भारती
वामपंथी बौद्धिकों ने मुस्लिमों के मन में उत्पन्न किया हिंदुओं व राज्य के प्रति अविश्वास

आशुचित्र- वामपंथी प्रोपगैंडा का परिणाम कोविड-19 में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों का असहयोग।

उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद में  चिकित्सकों और पुलिसकर्मियों पर पत्थरबाज़ी की गई थी। यह तब हुआ जब वे क्षेत्र में कोविड-19 संक्रमित का भाई होने के नाते एक संदिग्ध कोविड-19 व्यक्ति को क्वारन्टाइन केंद्रे ले जाने के लिए गए थे।

रिपोर्ट के अनुसार, अल्पसंख्यक क्षेत्रों से कुछ लोगों को टेस्टिंग के लिए ले जाकर क्वारन्टाइन केंदों में रखा जाएगा जो डिटेन्शन सेंटर से कम नहीं होंगे, ऐसी अफवाह उड़ने के कारण पत्थरबाज़ी हुई।

इसके अलावा सोमवार को मुंबई के बांद्रा में हुए लॉकडाउन के उल्लंघन ने भी कई प्रश्न खड़े किए हैं। यह घटना 30 मार्च को केरल में हुई घटना से मेल खाती है जब वहाँ कोविड-19 के बड़ी संख्या में मामलों के बावजूद जान-बूझकर लॉकडाउन का उल्लंघन किया गया था।

कोट्टयम जिले में 2,000 से अधिक प्रवासी श्रमिक सड़कों पर उतर आए थे। पुलिस ने पाया कि भीड़ को भड़काया गया था और ये एक सोचा-समझा षड्यंत्र था जिसके तहत प्रवासी श्रमिकों को डराने वाले संदेश भेजे गए थे।

पुलिस को संदेह है कि भय की यह स्थिति एक इस्लामवादी दल, सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने उत्पन्न की थी। यह पॉप्युलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएउफआई) का एक भाग है जिसने सीएए-विरोधी प्रदर्शनों का नेतृत्व किया था।

मल्लपुरम जिले में पुलिस ने एक यूथ कांग्रेस कार्यकर्ता शकीर को प्रवासियों के घर लौटने के लिए ट्रेनों के प्रबंध के मिथ्या समाचार फैलाने के लिए गिरफ्तार किया है। एसीपीआई की ओर संकेत करते हुए केरल मुख्यमंत्री ने समाज-विरोधी तत्वों की निंदा की थी।

राज्य में मार्कसवाद-इस्लामवाद संबंध सौहार्द और हिंसा के चक्रों में चलता है। वर्तमान में हिंसा का दौर चल रहा है। राष्ट्रीय परिदृश्य में वामपंथी और इस्लामी राजनीति में कई समानताएँ हैं। इसने देश की सांप्रदायिक सद्भावना को बहुत क्षति पहुँचाई है।

विनाश की राजनीति

इस संबंध और राष्ट्रीय राजनीति पर इसके प्रभाव को समझने के लिए हमें सर्वप्रथम मुस्लिम राजनीति और इस्लामवादी राजनीति में भेद करना होगा। मुस्लिम राजनीति अल्पसंख्यक समुदाय की राजनीति है। एक लोकतंत्र का आवश्यक और स्वस्थ भाग है अल्पसंख्यक राजनीति।

वहीं, इस्लामवादी राजनीति एकाधिकार और विस्तारीकरण की राजनीति है। इसका उद्देश्य देश की सीमाओं तक सीमित नहीं है। यह भारत के उदारवादी लोकतंत्र का उपयोग करके इसी तंत्र के दमन के अपने उद्देश्य को आगे बढ़ाना चाहती है।

भारत में वामपंथी राजनीति भी इसी दिशा का अनुसरण करती है। किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में पिछड़े लोगों के लिए न्याय आवश्यक और अविच्छेद्य है। एक वामपंथी राजनीति यह दिलाने के उद्देश्य से असीमित लाभ उठाने वालों पर शिकंजा कसती है।

लेकिन यह राजनीति न्याय की इस चेष्टा को एक अधिनायकवादी और लोकतंत्र-विरोधी राज्य के लिए आंदोलन के रूप में केंद्रित कर देती है। इसके अलावा उनका चीन-अनुराग भी चिंता का विषय है।

इस्लामवाद और वामपंथ की यह विनाशकारी राजनीति उन्हें एक-दूसरे का सहयोगी बनाती है।

अयोघ्या से सीएए-विरोध

अगर कभी भारत के सांप्रदायिक दंगों का सच्चा इतिहास लिखा जाएगा तो राजनीतिक बल और बौद्धिक आंदोलन के रूप में मार्क्सवादियों की जिस भूमिका का दावा वामपंथी करते हैं, वह असल में कुछ और होगी।

यहाँ तक कि उन्हें मानवता का अपराधी समझा जाएगा जिनपर अयोध्या आंदोलन के दौरान मुस्लिमों को दिग्भ्रमित करने के लिए आदर्श रूप से मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

पुरातत्वविद डॉ केके मुहम्मद ने खुलासा किया था कि कैसे मुस्लिम अयोध्या में हिंदुओं को भूमि दे देते यदि वामपंथी हस्तक्षेप नहीं करते तो। वामपंथी हस्तक्षेप के कारण जो मामला हिंदू-मुस्लिम को जोड़ता हुआ आंदोलन बन सकता था, वह विवाद का विषय बन गया।

इसके बाद वामपंथी संगठनों ने उच्च स्तरीय प्रोपगैंडा चलाया कि वे सांप्रदायिक सौहार्द बढ़ा रहे हैं जबकिअसल में कट्टरपंथी इस्लामवादी राजनीति को समर्थन कर रहे थे।

यही सीएए-विरोध को मिले वामपंथ के समर्थन में स्पष्ट होता है।

पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में इस्लामवादी राजनीति का शिकार हुए अत्याचार पीड़ित धार्मिक अल्पसंख्यक वृदह भारतीय भूभाग का हिस्सा हैं। भारत का ऐतिहासिक व मानवीय, दोनों ही दृष्टि से बौद्धों, सिखों, जैनों और हिंदुओं के प्रति दायित्व है।

अफगानिस्तान में आईएसआईएस से डरे सिख कहाँ जाएँगे? पाकिस्तान? बांग्लादेश? ईरान?

भारत का एक आम मुसलमान न अमानवीय है और न ही इस बात को नकारने के लिए इतिहास के प्रति उदासीन।

अयोध्या की तरह ही पुनः यहाँ वामपंथी इस्लामवादियों के सहयोगी के रूप में दिखे जो भारतीय मुसलमानों को दिग्भ्रमित करके उन्हें मौलिक मानवाधिकारों के लिए भारत आ रहे शरणार्थियों का विरोधी बना रहे हैं।

इसी प्रकार वामपंथियों ने गलत प्रोपगैंडा फैलाया था कि बाबरी मस्जिद किसी हिंदू मंदिर के अवशेषों पर नहीं खड़ी है। अब वे गलत प्रोपगैंडा फैला रहे हैं कि सीएए भारतीय मुस्लिमों के विरुद्ध भेदभाव करता है और उनकी नागरिकता को इससे खतरा है।

परिणामस्वरूप मोदी-विरोधी हवा बनी। अब यह हवा एक आपदा के समय विनाशकारी व्यवहार का रूप ले रही है।

आवश्यकता है कि समुदाय से जागृत नेतृत्व आगे आए। वे समुदाय के लिए आवश्यक स्वस्थ मुस्लिम राजनीति और विनाशकारी इस्लामवादी राजनीति में भेद स्पष्ट करके दिखाएँ।

अयोध्य में स्वेच्छा से मुस्लिम भूमि देने के लिए तैयार थे लेकिन वामपंथी बैद्धिकों के प्रोपगैंडा ने उन्हें ऐसा करने से रोका।

मुस्लिम सीएए के समर्थन के लिए तैयार होकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों का स्वागत भी करते लेकिन उनमें भय उत्पन्न करके उन्हें बहकाया गया।

मुस्लिम स्वास्थ्य कर्मियों का सहयोग करने के लिए भी तैयार हो जाते लेकिन उनके सामने इन कर्मियों को एक खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।

यह अकस्मात नहीं हुआ है। यह दशकों से वामपंथी बौद्धिकों द्वारा चलाए गए विनाशकारी उद्देश्य का परिणाम है।

अरविंदन स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।