भारती
स्वच्छ भारत- कूड़ा प्रबंधन के लिए लखनऊ नगर निगम के प्रयास कितने प्रभावी

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ कभी भी स्वच्छता की दृष्टि से उत्कृष्ट नहीं रही है। 2019 के स्वच्छता सर्वेक्षण में लखनऊ 2018 में मिले 115 के स्थान से गिरकर 121 पर आ गया, हालाँकि इसमें 100 नए शहर भी जोड़े गए थे। राज्य स्तर पर भी यह छठे स्थान से गिरकर 10वें स्थान पर आ गया।

लखनऊ को सबसे कम अंक नगर निगम द्वारा दी जाने वाली सेवा जैसे कूड़ा इकट्ठा करना, कूड़ा निराकरण, सड़कों और नालियों की सफाई में मिले। इसने 1,250 अंको में से मात्र 259 अंक ही प्राप्त किए। कुल मिलाकर इसे 5,000 में से मात्र 2,746 अंक मिले हैं।

शहर में कूड़ा प्रबंधन की समस्या को स्थानीय मीडिया ने कई बार उल्लेखित किया। टाइम्स ऑफ इंडिया  को प्राप्त जानकारी के अनुसार अक्टूबर-नवंबर 2018 में 14,000 शिकायतों में से लखनऊ नगर निगम ने मात्र 5,600 शिकायतों का ही निदान किया था। साथ ही 30 लाख से अधिक जनसंख्या वाले इस शहर में 2018 तक मात्र 450 ट्रैश कैन ही थे जिसके कारण कई बार सड़कों पर कूड़ा देखा जा सकता था।

लखनऊ के रहीम नगर में फैला कूड़ा, चित्र- सर्वेश गोयल

इन सबके बीच, 15 मई 2019 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच ने लखनऊ नगर निगम, लखनऊ विकास प्राधिकरण और उप्र आवास एवं विकास बोर्ड को चार दिनों के अंदर कूड़ा, अवैध डेयरी और सड़कों पर से आवारा पशु हटाने का निर्देश देकर 20 मई को इसकी कार्य रिपोर्ट मांगी थी। न्यायालय ने प्रतिबंध के बावजूद शहर में हो रहे प्लास्टिक के प्रयोग को भी उल्लेखित किया था।

लखनऊ में कूड़ा फैलने का प्रमुख कारण है कूड़ा इकट्ठा करने और प्रबंधन प्रणाली की अप्रभावशीलता। लखनऊ के कुल 5.78 लाख घरों में से मात्र 2 लाख घरों के ही द्वारों से कूड़ा इकट्ठा किया जाता था। जून में इसका विस्तार 1.37 लाख और घरों तक बढ़ाया गया। अब इस 60 प्रतिशत विस्तार को 100 प्रतिशत में परिवर्तित करने के लिए अक्टूबर तक की समय सीमा तय की गई है।

गुरुग्राम आधारित कूड़ा प्रबंधन कंपनी ईको ग्रीन लखनऊ नगर निगम के लिए कार्य करती है। पहले चार ज़ोनों में निजी एजेंसियों और चार ज़ोनों में ईको ग्रीन द्वारा कचरा इकट्ठा किया जाता था लेकिन अब सभी जगह से यही कंपनी कचरा इकट्ठा कर रही है। कूड़ा इकट्ठा करने के अलावा इसकी ढुलाई, निपटान एवं रीसाइकल करने का दायित्व भी इस कंपनी का ही है।

कंपनी लोगो

द्वार से कचरा इकट्ठा करने के कार्य में हर वार्ड में इसके 300 कर्मचारी लगे हुए हैं। इस सुविधा के बदले लखनऊ वासियों से लिये जाने वाले शुल्क को दोगुना किया जा रहा। 2 करोड़ के प्रति माह राजस्व का लक्ष्य होने के कारण अब लोगों को मासिक रूप से 40 रुपये की बजाय 80 रुपये देने होंगे।

पिछले वर्ष इसका कार्य संतोषजनक नहीं रहा था इसलिए इस बार इसे चेतावनी दी गई है कि यह निर्धारित कार्य को पूरा करे अन्यथा इसे काली सूची में डालकर इसका अनुबंध निरस्त कर दिया जाएगा। न्यायालय ने भी नगर निगम को निर्देश दिए थे कि यदि ठेकेदारों का कार्य संतोषजनक न रहे तो उन्हें हटाया जाए। इस संदर्भ में ठेकेदारों से शपथ-पत्र भी जमा किए गए थे।

कार्य की आलोचना, न्यायालय व एनजीटी की फटकार और अधिकारियों व ठेकेदारों की जवाबदेही बढ़ाने से लखनऊ नगर निगम की बढ़ती सक्रियता को देखा जा सकता है। द्वार से कूड़ा इकट्ठा हो, यह सुनिश्चित करने के लिए नगर निगम एक उच्च तकनीक को अपनाने जा रहा है। इसमें हर घर के बाहर एक बार कोड लगाया जाएगा और कचरा उठाने के बाद सफाई कर्मचारी को उसे सूचीबद्ध करने के लिए बार कोड स्कैन करना होगा।

इस बार कोड में घर की जीपीएस लोकेशन की जानकारी रहेगी। शुरुआती तौर पर इसे सिर्फ गीतापल्ली वार्ड में लागू किया जा रहा है जहाँ 49,000 घर हैं। यह सफल रहा तो इसे सभी 110 वार्डों में लागू किया जाएगा। जिन कर्मचारियों के पास स्मार्ट फोन नहीं होगा उन्हें स्मार्टफोन देने के लिए नगर निगम ने 15 लाख रुपये अलग से रखे हैं।

2016 में पर्यावरण मंत्रालय ने कूड़ा प्रबंधन के कुछ नियम बताए थे और विभिन्न विभागों व प्राधिकरणों में कार्य भी बाँटा था। इसके तहत द्वार से कचरा एकत्रित करने की अनिवार्यता के साथ ट्रान्सफर स्टेशन के निर्माण और लैंडफिल स्थल के चुनाव के प्रावधान दिए गए थे।

ईको ग्रीन के लखनऊ में कार्यरत कर्मचारी राहुल मौर्य ने स्वराज्य  को बताया कि शहर में अभी तक चार ट्रान्सफर स्टेशन का निर्माण हो चुका है और तीन अन्य प्रस्तावित हैं जिन्हें भूमि अधिग्रहण में समस्या आ रही है। निर्धारित क्षेत्र से कचरा इकट्ठा करके छोटी गाड़ियाँ इस ट्रान्सफर स्टेशन पर जाकर कचरा डालती हैं और वहाँ से यह कचरा बड़े ट्रकों में भरकर लैंडफिल साइट तक पहुँचता है।

2018 तक चार- दुबग्गा, गोमती नगर में विकास खंड, सीतापुर रोड पर प्रियदर्शिनी कॉलोनी और पुराने शहर में फैज़ुल्लागंज स्थित-  ट्रान्सफर स्टेशन नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल (एनजीटी) का उल्लंघन करते हुए रहवासी क्षेत्रों में थे जिन्हें बंद कराया गया। इसके बाद अब जिन क्षेत्रों में ट्रान्सफर स्टेशन नहीं है, उनके कचरे को सीधे शिवरी रीसाइकल प्लांट पर पहुँचाया जाता है।

लखनऊ स्थित कूड़ा रीसाइकल संयंत्र

लगभग प्रतिदिन 1,500 टन का कचरा उत्पन्न करने वाले लखनऊ शहर में स्थापित शिवरी कूड़ा रीसाइकल संयंत्र की क्षमता 1,300 टन है। लैंडफिल साइट शहर से 15-20 किलोमीटर दूर रीसाइकल प्लांट के निकट ही स्थित है। रीसाइकल होने के बाद या रीसाइकल रहित जो कचरा बच जाता है उसे लैंडफिल साइट पर उचित प्रावधानों के अनुसार डाला जाता है। वर्तमान में यहाँ आरडीएफ (रिफ्यूज़ डिराइव्ड फ्यूल) को रिसाइकल करने के लिए कोई इकाई नहीं है लेकिन इसे जल्द ही बनाया जाएगा, ईको ग्रीन के अधिकारी ने बताया।

नागरिकों के मध्य जानकारी का अभाव होने के कारण वे सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग नहीं डालते थे जिस कारण सहायक स्तर पर यह ज़िम्मेदारी भी नगर निगम पर ही आ जाती थी और कटरा निपटान में देरी होती थी। इसके लिए कई जागरूकता अभियान चलाए गए।

अब ईको ग्रीन गीले कचरे से कम्पोस्ट बनाने का कार्य भी कर रहा है। साथ ही 2016 के नियम अलग-अलग स्थानों से पृथक गीला कचरा एकत्रित कर अकेंद्रित कम्पोस्टिंग पर बल देते हैं। इसके तहत लखनऊ नगर निगम ने धार्मिक स्थलों से फूलों को अलग इकट्ठा करके उनसे अगरबत्ती बनाने की अनोखी पहल शुरू की थी।

लखनऊ में लगभग 2 टन फूलों का कचरा निकलता है। इसके प्रसंस्करण का दायित्व कान्हा उपवन नामक सामाजिक उद्यम को सीमैप के निर्देशन के अधीन दिया गया था। प्रति 100 किलो ताज़े फूलों से 30-35 किलो अगरबत्तियाँ बनाई जा सकती हैं। लेकिन कचरे में फूल थोड़े सड़ जाते हैं इसलिए मात्र 20 प्रतिशत फूलों से ही अगरबत्ती बनाने का लक्ष्य रखा गया था। हालाँकि पृथक्करण की प्रणाली का अभाव होने के कारण वे मात्र 10 प्रतिशत फूलों का ही उपयोग कर पा रहे थे।

कुल मिलाकर लखनऊ नगर निगम ने सुधार हेतु कई प्रयासों को शुरू किया है लेकिन फिर भी हम आए दिन नागरिकों को शिकायत करते पाते हैं। ईको ग्रीन पर शिकंजा कसने और अधिकारियों व कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने का कितना प्रभाव पड़ा, यह अगले वर्ष का स्वच्छता सर्वेक्षण बेहतर बता पाएगा।