भारती
दक्षिणी बंगाल के तृणमूल गढ़ को भेद रहा ममता बनर्जी सरकार का आपदा कुप्रबंधन

आशुचित्र- अगले वर्ष के विधान सभा चुनावों में दक्षिणी बंगाल के गढ़ को बचाना ममता बनर्जी के लिए चुनौती।

कोलकाता समेत बंगाल का दक्षिणी भाग तृणमूल का अभेद्य गढ़ माना जाता है जो पिछले वर्ष के लोकसभा चुनावों में भगवा लहर से भी नहीं डिगा जबकि राज्य के अन्य भागों में इस लहर का प्रभाव देखने को मिला था।

दक्षिणी बंगाल की 19 लोकसभा सीटों (बंगाल में कुल 42 लोकसभा सीटें हैं) में से तृणमूल ने 16 पर सरल विजय प्राप्त की। 2014 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल दक्षिणी बंगाल को पूर्ण रूप से जीती थी।

लेकिन अब दो प्राकृतिक आपदाओं- कोरनावायरस महामारी और अम्फान चक्रवात- से निपटने में बुरा प्रबंधन इस क्षेत्र में तृणमूल के समर्थन को ध्वस्त करेगा। बंगाल की सत्ताधारी पार्टी लोकप्रिय समर्थन में भारी गिरावट का पात्र बन रही है और एक वर्षों में होने वाले विधान सभा चुनावों तक हो सकता है वह इसकी क्षतिपूर्ति न कर पाए।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हर बात से स्वयं निपटने की प्रवृत्ति महामारी के बुरे प्रबंधन का कारण बनी। कोविड-19 मामलों की संख्या व मौतें छुपाना, रात के अंधेरे में शवों का निपटान, स्वास्थ्य सेवा इंफ्रास्ट्रक्चर एवं कोविड स्वास्थ्य सुविधाओं की बुरी अवस्था, उपकरणों की कमी, लॉकडाउन को पूर्ण रूप से लागू करने में जान-बुझकर दी गई ढील (विशेषकर मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में) और ऐसे ही कई अन्य कृत्य हैं जिसने तृणमूल प्रमुख में प्रशासनिक कौशल का अभाव व असंतुलित व्यवहार को उजागर किया है।

“मुख्यमंत्री ने लोकप्रिय बने रहने के लिए पुलिस को लॉकडाउन लागू करने में सख्ती न करने को कहा, बाज़ार खुले रखे गए जिसके कारण वायरस का अनियंत्रित प्रसार हुआ। अधिकांश लोग मानते हैं कि राज्य सरकार ने महामारी के प्रसार के वास्तविक चित्र को छुपाया है व कमतर दर्शाया है।”, राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक व राजनीतिक टिप्पणीकार सुकांत देबरॉय ने बताया।

“मुस्लिम तुष्टीकरण के आरोप सरकार पर इसलिए लगे क्योंकि इसने दिल्ली निज़ामुद्दीन के मरकज़ से लौटे तबलीगी जमातियों की जानकारी को छुपाया और राज्य के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में लॉकडाउन को जान-बूझकर लागू नहीं किया। विरोध करने वालों और सत्य उजागर करने का प्रयास करने वालों पर राज्य की कार्रवाई दर्शाती है कि सरकार के पास छुपाने के लिए बहुत कुछ है तथा यह असहनशील है।”, उन्होंने कहा।

दक्षिणी बंगाल के कई भागों में हिंदू-मुस्लिम विवाद और इन विवादों व दंगों से राज्य तंत्र का कथित पक्षपाती व्यवहार, सत्ताधारी पार्टी के विरुद्ध रोष का कारण बना है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से वितरित होने वाली आवश्यक वस्तुओं और अनाज पर तृणमूल कार्यकारियों की वसूली के आरोपों ने इसकी छवि को नुकसान पहुँचाया है।

पीडीएस तंत्र से वितरित होने वाली आवश्यक वस्तुओं के वितरण में कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के कारण कई क्षेत्रों में ‘राशन दंगे’ हुए। यह जन आक्रोश तृणमूल कार्यकारियों के विरुद्ध था। अपने लाखों नागरिकों को अन्य राज्यों से लाने में भी यह सरकार विफल रही।

केंद्र सरकार से मुख्यमंत्री बनर्जी की निरंतर तकरारों और नई दिल्ली के हर प्रस्ताव पर उनकी अस्वीकृति ने उन्हें तुनकमिजाज़ी, तर्कहीन और संकट के समय में जब सहयोग और प्रशासनिक प्रयासों की आवश्यकता है, तब भी लड़ने को तत्पर रहने वाली के रूप में प्रस्तुत किया है।

अम्फान चक्रवात की चपेट में दक्षिणी बंगाल का 21,560 स्क्वायर किलोमीटर का क्षेत्रफल आया। आवश्यकता थी तूफान से हुए नुकसान की त्वरित भरपाई की और लाखों प्रभावित लोगों की सहायता करने की लेकिन यहाँ भी वे विफल हुईं।

अम्फान चक्रवात (20 मई) के सप्ताह भर बाद भी कोलकाता के कई क्षेत्रों में बिजली और पानी की व्यवस्था दुरुस्त नहीं हो पाई है। अधिकांश कोलकाता में तीन दिनों में ही व्यवस्था दुरुस्त हो पाई और वह भी सेना व केंद्रीय संस्थाओं की सहायता से। उत्तर व दक्षिणी 24 परगना, हावड़ा और हुगली सर्वाधिक प्रभावित जिले थे तथा वहाँ व्यवस्था और खराब है।

सुंदरबन का अधिकांश भाग जहाँ खेतों व ग्रामों की रक्षा तटबंध करते हैं, वे टूट गए हैं और समुद्र के खारे पानी ने खेती योग्य भूमि को व्यर्थ बना दिया है। आपदा के सप्ताह भर बाद भी वहाँ राहत नहीं पहुँची है। दोनों 24 परगनाओं के कई क्षेत्रों में अब तक बिजली और पानी नहीं है।

लेकिन कोलकाता जहाँ अब तक ममता बनर्जी की अच्छी पकड़ थी, वहाँ रोष शिखर पर है। पिछले शुक्रवार को शहर के कई क्षेत्रों में आक्रोशित विरोध और हिंसक प्रदर्शन भी हुए जो शनिवार और रविवार को कोलकाता नगर निगम (केएमसी) एवं राज्य संस्थाओं के मरम्मत कार्य की धीमी गति से और तीव्र हो गए।

तूफान के कारण गिरे हुए पेड़ों को हटाने में भी केएमसी को तीन दिन से अधिक का समय लगा और अंततः इस काम के लिए भी सेना की सहायता लेनी पड़ी। केएमसी की तैयारी में कमी, कार्य की धीमि गति और उपकरणों एवं कार्यबल के अभाव ने कोलकाता वासियों को रुष्ट किया है।

अंततः मुख्यमंत्री को हस्तक्षेप करके लोगों को शांत करने के लिए आना पड़ा लेकिन उनके आश्वसनों पर कम ही लोगों को विश्वास हुआ। केएमसी और राज्य संस्थाओं की तैयारी की कमी व मंद प्रतिक्रिया पर ममता बनर्जी का “चाहते हो तो मेरा सिर काट दो” कथन उन्हें सहानुभूति दिलाने में सफल नहीं हो पाया। इसके विपरीत उनका कथन आलोचना और उपहास का पात्र बन गया।

कोलकाता के घरों में बिजली न पहुँचाने का दोष निजी बिजली सुविधा (कलकत्ता बिजली आपूर्ति निगम) पर मढ़ना विफल हुआ औरउन्हें निंदा व तिरस्कार का भागीदार बना दिया।

उनके दो समर्थन आधार- दक्षिणी बंगाल के मुस्लिम और बंगाली भद्रलोक- आजकल उनके विरुद्ध हो गए हैं। राज्य स्वास्थ्य सेवा इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों और महामारी नियंत्रण में असमर्थ प्रबंधन ने मुस्लिमों को क्रोधित किया है क्योंकि वायरस से बड़ी संख्या में मुस्लिम संक्रमित हो रहे हैं। महामारी और चक्रवात के बुरे प्रबंधन के कारण भद्रलोक ने भी तृणमूल को पीठ दिखा दिया है।

“ममता बमर्जी का सच सामने आ गया है। लोगों को समझ आ गया है कि वे योग्य नहीं हैं, तुनकमिजाज़ी, असहिष्णु और तानाशाह हैं व उनमें विश्वसनीय शासन कौशल का अभाव है। तृणमूल के कार्यकारियों का भ्रष्टाचार उजागर हो गया है जो संकट के समय निर्धनों के लिए निर्धारित राशन की वसूली करने से भी बाज़ नहीं आ रहे हैं।”, भारतीय जनता पार्टी के राज्य अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा।

अगर तृणमूल के विरुद्ध रोष बढ़ता रहा तो अगले साल दक्षिणी बंगाल का अपना गढ़ बचाना बनर्जी के लिए सरल नहीं होगा।

जयदीप मज़ूमदार स्वराज्य में सहायक संपादक हैं। वे @joyincal09के माध्यम से ट्वीट करते हैं।