भारती
शिव-पार्वती की स्मृतियाँ कालिदास के ‘कुमार संभव’ के माध्यम से- महाशिवरात्रि विशेष

महाकवि कालिदास की अमर कृतियों में से एक है- कुमार संभव जिसका केंद्रीय पात्र हैं भगवान शिव। संस्कृत का यह प्रसिद्ध महाकाव्य श्रृंगार रस की अद्वितीय रचना है। यह गौरवशाली कृति प्राचीन भारत की समृद्ध अभिरुचियों और तत्कालीन समाज की रचनाधर्मिता का प्रमाण प्रस्तुत करती है।

कुमार संभव शिव और पार्वती के मिलन की मंत्रमुग्ध कर देने वाली कृति है। कथा हिमालय से आरंभ होती है। आइए देखते हैं भारत के इतिहास की महानतम प्रतिभाओं में से एक महाकवि कालिदास के शब्द कौशल में शिव-पार्वती की कथा कैसी जगमगा रही है-

दक्ष की कन्या और महादेव की पूर्व पत्नी सती, जिसने पिता से अपमानित होने पर योगबल से प्राण त्याग दिए थे, फिर जन्म लेने के लिए पर्वतराज हिमालय की पत्नी मेना के गर्भ में प्रविष्ट हुई। जैसे उज्ज्वल शिखा से दीप, गंगा से स्वर्ग मार्ग और विशुद्ध वाणी से विद्वान शोभित एवं पवित्र होता है, उसी प्रकार हिमालय उस कन्या से सुशोभित हुआ।

स्नेही बंधु उसे पार्वती नाम से पुकारते थे। बाद में माता द्वारा तप का निषेध किए जाने से उमा नाम पड़ गया। एक बार स्वेच्छा विहारी नारद ने उस कन्या को पिता हिमालय के पास देखा और वे बोले कि किसी दिन यह अपने प्रेम के द्वारा शिव की एकमात्र अर्द्धांगिनी बनेगी। देवताओं ने निश्चय किया कि पर्वतराज की पुत्री गौरी का विवाह महादेव से कराया जाए क्योंकि संपूर्ण त्रिलोक में कोई नारी शिव की पत्नी बनने में समर्थ नहीं है।

जब तक महादेव स्वयं न माँगें तब तक हिमालय के लिए उन्हें अपनी कन्या का दान करना संभव नहीं था। स्वाभिमानी व्यक्ति प्रार्थना अस्वीकृत हो जाने के भय से अभीष्ट बात में भी उदासीन होकर चुप बैठे रहे।

जब पिछले जन्म में दक्ष के ऊपर क्रुद्ध होकर उस सुदर्शना सती ने देह त्याग दी थी, तब से पशुपति आसक्ति विहीन होकर अपत्नीक रह गए थे। वह आत्मवशी महादेव तपस्या के लिए हिमालय के कस्तूरी की गंध से सुवासित एक शिखर पर चले गए। तपस्या के फल के स्वयं दाता होते हुए भी न जाने किस कामना से तप करने लगे।

पर्वतराज हिमालय ने अपनी पुनीत कन्या को आदेश दिया कि वह अपनी जया और विजया नाम की सखियों के संग शिव की आराधना करे। यद्यपि यह समाधि के विध्नस्वरूप थी, फिर भी शिव ने उसे सेवा की अनुमति दे दी। विकार का कारण उपस्थित होने पर भी जिनके मन में विकार नहीं आता, वस्तुत: वे ही धीर होते हैं।

अगले दृश्य में ब्रह्मा के पास याचना लेकर आए देवता हैं। वे तारकासुर नाम के असुर के कारण संकट में हैं, जो ब्रह्मा के वरदान से देवताओं के संकट का कारण बन गया है। ब्रह्मा के समक्ष प्रस्तुत देवताओं की एक लंबी याचना में कालिदास की प्रतिभा देखिए-

कहीं फूल चुराने का अपराध सिर पर न लग जाए इस भय से वायु उसके उद्यानों में तो चलती ही नहीं। ऋतुओं ने अपना आगे-पीछे आने का क्रम छोड़ दिया है। भय के कारण सूर्य उसके नगर में अपनी केवल उतनी ही किरणें भेजता है, जिससे उसके सरोवर में लगे कमल खिल जाएँ।

दयनीय देवताओं को ब्रह्मा का उत्तर है- इस दैत्य को मुझसे ही ऐश्वर्य प्राप्त हुआ है। इसलिए इसका विनाश मेरे हाथों उचित नहीं है। अपने हाथ से बोए विष-वृक्ष को काटना ठीक नहीं। इस युद्ध विद्या विशारद तारकासुर का सम्मुख समर में सामना केवल महादेव के वीर्य से उत्पन्न पुत्र ही कर सकता है और कोई नहीं। आप लोग महादेव के संयत चित्त को हिमालय की कन्या उमा के सौंदर्य द्वारा उसकी ओर आकृष्ट करने का यत्न कीजिए, जिस प्रकार चुंबक से लोहे को आकृष्ट किया जाता है।

अब कथा में कामदेव आते हैं। देवताओं की ओर से उन्हें कुछ ऐसा करना है कि जितेंद्रिय महादेव हिमालय की कन्या पार्वती पर मोहित हो जाएँ। देवता कहते हैं- “तुम धन्य हो कि देवताओं की विजय के उपाय में केवल तुम्हारे बाण ही सफल हो सकते हैं। मनुष्यों का यश ऐसे ही काम करने से होता है जिन्हें और कोई न कर सके, भले ही वे काम बड़े हों या छोटे।

पार्वती और शिव जब पहली बार आमने-सामने होते हैं तब कालिदास अलंकारपूर्ण अभिव्यक्ति की अपार क्षमता का प्रदर्शन करते हैं– “इधर पार्वती अपने भावी पति महादेव के तपोवन के द्वार पर पहुँची और महादेव ने अपने अंदर परमात्मा नामक लोकोत्तर ज्योति का दर्शन करके अपनी गंभीर समाधि समाप्त की। धीमे से प्राणायाम को तोड़कर पर्यंकबंध आसन छोड़ा।

नंदी ने आकर निवेदन किया कि शैलसुता पार्वती सेवा के लिए उपस्थित हुई हैं। भौंह के संकेत मात्र से अनुमति पाकर बाहर से वह उन्हें लिवा लाया। विनयपूर्वक प्रणाम करने के बाद पार्वती की सखियों ने अपने हाथ से चुने हुए वसंत के फूल और नवपल्लव के टुकड़े महादेव के चरणाें में बिखेर दिए। उमा ने झुककर प्रणाम किया। तुम्हें अनन्य प्रेमी पति प्राप्त हो…महादेव ने ठीक ही आशीर्वाद दिया। महात्माओं की वाणी कभी मिथ्या थोड़े ही हो सकती है।

घात लगाए कामदेव भी वहीं कहीं है। महादेव की उस पर दृष्टि जाती है। तपोभंग के कारण वे प्रचंड क्रोध में आ जाते हैं। उनके तमतमाते मुख को देखना तक असंभव है। तीसरे नेत्र से एकाएक प्रचंड लपट मारती अग्नि ने कामदेव काे जलाकर राख कर दिया। अब कामदेव की पत्नी रति का घोर प्रलाप है। मित्र वसंत भी वहीं है। रति के रुदन को कालिदास के शब्द हैं

हे कामदेव, अब तो दर्शन दो, क्योंकि यह वसंत तुम्हारे दर्शन के लिए उत्सुक खड़ा है। पुरुषों का प्रेम स्त्रियों के लिए भले ही सुदृढ़ न हो, किंतु मित्रों के साथ तो अचल ही होता है।

सब कुछ अचानक हुआ। पार्वती की आशाएँ टूट गईं। अब वह तप का निर्णय लेती हैं। कठोर तप। कालिदास कहते हैं- उस व्रतधारिणी पार्वती ने अपनी विलास चेष्टाएँ कोमल लताओं के पास और चंचल चितवन हरिणियों के पास धरोहर-सी रख दी थीं, जहाँ से समय आने पर फिर वापस लिया जा सके।

वह उमा स्नान करके, हवन कर चुकने के पश्चात वल्कल वस्त्र की ओढ़नी पहनकर अध्ययन करने बैठ जाती थी। उसके दर्शन के लिए ऋषि लोग आने-जाने लगे। तपस्वियों का गौरव आयु से नहीं तप से नापा जाता है। पेड़ों से स्वयं गिरे हुए पत्तों को खाकर जीवन निर्वाह करना तप की सीमा समझी जाती है।

परंतु पार्वती ने स्वयं गिरे हुए पेड़ों के पत्तों को भी खाना छोड़ दिया। इसीलिए बाद में मधुरभाषिणी पार्वती का नाम अपर्णा पड़ गया। इस प्रकार अनेक व्रतों द्वारा कमलिनी के समान कोमल शरीर दिन-रात सुखा-सुखाकर पार्वती ने कठोर शरीर वाले तपस्वियों के तप को भी नीचा दिखा दिया।

अब उस तपोवन में एक जटाधारी तरुण तपस्वी आता है। वह मृगछाला लपेटे है। हाथ में दंड है। शरीर ब्रह्मचर्य के तेज से दमक रहा है। उसकी बातें निस्संकोच हैं। अतिथि सत्कार में कुशल पार्वती ने उसका आगे बढ़कर स्वागत किया। पार्वती के तप से वह चकित भाव से पूछना शुरू करता है-

आपका यह नया उठता हुआ यौवन अनुपम है। अब यह तो बताइए कि आप इससे अधिक और किस फल की कामना से तप कर रही हैं… यदि तुम्हें स्वर्ग जाने की इच्छा है तो यह तपस्या का श्रम तुम व्यर्थ ही कर रही हो, क्योंकि तुम्हारे पिता का देश ही देवताओं का निवास स्वर्ग है और यदि तुम यह तपस्या पति पाने की कामना से कर रही हो तो भी यह व्यर्थ है, क्योंकि रत्न किसी ग्राहक को नहीं ढूंढता फिरता, बल्कि रत्न को स्वयं ही ढूंढा जाता है।

हे पार्वती, तुम और कब तक इस प्रकार तपस्या का कष्ट सहती रहोगी? मेरा भी बहुत सारा संचित किया हुआ तप विद्यमान है। उसका आधा भाग तुम ले लो ओर उसके द्वारा अभीष्ट वर को प्राप्त करो। परंतु मैं यह अवश्य जानना चाहता हूँ कि आखिर वह है कौन?

पार्वती अपने मनोरथ को कैसे कहतीं? उन्होंने अपनी सखी को संकेत किया। उससे उस तरुण तपस्वी को ज्ञात होता है कि पार्वती के हृदय में कौन है? किसके लिए उसने तप में स्वयं को कृशकाय कर लिया है। वह सखी विस्तार से शिव के प्रति पार्वती की आसक्ति का वर्णन करती है। तब वह ब्रह्मचारी कटाक्ष करने लगता है

आप भी किस निकम्मे से प्रेम करने चलीं। सोचिए तो कि विवाह के समय मंगलसूत्र से सजा हुआ आपका यह हाथ महादेव के उस हाथ पर रखा हुआ कैसा लगेगा, जिसमें सर्प लिपटे हुए हैं… अब तक आपने जिन महावर से रंगे चरणों से फूलों से भरे आंगनों में चलती रही हैं, उन्हीं से आपको अब उन श्मशान भूमियों में चलना पड़े, जिनमें शवों के बाल बिखरे हुए हैं, यह तो आपका शत्रु भी नहीं चाहेगा…

विवाह उपरांत जब महादेव के साथ बूढ़े बैल पर चढ़कर निकलेंगी तो नगर के प्रतिष्ठित लोग आपको देखकर हँसेंगे… महादेव के शारीरिक सौंदर्य का यह हाल है कि उसकी तीन आँखें हैं। उसके कुल का पता नहीं और धन संपत्ति इतने से स्पष्ट है कि वह दिगंबर रहता है। हे मृगनयनी, वरों में जो-जो बातें देखी जाती हैं, उनमें से महादेव में तो एक भी नहीं है।

अपने प्रिय महादेव के विरुद्ध ये वचन सुनकर पार्वती क्रोध से कांपने लगती हैं। उनकी आँखों में लाली उतर आई। कहती हैं– “तुम महादेव के वास्तविक रूप को नहीं जानते, इसीलिए तुमने ये बातें कहीं। मंदबुद्धि लोग असाधारण महात्माओं के चरिण से अकारण ही द्वेष किया करते हैं।

अपने नीच स्वभाव के कारण तुमने महादेव के दोष गिनाते हुए भी एक बात ठीक कह दी है कि उनके कुल का पता नहीं है। क्योंकि जिसे स्वयंभू ब्रह्मा को भी उत्पन्न करने वाला कहा जाता है, उनके कुल और वंश का पता ही क्या चल सकता है? जैसा तुमने सुना है, मान लिया कि वे बिल्कुल वैसे ही हैं, परंतु मेरा मन तो उन्हीं में रमा हुआ है। और प्रेम दोषों को नहीं देखा करता।

पार्वती कहती गईं। उस ब्रह्मचारी को देखकर वे अपनी सखी से कहती है– “सखी, देखो यह ब्रह्मचारी फिर कुछ बोलना चाहता है। इसके होंठ हिल रहे हैं। इसे चुप रहने को कहो। क्योंकि जो बड़ों की निंदा सुनता करता है, केवल उसी को पाप नहीं लगता, बल्कि जो सुनता है उसे भी पाप लगता है। या फिर मैं ही यहाँ से चली जाती हूँ…। यह कहकर पार्वती उठकर चल देती हैं। हड़बड़ाहट में उनका वल्कल वस्त्र फट गया है।

अब महादेव अपने वास्तविक रूप में आते हैं। मुस्कराकर वे पार्वती का हाथ पकड़ लेते हैं। महादेव को देखकर पार्वती काँप उठीं हैं। चलने के लिए पैर उठाया था, परंतु जैसे नदी के रास्ते में पर्वत आ जाए तो वह न वापस लौट पाती, न आगे जा पाती। पर्वतराज की कन्या वैसी ही हो गई। महादेव कहने लगे- “हे सुंदरी, मैं आज से तुम्हारा दास हूँ। तुमने अपनी तपस्या से मुझे खरीद सा लिया है।

यह सुनते ही पार्वती का सारा कष्ट तिरोहित हो गया। कालिदास ने पार्वती के मुख से ये शब्द कहे हैं- हे महादेव हमने आज तक जो भी कुछ अध्ययन किया, जो यज्ञ इत्यादि किए और जो तपस्या की, उस सबका फल आज हमें मिल गया है। क्योंकि आप जिसके चित्त में विद्यमान हों, वही व्यक्ति सबसे भाग्यशाली है।

फिर उस व्यक्ति के सौभाग्य का कहना ही क्या, जिसका आपने स्मरण किया हो! आपने हमें स्मरण किया इससे हम अपने-आपको बहुत भाग्यवान समझते हैं। यदि उत्तम लोग आदर प्रकट करें तभी व्यक्ति को अपनी योग्यता का विश्वास होता है।

शिव-पार्वती के प्रेम की इस कथा में आगे सप्तर्षि हिमालय के समक्ष महादेव का विवाह प्रस्ताव लेकर जाते हैं। हिमालय में उनके विवाह के उत्सव की अपार धूम है। कालिदास ने इन प्रसंगों को अपनी लेखन प्रतिभा से ऐसा जीवंत बनाया है कि कुमार संभव भारत की एक महानतम रचना बनकर अमर है।

महादेव और पार्वती के प्रेम प्रसंगों को कालिदास ने अपनी श्रृद्धा से श्रृंगारित किया है। शिव-पार्वती भारत की अनंत स्मृतियों में बहुत गहरे समाए हुए हैं। उनके विवाह की रात्रि शिवरात्रि है। यह भारत की उज्ज्वल स्मृतियों में उत्सव की शुभ रात्रि है।

और हाँ,  इस अमर प्रेम कथा में आगे एक पुत्र का जन्म है, जो देवताओं का सेनापति बनकर तारकासुर का वध करता है और शिव के निकट विराजित पार्वती एक वीर पुत्र की माता के रूप में पुलकित हैं।