भारती
महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के परिणामों से क्या सोच-समझ सकती हैं विभिन्न पार्टियाँ

नाटकीय चुनावी परिणामों के घटनाक्रम के बाद यह तय हुआ कि देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा)-शिवसेना का गठबंधन महाराष्ट्र में सत्ता पर विराजेगा। हालाँकि वे 288 सीटों वाली विधान सभा में महायुती अपने 200 के लक्ष्य से पीछे रह गई लेकिन यह आसानी से 144 के अर्ध आँकड़े से ऊपर है।

दूसरी ओर कांग्रेस-राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठबंधन 2014 के परिणामों से बेहतर प्रदर्शन कर खुश हो सकता है लेकिन उनका गठबंधन महायुती की शक्ति को चुनौती देने में अब भी सक्षम नहीं है। परिणाम से बनती छवियाँ और कुछ विश्लेषण प्रस्तुत है।

अति-उत्साही दक्षिणपंथी सोशल मीडिया पर जो भी कहें लेकिन यह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के लिए एक अच्छा परिणाम है, एक ऐसा जो नागपुर के इस युवा नेता की विजय सूची में गिना जाएगा।

फडणवीस के पहले कार्यकाल में अभूतपूर्व सामाजिक असंतोष देखा गया। साथ ही उनके शासन के पहले चार वर्षों में प्रचंड सूखा पड़ा जिसके कारण कृषि असंतोष भी हुआ। उन्हें एक धूर्त और असहायक सहयोगी दल के साथ सरकार चलानी पड़ी। टिकट बँटवारे को लेकर अंतिम समय पर विद्रोह भी हुआ।

इन सब चुनौतियों के बावजूद भाजपा ने अपने मत प्रतिशत में सुधार किया है और इसने अपने उम्मीदवारों को खड़ा करने वाली दो-तिहाई सीटों पर जीत भी दर्ज कर ली है जिससे यह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है। फडणवीस ने इस चुनाव को अपने प्रदर्शन के आधार पर जनमत-संग्रह बनाने का साहस दिखाया और जनता ने भी उनमें विश्वास जताया।

प्रमुख भाजपा नेताओं के चुनाव न लड़ने और हारने के कारण संभव है कि फडणवीस को अपने पहले कार्यकाल की तुलना में अल्प आंतरिक संघर्ष का सामना करना पड़े। लेकिन उनके लिए बड़ी चुनौती उनकी सहयोगी पार्टी है।

एक प्रेस वार्ता में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद में साझेदारी का मुद्दा उठाया है। भाजपा की कुल क्षमता 20 से घटने के बाद यह देखना रोचक होगा कि वह इसपर क्या प्रतिक्रिया देती है।

दूसरी ओर शिवसेना ने पहले कार्यकाल में एक विपक्षी दल जैसा व्यवहार किया, लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी की लहर पर सवार होकर जीते और विधान सभा चुनावों में भी अपने प्रदर्शन में कोई विशेष सुधार नहीं किया है। अगर ऐसी परिस्थिति में भी शिवसेना मुख्यमंत्री पद के सपने देख रही है तो उसका श्रेय उद्धव ठाकरे के चतुर संचालन और राज्य में सत्ता के बँटवारे के जटिल समीकरणों को जाता है।

चुनावी दौड़ में पार्टी ने मुंबई की वर्ली से उद्धव के बेटे आदित्य को खड़ा किया था जो कि परिवार से पहली बार चुनाव लड़ने वाला सदस्य बना। इससे संकेत मिलता है कि वरिष्ठ ठाकरे समझ गए हैं कि बदलते समय में निर्वाचित प्रतिनिधि अनिर्वाचित नेताओं के अनुसार नहीं चलेंगे।

अवश्य ही यह चुनावी चर्चा एनसीपी प्रमुख शरद पवार के बिना पूरी नहीं हो सकती। इस चुनाव में सोशल मीडिया ने उन्हें और उनकी पार्टी को नहीं स्वीकारा। पुलवामा हमले और अनुच्छेद 370 पर पवार की टिप्पणियाँ शिक्षित मध्यम-वर्गीय मतदाताओं को नहीं भाईं।

चुनाव से पहले वाले वर्ष में पार्टी के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी लेकिन ऐसी परिस्थिति में भी 80 वर्षीय व्यक्ति के चुनाव अभियान ने कार्यकर्ताओं में जान फूँक दी। सतारा लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी ने उदयनराजे भोंसले को हराया। यह एक प्रतिष्ठा सीट थी क्योंकि राजे ने इस वर्ष ही एनसीपी छोड़ी थी।

एनसीपी पश्चिमी महाराष्ट्र और विदर्भ में अपनी खोई हुई ज़मीन को भी कुछ हद तक वापस प्राप्त कर पाई है। ऐसा लगता है कि एनसीपी अपने गठबंधन को चला रही है। यह दिखाकर पवार भी पार्टी छोड़ रहे लोगों को रोक पाएँगे।

गठबंधन के एक सहयोगी ने जहाँ ताकत दिखाई और अच्छा प्रदर्शन किया, वहीं भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी) अपने फीके प्रदर्शन पर ही टिकी रही और शासन-विरोधी भावों को भुना नहीं सकी।

राज्य स्तर पर प्रबल नेतृत्व और ज़मीनी स्तर पर कैडर के अभाव ने पार्टी को नुकसान पहुँचाया है। उन्हें जहाँ भी जीत मिली है, वह अंतिम समय में पवार के नेतृत्व में एनसीपी के उत्थान के बिना संभव नहीं हो पाती।

इन परिणामों के देखकर हम सोचते हैं कि यदि इस गठबंधन से एनसीपी पीछे हट जाए तो राज्य में पार्टी का बविष्य क्या होगा।

राज्य की राजनीति की बात करें तो पहचान (आइडेन्टिटि पॉलिटिक्स) के नाम पर बनी पार्टियाँ जैसे ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन, वंचित बहुजन अघाडी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मात्र कुछ मत काट पाई हैं, चाहे यह जानबूझकर हो या अनजाने में।

भले ही इन पार्टियों को मुख्यधारा की मीडिया का कितना ही ध्यान मिलता हो लेकिन ज़मीनी स्तर पर इनका आकर्षण सीमित ही है। राज ठाकरे हो या असदुद्दीन ओवैसी या प्रकाश अंबेडकर, वे राज्य की राजनीति में असली सत्ता किसी बड़े खिलाड़ी के सहारे ही प्राप्त कर सकते हैं यदि वे रणनीतिगत गठबंधन करें तो।

अंत में एक रोचक अवलोकन उल्लेखित करना चाहूँगा। यह तीसरे विधान सभा चुनाव हैं जब कांग्रेस अपने सहयोगी दल के साथ भाजपा के निकट पहुँच सकी है। गुजरात 2017 और कर्नाटक 2018 बाकी दो हैं। तीनों मामलों में अंततः सरकार भाजपा ने ही बनाई।

चुनाव के बाद अमित शाह जैसे लोगों के प्रबंधन के समकक्ष कांग्रेस को न सिर्फ अधिक सीटें जितनी हैं, बल्कि सोच-समझकर उनका प्रयोग भी करना है, जैसे कि उन्होंने 2018 में मध्य प्रदेश और राजस्थान में किया।

ज़मीनी स्तर पर सत्ता-विरोधी भाव का न होने या किसी नए नेता के न उभरने से पार्टी भाजपा और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रीय दलों से पीछे ही रह जाएगी।