भारती
ज़ालिम लुटेरों में कुत्तों जैसी लड़ाई- भारत में इस्लाम के फैलाव की पड़ताल भाग- 9

देवकोट में बंगाल की बदकिस्मती के सबसे पहले ज़िम्मेदार मुहम्मद बख्तियार खिलजी को मौत के घाट उतारने वाला अली मर्दान खिलजी कौन था? वह बंगाल में ही किसी नारकूती नाम की रियासत या नगर पर कब्जा किए था।

आज के पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश तब एक ही थे। नबद्वीप आज के पश्चिम बंगाल में है तो देवकोट बांग्लादेश में आज के दिनाजपुर जिले में। देवकाेट वही जगह है, जहां पहाड़ों से वापसी में बख्तियार मारा गया। उसे वहीं की मिट्‌टी में दफनाया गया था।

मिनहाज़ सिराज ने कुतुबुद्दीन एबक के साथ ही आए पहली पंक्ति के सात दुर्दांत लुटेरों की शिनाख्त तफसील से की है। इनमें से चार ने बिहार-बंगाल के इलाके को शिकार बनाया था। बख्तियार इनमें सबसे ऊपर है।

मुहम्मद शीरान खिलजी और अहमद शीरान खिलजी नाम के दो भाई उसकी खिदमत में थे। नबद्वीप में राय लखमनिया (राय लक्ष्मणसेन) के राज्य में कब्जे के समय ये दोनों भी बख्तियार के साथ थे। बाकी बचे हुए खिलजी अमीरों ने बंगाल के अलग-अलग इलाकों पर अपने कब्ज़े जमा लिए।

तिब्बत की तरफ कूच करने के पहले दोनों शीरान भाइयों को बख्तियार ने जाजनगर (आज का ओडिशा) की तरफ रवाना किया था। निश्चित तौर पर ये न तो कोई कारोबार करने गए होंगे, न ही अमन का कोई संदेश लेकर और न ही ये इस्लाम के शांतिदूत थे, जो मजहब का प्रचार करने गए हों। जैसा कि चल रहा था, ये नए शिकार की तलाश में या ताे लूटमार के इरादे से निकले होंगे या जगन्नाथपुरी मंदिर के लिए मशहूर गंग राजवंश के इस समृद्ध इलाके की जासूसी करने गए होंगे।

जब दोनों को पता चला कि उनका सरगना मुहम्मद बख्तियार तिब्बत की मुहिम से लौटते हुए मारा गया है तो इन्होंने ही देवकोट आकर उसकी सुपुर्दे-खाक की रस्म पूरी की थी। यह उत्पाती खिलजियों के लिए बड़ा झटका था और इसके लिए कुसूरवार अली मर्दान था, जो बख्तियार को मारकर नारकूती लौट गया था।

शीरान भाइयों के निशाने पर अब यही अली मर्दान था। उसे बंदी बना लिया गया। लेकिन वह किसी तरह कोतवाल की मिलीभगत से दिल्ली भागकर कुतबुद्दीन एबक के पास जा पहुंचा। इधर बेबस बंगाल में बचे हुए खिलजियों ने लूटमार और नए-नए इलाकों में अपने झपट्‌टे जारी रखे। शीरान भाइयों ने देवकोट पर हमला कर दिया। मुहम्मद शीरान खिलजी इन झड़पों में यहीं मारा गया।

इन हादसों से पहले का वाकया है। अली मर्दान दिल्ली में रहते हुए कुतबुद्दीन एबक के साथ एक बार गजनी गया था, जहाँ तुर्कों ने उसे पकड़ लिया था। किसी तरह बचकर वहाँ से वह फिर दिल्ली लौटा और कुतबुद्दीन एबक ने उसे लखनौती पर कब्जा जमाने का फरमान दिया। वह बंगाल की तरफ रवाना हुआ और देवकोट पहुँचा। यहां हुसामुद्दीन खिलजी पहले से ही मौजूद था, जिसने उसका स्वागत किया।

लाहौर में एबक की मौत के बाद अली मर्दान ने अलाउद्दीन की उपाधि धारण की और खुद को सुलतान कहने लगा। मिनहाज़ सिराज ने ही उसे हद दरजे का जालिम और अत्याचारी कहा है। उसने बंगाल में यहाँ-वहाँ फैलकर अपने कब्ज़े जमा रहे खिलजी अमीरों की हत्याएँ करवाना शुरू किया। अब यह एक झुंड में आए हमलावरों की इस इलाके में एकाधिकार की लड़ाई थी। जल्दी ही उसकी फौज का आतंक ऐसा जमा कि उस समय के बंगाल के सारे राजा उसे फिरौती भेजने लगे।

एक लुटेरा जब हुकूमत संभाले तो वह क्या करेगा, यह अली मर्दान की करतूत से जाहिर हुआ। वह शेखचिल्लियों की तरह हिंदुस्तान के चारों ओर के राज्यों के बारे में फरमान जारी करने लगा। लूट की दौलत उसके सिर चढ़कर बोल रही थी। वह अपने दरबार में खुरासान, गजनी और गोर पर कब्जा जमाने की डींगे हांकने लगा और फरमान तक जारी करने लगा। मिनहाज सिराज लिखता है-

“एक कारोबारी आदमी बहुत गरीब हो गया। उसकी दौलत किसी वजह से बरबाद हो गई। वह अली मर्दान के पास आकर अपना रोना रोने लगा। अली ने पुछवाया कि वह कहां का रहने वाला है। लोगों ने बताया कि वह इस्फहान का निवासी है। अली मर्दान ने हुक्म दिया कि इस्फहान का राज्य और अक्ता पर उसे अधिकार प्राप्त करने का आज्ञा पत्र जारी कर दिया जाए। अब उसके अत्याचारों के खौफ से किसी की हिम्मत नहीं हुई कि जनाब इस्फहान हमारी हुकूमत से बाहर है।”

हमारे इतिहासकारों ने खुद को सुलतान घोषित करने वाले इन आला दरजे के बेवकूफ जालिमों की ये असलियतें लगातार छुपाईं और इस ढंग से इनके विवरण किताबों में पेश किए गए, जैसे इनके आने के पहले बंगाल में कुछ नहीं था। राज्य तो इन्होंने स्थापित किया और इतिहास इनसे ही शुरू होता है।

आखिरकार उस कारोबारी को इस्फहान पर कब्जा करने का फरमान जारी हुआ। जबकि उसके पास खाने को अन्न के दाने नहीं थे और पहनने के कपड़े तक नहीं थे। दरबार के लाेगों ने इस्फहान के इस ‘नवनियुक्त प्रमुख’ को रास्ते के लिए मदद दी ताकि वह इस्फहान जाकर अपना कब्ज़ा जमा सके।

अली मर्दान और उसके गुर्गे बंगाल पर कहर बरपाने के लिए कुख्यात हो गए। वे बेवजह अपना आतंक जमाने के लिए कत्लेआम से बाज नहीं आते थे। उसकी करतूतों से ही परेशान होकर बचे हुए खिलजियों ने एक दिन घेरकर उसे मौत के घाट उतार दिया। उसका आतंक दो साल तक ही चला। बंगाल के इतिहासकार इसे शासन कहते हैं।

अब हुसामुद्दीन एवज खिलजी नमूदार होता है। इस खिलजी के बारे में बताया गया है कि वह जब गोर से अपने गधे पर सामान लादकर निकला तो रास्ते में दो दरवेश मिले। उन्होंने पूछा- “तेरे गधे पर कुछ खाने का सामान भी है?”

एवज खिलजी के पास कुछ रोटियाँ और गोश्त था। उसने हामी भरी और एक कपड़ा बिछाकर दोनों दरवेशों के सामने खाने का सामान रख दिया। जब वे पेट भर चुके तो पानी पेश करके खड़ा हो गया। अब दरवेशों ने आपस में कहा कि इस आदमी ने हमारी सेवा की है। इसकी खिदमत बेकार नहीं जानी चाहिए। उन्होंने एवज खिलजी की तरफ मुखातिक होकर कहा- “तू हिंदुस्तान का रुख कर। वह इलाका, जो मुसलमानों की हुकूमत का सबसे आखिरी हिस्सा है, हमने तुझे दिया।”

एवज खिलजी वहाँ से गधे पर अपनी बीबी को बिठाकर हिंदुस्तान आया और कुतबुद्दीन एबक की सेवा में हाज़िर हो गया। बंगाल में लखनौती के नाम का खुत्बा और सिक्का उसके नाम से चला गया। उसकी उपाधि गयासुद्दीन तय हुई। अब लखनौती उसकी राजधानी बनी। उसने बंगाल में मस्जिदें और मदरसे बनवाए। खजाने के नाम पर लूट का माल बेशुमार था। हिंदुस्तान की खून-पसीने की रकम से उसने इस्लामी आलिमों के लिए वजीफे तय किए।

दौलत की इस बंदरबाँट के किस्से सुन-सुनकर गजनी और गोर के उजाड़ इलाकों से बड़ी तादाद में लोग पैदल या गधे की सवारी करते हुए आया करते थे। ऐसे ही फिरोजकोह के एक आदमी का किस्सा है। वह एक इमाम जमालुद्दीन गजनवी का बेटा था, जो दौलत के लालच में दिल्ली की तरफ आया था।

उसका नाम जलालुद्दीन था। वह 1211 में कुछ वक्त यहाँ बिताकर बेहिसाब दौलत लेकर अपने शहर लौट गया। उस दौलत के बारे में जब उससे पूछा गया तो उसने बताया कि वह दिल्ली से लखनौती गया था। वहाँ गयासुद्दीन के दरबार में तजकीर (इस्लाम के इतिहास और मजहबी कायदों पर भाषण) करने का मौका मिल गया। खुश होकर गयासुद्दीन ने अपने सब दरबारियों को हुक्म दिया कि वे उसे 10,000 चांदी के तनके दें। उसे 18,000 तनके मिले।

1243 में मिनहाज़ सिराज लखनौती आया। यह शहर गंगा के दोनों किनारों पर बसा हुआ था और मिनहाज़ ने यहाँ आकर ही खिलजियों के किस्से दर्ज किए। जिस देवकोट में बख्तियार मरा, वह लखनौती से 10 दिन के फासले पर था। बंगाल और बांग्लादेश का यह निचला इलाका जलमग्न रहता था, जहां नौकाओं से ही आवागमन मुमकिन था।

वह लिखता है कि जाजनगर (आज का उड़ीसा), पूरा बंगाल, कामरूप (आज का असम) और तिरहुत तक हुसामुद्दीन एवज खिलजी का कब्जा हो गया था, जहां के राजे-रजबाड़े उसे टैक्स भेजा करते थे। इस माल से उसके पास अकूत दौलत, खजाना और हाथी जमा हो गए। उसने अपने अमीरों को उन इलाकों में तैनात किया। ऊँचे मालदार पदों पर इनके झुंड में आए मुस्लिमों का कब्जा होता रहा।

मीच जाति के उस सरदार के इस्लाम कुबूल करने के बाद धर्मांतरण इन कब्जों के कारण और तेज होता गया। आज के बंगाली मुसलमानों की शक्ल-सूरत, नैन-नक्श, कदकाठी और रंग-रूप कितना किसी तुर्क या अफगानी नस्ल से मिलता है। बिल्कुल नहीं। वे 100 फीसदी उन्हीं अभागे हिंदू और बौद्धों के वंशज हैं, जो सदियों तक जलील किए गए, जिनकी औरतों काे गुलाम बनाकर बेचा गया।

आज के दौर में जमात और लीग के सियासी झुंडों में नुमाया सारे के सारे उन्हीं बेबस माँओं की कोख से पैदा हुए थे। अली मीच और उस जैसे लाखों लोग जिनके नाम तक इतिहास से गायब हैं, इनके असली पुरखे हैं। याददाश्त पर जोर डालने भर की देर है और वे अपनी असली पहचान को अपने भीतर ही पाएँगे…

दिल्ली में उस समय सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश का कब्जा था और उसे मालामाल बंगाल की खबरें भी मिल ही रही थीं। लूट के माल पर अपने हक के लिए दिल्ली और बंगाल के बीच इन लुटेरों की जानलेवा छीना-झपटी भी शुरू हो चुकी थी। इल्तुतमिश ने 1225 में लखनौती पर हमला बोला। अब बंगाल लुटेरों के एक गिराेह से दूसरे गिरोह के बीच लूटपाट की बदकिस्मत ज़मीन होकर रह गया।

एवज खिलजी ने इस हमले के जवाब में नदी मार्ग से अपनी नौकाएँ उतारीं। लेकिन आपस में लड़ मरने की बजाए हिस्सेदारी का बीच का रास्ता निकाला गया। दोनों में समझौता हो गया। बंगाल की लूट से उसने 38 हाथी और 80 लाख का धन हाथों-हाथ दिया और इल्तुतमिश के नाम का खुत्बा चलाना मंजूर करके लौटा। खुत्बा मतलब अब वह दिल्ली के मातहत बंगाल में अपना कब्जा जमाए रखेगा।

इल्तुतमिश ने बंगाल से लाैटते हुए बिहार की हुकूमत एक अलाउद्दीन जानी नाम के अपने एक दूसरे गुर्गे को दे दी। यह पता चलते ही एवज खिलजी लखनौती से बिहार गया और अपना कब्जा यहाँ भी जमा लिया।

अगले ही साल इल्तुमिश ने अपने एक बेटे नासिरुद्दीन महमूद ने एक फौज के साथ लखनौती पर फिर हमला किया। उन दिनों एवज खिलजी लखनौती से आज के बांग्लादेश के इलाकों और असम की तरफ लगातार झपट्‌टे मार रहा था। वह उस समय लखनौती में नहीं था। नासिरुद्दीन खिलजी ने वहाँ कब्ज़ा आसानी से जमा लिया।

एवज खिलजी ने यह सुना तो उसके होश उड़ गए। उसने लौटकर नासिरुद्दीन महमूद से मुकाबला किया। इस लड़ाई में उसके सारे अमीर बंदी बना लिए गए। एवज खिलजी को मौत के घाट उतार दिया गया। वह 12 साल तक बंगाल की छाती पर लदा रहा।

दिल्ली में इस्लामी कब्ज़े की यह पहली सदी है। हजारों सालों के विकास क्रम में महान हिंदू साम्राज्यों के मातहत फली-फूली बंगाल और बिहार की शानदार सभ्यता और उनके विशाल स्मारकों को धूल में मिलता हुआ हम देखते हैं।

दो धर्मों की पवित्र भूमि बिहार बाहरी हमलावर-लुटेरों के बीच बंगाल के रास्ते में आपसी और अंतहीन युद्ध का एक अशांत इलाका बन गई, जहाँ आने वाले 700 सालों तक लगातार खूनखराबा, कब्ज़ा और लूट की अनगिनत घटनाओं से इतिहास भरने लगता है। बाहरी हमलावर मुसलमान, जो बहुत मामूली तादाद में यहां आए और एक बार सत्ता पर कब्जे के साथ अपने आतंक का राज कायम करने में कामयाब हो गए।

1,500 साल से बौद्ध संस्कृति में रचे-बसे बिहार की विरासत हमेशा के लिए खत्म कर दी गई। आने वाली सदियों में नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतीपुर के महान विश्वविद्यालय उजाड़ टीलों में गुम होते चले गए। बुद्ध के बताए रास्ते पर शांतिपूर्वक चलते आए हजारों बौद्ध भिक्षु और विद्यार्थी अपने विशाल मठों में मार डाले गए। 

अपने आसपास लगातार हो रही इन हृदयविदारक घटनाओं से आम लोगों में दहशत बैठना लाजिमी था, जिनके लिए बाद में हिंदू होने की वजह से जज़िया भुगतना पड़ा और इससे छुटकारे के लिए मजबूरी में कलमा अपने हलक में उतारना पड़ा। भारत के अनुभव में ऐसा पहली बार हो रहा था, जब एक नई हमलावर रवायत मौत की एवज में सजा के दूसरे विकल्प के तौर पर सिर पर टिकाई गई और इसे उन लोगों ने बड़े फख्र से इस्लाम कहा…

अब आप आज के बिहार, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में हिंदू-मुस्लिम आबादी के अनुपात को देश के बँटवारे से अब तक की हर सांप्रदायिक कही गई घटनाओं की रोशनी में देखिए। जो कुछ हुआ, वह कल्पना के परे है। हिंदुस्तान की बदकिस्मती उसे कहाँ से कहाँ ले गई?

एबक और खिलजी सरदारों के वे हमले और लूट के शुरुआती धावे आखिरकार देश को टुकड़े-टुकड़े करने की दिशा में पहला और मजबूत कदम ही साबित हुए। वह भी एक ऐसे मजहब के आधार पर, जो सजा के तौर पर बेबसी और गरीबी में डाल दिए गए इस देश के स्थाई और मूल निवासी गुलामों के गले उतारा गया। चंद बेरहम लुटेरों के डरावने झुंड यहाँ झपटे और एक पुरानी संस्कृति सदियों तक सन्नाटे में घिरती चली गई!

(अगले भाग में हम बंगाल से फिर दिल्ली का रुख करेंगे, जहाँ अगर आज जैसे अखबार होते तो हर दिन हत्याओं की खबरें ही हर पेज पर छपी होतीं। दिल्ली में काबिज ये तुर्क लुटेरे हर दिन एक दूसरे को कत्ल करने में लगे थे। हर तरफ से कत्लेआम की खबरें थीं।)

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के फैलाव पर 20 वर्ष से अध्ययनरत और स्वराज्य के सहयोगी लेखक हैं।