य थमना नहीं चाहिए

प्रसंग- मैन्युअल स्कैवेंजिंग की आज देश में क्या स्थिति है और क्या किया जा रहा है।

क्या आपको प्राणों के मूल्य के रूप में 300 रुपये स्वीकार हैं? आप इसे कतई नहीं स्वीकारेंगे लेकिन फिर भी इस राशि के लिए आज भी हज़ारों सफाई कर्मचारी सीवर नालों में उतरकर सफाई करते हैं। 1993 में अवैधानिक घोषित किए जाने के बावजूद भारत में आज भी हाथों से मैला ढोया जाता है यानी कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग प्रचलित है जिसका मुख्य कारण है विकल्प का अभाव।

मार्च 2019 में एक आरटीआई पर प्रतिक्रिया के अनुसार दिल्ली-एनसीआर और 12 राज्य सरकारों द्वारा 1993 से 2019 तक सीवर की सफाई के दौरान 405 मौतें रिपोर्ट की गई थीं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग ने बताया है कि 2019 के शुरुआती छह महीनों में सीवर लाइनों को साफ करने के दौरान कम से कम 50 कर्मचारियों की मृत्यु हुई है।

हृदय उद्वेलित करने वाले ये आँकड़े आपको सोचने पर विवश करेंगे कि ऐसे कौन-से विकल्पों का अभाव है जो इन्हें जान की बाज़ी लगाने दे रहा है। इस विकल्प के दो पहलू हैं- कर्मचारी की आवश्यकता होती है रोजगार और नियोक्ता की आवश्यकता होती है कार्य पूरा करने का साधन। नालों की सफाई के लिए नियुक्त कर्मचारी यदि हाथ से मैला नहीं उठाएँगे तो कैसे कमाएँगे और यदि कर्मचारी ये काम नहीं करेंगे तो नगर निगम ये कार्य किससे करवाएगा।

रोजगार की समस्या के लिए केंद्र सरकार ने 2013 में एक अधिनियम जारी किया था जो मैला ढोने वाले कर्मचारियों के पुनर्वासन पर केंद्रित है और साथ ही उनसे ये काम करवाने वाले को दंडित करने का प्रावधान देता है। इस अधिनियम में सफाई कर्मचारी को कोई और काम देने, उसके बच्चों को छात्रवृत्ति, उसे रहने का मकान या मकान निर्माण के लिए वित्तीय सहायता, उसे या उसके किसी परिवार को कौशल प्रशिक्षण, अपना व्यापार शुरू करने के लिए रियायती दर पर ऋण देने जैसे प्रावधान तय किए गए हैं।

बाएँ- गिरिराज सिंह व दाएँ- किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी

2019 में अहमदाबाद पश्चिम से भाजपा सांसद किरीट प्रेमजीभाई सोलंकी इस अधिनियम में संशोधन का प्रस्ताव लेकर आए जिसमें मुख्य संशोधन- सूखे शौचालयों को स्वच्छ शौचालय में परिवर्तित करने का दायित्व राज्य सरकार का हो और अन्य सहायताओं के साथ मैला उठाने वाले कर्मचारी को कम से कम 1 लाख रुपये का मुआवजा भी मिले- सुझाए गए थे। लेकिन जो सबसे बड़ा सुझाव था, वह जन अधिकारियों को इसके लिए जवाबदेह बनाने का था।

15 अगस्त 2022 तक मैन्युअल स्कैवेंजिंग से भारत को पूर्णतः मुक्त करने के लक्ष्य के साथ सोमवार (19 अगस्त) को शहरी कार्य और सामाजिक न्याय मंत्रालय ने अपने साझे प्रयास के तहत राष्ट्रीय एक्शन प्लान के प्रारूप की कुछ जानकारियाँ साझा कीं जो आशा की किरणों के समान हैं। जल शक्ति और ग्रामीण विकास मंत्रालय भी इसमें सहयोग करेंगें।

यह प्रारूप भी 2013 के अधिनियम में संशोधन की बात करता है और रिपोर्ट के अनुसार जिला मजिस्ट्रेट, नगर निगम के आयुक्त या क्षेत्र के स्वच्छता इंस्पेक्टर को सीवर मौतों के लिए ज़िम्मेदार ठहराने का प्रावधान लाया जा सकता है। जिन स्थानों पर स्वच्छता इंस्पेक्टर नियुक्त नहीं होंगे, वहाँ पुलिस को जिला मजिस्ट्रेट या नगर निगम आयुक्त पर सीधे एफआईआर दर्ज करने का अधिकार दिया जाएगा। निजी स्तर पर नियुक्त सफाई कर्मचारी की मौत की ज़िम्मेदारी भी जन अधिकारियों की ही होगी।

यह एक पहलू का समाधान हुआ। दूसरा पहलू है सीवर सफाई के लिए तकनीकी विकल्प का। कर्मचारियों से मैला उठाने का काम करवाना मात्र अवैधानिक ही नहीं बल्कि अमानवीय भी है। उन्हें इस त्रासदी से बचाने के लिए आवश्यकता है स्वचालित उपकरणों की। दुर्भाग्यवश इस विकल्प को विकसित करने के लिए इतने वर्षों में केंद्र सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की गई। जो भी तकनीक विकसित की गई या मशीनों को क्रियान्वित किया गया, वह सब स्थानीय स्तर पर ही हुआ।

मैनहोल नहीं, रॉबहोल हो

नालों और सेप्टिक टैंको के विभिन्न आकारों के कारण एक ही प्रणाली विकसित नहीं की जा सकती जो इस कार्य को और चुनौतीपूर्ण बनाता है। फरवरी 2018 में केरल के तिरुवनंतपुरम में भारत के पहले मैनहोल (नाले का खुला मुँह जिसमें मनुष्य प्रवेश करके सफाई करता है) साफ करने वाले रोबोट, बंदीकूट का सफल परीक्षण किया गया। यह रोबोट लगभग 50 किलो वज़नी और चार बाजुओं वाला है जो सीवर में जमे कचरे को निकालकर बालटी में डालता है।

सीवर को साफ करने के लिए यह पानी के जेट से भी लैस है और इसमें कैमरा लगा हुआ है जिससे संचालित करने वाला व्यक्ति नाले के अंदर की स्थिति को देखकर बंदीकूट को निर्देशित कर सकता है। कहा जाता है कि पहले जिस काम को करने में तीन-चार घंटे लगते थे, उसे अब इसकी सहायता से मात्र पौन घंटे में पूरा किया जा सकता है।

बंदीकूट रोबोट

बंदीकूट को विकसित करने में केरल राज्य सरकार ने वित्तीय सहायता प्रदान की थी और बाद में इसे अन्य नगरों में भी क्रियान्वित किया गया। इसके बाद गुजरात, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कई नगर निगमों ने इसे अपनाया। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में इस तकनीक का उल्लेख किया था जिसके बाद कर्नाटक, महाराष्ट्र और दिल्ली ने भी इसे अपनाने में रुचि दिखाई है।

ऐसी ही एक पहल हैदराबाद ने भी की है जहाँ मैन्युअल स्कैवेंजिंग से पूर्णतः मुक्त होने के लिए 136 सीवर जेटिंग मशीनें लाई गई हैं जो सीवर साफ करती हैं। देश भर में और भी कई शहर होंगे जो इस दिशा में एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं लेकिन फिर भी यह प्रयास स्थानीय स्तर तक ही सीमित हैं व स्थानीय प्राधिकरणों की इच्छा-शक्ति इनकी सफलता निर्धारित करती है।

लगभग 30 लाख के मूल्य वाला बंदीकूट और इसी प्रकार कुछ और उपकरण जिनका मूल्य लाखों में है, को देश का हर नगर निगम नहीं खरीद सकता। वह आज भी मैन्युअल स्कैवेंजिंग का ही सहारा लेता है। इस समस्या के लिए भी एक्शन प्लान का प्रारूप समाधान बन सकता है जो नगर निगमों के मशीनें खरीदने के लिए ऋण देने की बात करता है।

राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम 4 प्रतिशत ब्याज पर 15 वर्ष के लिए नगर निगमों को मशीनें खरीदने के लिए 20 से 40 लाख रुपये का ऋण देगा। साथ ही यह एक्शन प्लान 2022 तक प्रमुख शहरों (जिनकी जनसंख्या 1 लाख से अधिक है) में स्वच्छता आपातकाल प्रतिक्रिया इकाई (एरसू) स्थापित करने की बात करता है जो सीवर ब्लॉक जैसी आपातकाल समस्याओं के लिए अनेक उपक्रमों से लैस होंगे।

प्रमुख शहरों के साथ-साथ ये उनके आसपास के 75 किलोमीटर के दायरे में आने वाले क्षेत्रों की समस्याओं का भी समाधान करेंगे। इन इकाइयों में प्रशिक्षित कर्मचारी नियुक्त किए जाएँगे जो आवश्यक सुरक्षा साधनों और मशीनों के माध्यम से सीवर की सफाई किया करेंगे। अग्नि शमन सुविधा की तरह ये इकाइयाँ भी सूचना मिलने पर सफाई का कार्य करेंगी।

दीर्घ प्रतीक्षा के बाद केंद्रीय स्तर पर मैन्युअल स्कैवेंजिंग को रोकने के लिए कार्रवाई शुरू की गई है। कई मंत्रालय साथ आ रहे हैं, नगर निगमों को वित्तीय सहायता मिलेगी, तकनीक विकसित होने के साथ एक प्रणाली भी स्थापित की जा रही है, ये सभी एक सकारात्मक संदेश देते हैं।

आशा है जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान से भारत खुले में शौच से मुक्त हो रहा है, उसी प्रकार 2022 के इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भी युद्ध स्तर पर काम किया जाएगा क्योंकि हर सफाई कर्मचारी के प्राण और प्रतिष्ठा उतने ही मूल्यवान हैं जितने सीमा पर तैनात सैनिक के।