भारती
भगत सिंह और आज़ाद जिस सोच के सिपाही थे, उसके जनक लोकमान्य तिलक को नमन

प्रसंग- परतंत्रता के तिमिर में राष्ट्र गौरव का दीपक जलाने वाले लोकमान्य बाल गंगाधार तिलक की जन्मतिथि 23 जुलाई पर उन्हें नमन।

वर्ष 1916, लखनऊ। रेलवे स्टेशन पर भीड़, महाराष्ट्र से एक राष्ट्रीय नेता के आगमन की प्रतीक्षा। अवसर, कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन। छात्रों की और स्थानीय नेताओं की बड़ी भीड़। भीड़ मे एक 19 वर्षीय युवक, महान स्वतंत्रता सेनानी के दर्शन का, स्नेहाशीष का इच्छुक, वर्तमान उत्तर प्रदेश के गाँव से आया हुआ।

छात्रों को अचानक ख़बर पहुँची कि स्वागतकारिणी समिति के अध्यक्ष पंडित जगतनारायण का निर्णय है कि आगंतुक नेता का स्वागत केवल स्टेशन तक सीमित रखा जाए। अन्यथा मराठी नेता के स्वागत मे जनता का उत्साह कांग्रेस अध्यक्ष से अधिक होना उचित ना होगा। इसलिए समिति ने तय किया कि पूना से आने वाले इस जनप्रिय नेता को बंद गाड़ी मे अधिवेशन स्थल पहुँचाया जाए।

आवश्यक था कि सूरत अधिवेशन के बंद घाव पुन: ना खुलें और केंद्रीय नेतृत्व या आलाकमान कि क्षणभंगुर स्वघोषित महत्ता चोटिल ना हो। उत्तम योजना, कठिनाई एक- शाहजहाँपुर से आया हुआ एक 19 वर्षीय छात्र। स्वागत समिति घेर कर रेल से उतरे नेता को मोटरगाड़ी मे बिठाती है और युवक उस गाड़ी के सामने सेट जाता है। हटने के आग्रह किये जाते हैं, ज़ोर ज़बरदस्ती की जाती है, युवक की आँखों से बहती अविरल अश्रुधारा और हर डाँट, ज़िद और धमकी का एक उत्तर- “मोटर मेरे ऊपर से निकाल लो”।

हारकर जनप्रिय नेता मोटर से निकलते हैं। छात्रों के सर उनके चरणों पर गिर जाते हैं और वे थककर घोड़ा गाड़ी पर चढ़ते हैं जिसे घोड़ों के स्थान पर छात्र खींचते हैं। स्वागत यात्रा पुष्प वर्षा के बीच शहर से गुज़रती है, गिरे फूलों को लोग बाँध लेते हैं, चक्के से छुई मिट्टी को माथे से लगाते हैं। उन्नत ललाट, स्थिर दृष्टि, गर्वशील ग्रीवा- सुसुप्त भारतीय स्वाभिमान की पुनर्जागृत छवि सबके हृदय मे अनंत काल के लिए ठहर जाती है।

यह भारतीय इतिहास का वह दृश्य है जो यदि ढाँप ना दिया गया होता तो सदियों तक राम-हुनुमान की तरह भारतीय जनमानस में स्थापित रहता। यह प्रसंग भारतीय स्वतंत्रता के प्रति कांग्रेस के प्रारंभिक संकोची प्रयासों के मुखर होने का अवसर दर्शित करता है। यह उस गंभीर स्वर का राष्ट्रीय अनुनाद है जो एक स्थिर स्वर मे साम्राज्य की आँखों मे आँखें डाल कर कहता है “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा।”

इस प्रसंग के तीनों महानुभावों का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम मे अपना ही स्थान है। भारतीय इतिहास को कांग्रेस के प्रथम परिवार के क़ब्ज़े से मुक्त करने के लिए आवश्यक है कि हम इनके विषय में जानें। कांग्रेस स्वागत समिति के कुटिल अध्यक्ष थे पंडित जगतनारायण मुल्ला, जननायक नेता थे लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और 19 वर्षीय उग्र युवक थे रामप्रसाद बिस्मिल।

1857 की क्रांति के परिणामस्वरूप चले ब्रिटिश दमन चक्र के बाद के सहमे हए राष्ट्रीय नेतृत्व ने पहली बार तिलक के रूप मे भारत के बिस्मिल जैसे स्वतंत्रता-प्रेमी युवकों की आत्मा को स्वर दिया था। कालांतर मे यही बिस्मिल क्रांतिकारी संगठन ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के संस्थापक एवं नेता बनते हैं, और इन्हीं जगतनारायण मुल्ला द्वारा फाँसी पर भेजे जाते हैं।

बिस्मिल, अश्फ़ाक, भगतसिंह और आज़ाद जिस सोच के सिपाही थे, तिलक उस सोच के जनक और अभिभावक थे। ब्रिटिश शिक्षा से निकली अभिजात्य कांग्रेस मे तिलक ज़मीनी असंतोष का स्वर थे। कांग्रेस के आंग्ल-आचरण के बीच तिलक एक नितांत भारतीय भावना और विचार के सूचक थे। यह भारत का सौभाग्य रहा कि आगे भी डॉ राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल इस संस्कृति एवं इतिहास-निष्ठ विचार को कांग्रेस में तब तक जीवित रखे रहे जब तक उन्हें पूर्णतया हाशिए पर धकेल नहीं दिया गया।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में हुआ था। पिता गणित के शिक्षक थे, आगे शिक्षा विभाग के अधिकारी भी हुए। तिलक 16 वर्ष के थे जब पिता की मृत्यु हुई। पिता की मृत्यु के चार माह पश्चात तिलक ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1876 में दकन कॉलेज से लोकमान्य ने स्नातक और 1879 मे कानून स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

तिलक की शिक्षा यात्रा मे सबसे अधिक ध्यानाकर्षित करने वाली बात यह है कि काफ़ी समय से विदेश-शिक्षित वर्ग के समर्थन मे बनाया गया तर्क कि उस समय भारत में उच्च शिक्षा के अभिलाषियों के पास विदेश जाकर पढ़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, खोखला जान पड़ता है।

भारतीय संस्कृति में तिलक के विश्वास को हम उनकी शैक्षणिक और बौद्धिक सफलताओं को देखकर भारतीयता और बौद्धिकता के मध्य परस्पर असामन्जस्य का बिजूका भी बुद्धिजीवियों की भारतीय सभ्यता और इतिहास के प्रति प्रतिबद्धता कम करने का प्रयास ही जान पड़ता है। जो तिलक गीता पर टीका लिखते हैं, वैदिक समय के इतिहास पर ऐसे सार्थक दो ग्रंथ लिखते हैं, जिनके वैज्ञानिक विश्लेषण का लोहा मैक्स म्यूलर समेत पश्चिमी अध्येताओं ने माना, वही तिलक ना केवल सफल अधिवक्ता होते हैं, वरन लोकप्रिय गणित के सर्वप्रिय प्राध्यापक भी होते हैं।

जिस प्रकार वैज्ञानिक और वैश्लेषिक विज्ञान को भारतीय संस्कृति से विमुख बताने का प्रयास कुछ बुद्धिजीवी और विदेश-शिक्षित लोग अपने विदेश शिक्षित नेताओं का ख़ाका खींचने में करते रहे हैं, राजनेता तिलक से इतर, बुद्धजीवी तिलक उस प्रयास का जीवंत उत्तर हैं। तिलक का जीवन उन भारतीय युवाओं के लिए आदर्श है जिन्हें यह बताया जाता है कि वैज्ञानिक विधाओं मे समर्थता प्राप्त करने के लिए अपनी सभ्यता, संस्कृति, धर्म और इतिहास पर लज्जित होना अनिवार्य है।

खुद शिक्षा प्राप्त करके, सफल शिक्षक एवं सफल वक़ील बन के 32 शयन कक्ष और दो स्विमिंग पूल वाला आनंद भवन बनाना एक चीज़ है और स्वयं को समाज के बौद्धिक उत्थान के लिए सीढ़ी बना देना दूसरी। तिलक ने दूसरा मार्ग चुना और एक राजनीतिज्ञ होने के अलावा एक शिक्षाविद, लेखक और चिंतक के रूप में सामाजिक जागरण के सूत्र बने।

सीमित समय में सामाजिक पुनर्जागरण के क्षेत्र में तिलक ने ऐसा काम किया कि उन्हें एक व्यक्ति के स्थान पर एक विचारधारा, एक क्रांति, एक आंदोलन कहना अधिक उचित होगा। 1879 में विधि का स्नातक होने के तुरंत बाद लोकमान्य ने अपने मित्र श्री अगरकर के साथ, लोकप्रिय लेखक विष्णु चिपलूनकर या विष्णु शास्त्री के मार्ग दर्शन में ‘पूना न्यू इंग्लिश स्कूल’ की स्थापना 2 जनवरी 1880 को की।

इसके साथ ही मराठा और केसरी अख़बार निकाला गया। 1884 में चार वर्ष के अंदर ‘डेक्कन एजुकेशनल सोसाइटी’ बनी जिसने 1885 में ‘फर्गुसन कॉलेज’ की स्थापना की। इसी कॉलेज से आगे सावरकर स्नातक हुए। तिलक, जो इस के संस्थापक होने के साथ यहाँ संस्कृत और गणित के शिक्षक भी थे, ने 1890 में कॉलेज छोड़ दिया। 1890 में उन्होंने ‘ओरियन: वैदिक इतिहास में शोध; प्रकाशित किया।

1895 में केसरी  में छपे तिलक के एक लेख ने जनता को जागृत कर के शिवाजी की समाधि का पुनरुद्धार कराया और भारत के भविष्य को इतिहास से जोड़ने में तिलक की भूमिका को निर्धारित कर दिया। 1897 में तिलक पहली बार गिरफ्तार हुए। 27 जुलाई को उन्हें गिरफ्तार किया गया, 19 नवंबर को प्रिवी कौंसिल तक अपील की गई जिसका कोई परिणाम नहीं हुआ। प्रोफेसर मैक्स म्युलर और सर विलियम हंटर के हस्तक्षेप के बाद 6 सितंबर 1897 को तिलक की रिहाई हुई।

1900 में शिवाजी की स्मृति में भव्य आयोजन हुआ। 1903 में तिलक की एक और पुस्तक ‘द आर्कटिक होम ऑफ़ वेदाज़’ (वेदों का आर्कटिक आवास) प्रकाशित हुई जिसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर स्वागत प्राप्त हुआ। यह दुःख का विषय है कि आधुनिक भारतीय शिक्षा व्यवस्था में इस तिलक की इन शोधपूर्ण पुस्तकों का कोई स्थान नहीं है।

12 मई और 9 जून 1908 को केसरी  में छपे दो लेखों के आधार पर 24 जून 1908 को तिलक पुनः देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किए गए। इसमें से एक लेख में उन्होंने स्वराज्य के विषय में लिखा था और इस माँग को रूसी क्रांति से जोड़ा था। जिस मुज़फ्फरपुर बमबारी में खुदीराम बोस को फाँसी हुई, उसे आधार लेते हुए तिलक ने आम असंतोष की चर्चा की और स्वराज्य की माँग की थी।

2 जुलाई को जिन्ना ने उनकी ज़मानत के लिए अर्ज़ी डाली, जो न्यायालय ने स्वीकार नहीं की। बॉम्बे में दंगे भड़क गए और पुलिस फायरिंग में 15 लोगों की मृत्यु हुई। तिलक राष्ट्र नायक के रूप में सर्वत्र सम्मानित हुए और लाला लाजपत राय तथा बिपिन चंद्र पाल के साथ कांग्रेस की महामानव तिकड़ी के रूप में उभरे।

1909 से 1914 तक तिलक बर्मा जेल में थे। उनके लौटने तक कांग्रेस का और स्वतंत्रता आंदोलन का स्वरूप बदल चुका था। 1916 में तिलक वापस कांग्रेस लौटे। 1916 में उन्होंने एनी बेसेंट और श्री जी एस खापर्डे के साथ होम रूल लीग की स्थापना की जिसका उद्देश्य स्वराज्य की माँग मुखर होकर करना था।

28 जुलाई 1920 तंद्रा में मृत्यु शय्या पर तिलक को यही दुःख रहा जिसे लोगों ने उनके स्वर में सुना- “1818-1918 परतंत्रता के 100 वर्ष”। 29 जुलाई को उनके मुख से निकला “स्वराज के अभाव में भारत का अस्तित्व ही संभव नहीं है।” एक परतंत्र भारत में देश के महान पुत्र ने 1 अगस्त 1920 को प्राण त्यागे।

उनकी अंतिम यात्रा को कंधा देने वालों में गांधी, शौकत अली, डॉ किचलू जैसे लोग थे। भारत ने एक महामानव तब खोया था। आज हमारा कर्त्तव्य है कि ऐसे महापुरुष की स्मृति पर अवहेलना की धूल न बैठने दें। लोकमान्य वे जन नेता थे जिन्होंने ने परतंत्रता के तिमिर में राष्ट्र गौरव का दीपक जलाया और ग़दर के बाद के एक टूटी रीढ़ वाली राष्ट्रीय चेतना को सांस्कृतिक आत्मविश्वास से पुनः सीधा खड़ा कर दिया।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।