भारती
वामपंथ विश्व भर में अपनी प्रासंगिकता क्यों खोता जा रहा है

प्रसंग- न्यू न्यू लेफ्ट के उदय के साथ वामपंथ में कुछ मौलिक त्रुटियाँ आ गई हैं।

पिछले दशक दक्षिणपंथी पार्टियों और राजनेताओं का उदय विभिन्न महाद्वीपों में देखा गया। नरेंद्र मोदी और डोनाल्ड ट्रंप का चुना जाना, ब्रेक्ज़िट वोट, यूनाइटेड किंगडम में कंज़रवेटिव्स की जीत, इज़रायल में नेतन्याहू की दो चुनावों में लगातार जीत, रूस में व्लादिमिर पुतिन की पकड़ का मजबूत होना तथा जापान में आठ वर्षों से अधिक शिन्ज़ो अबे का सबसे लंबी अवधि तक प्रधानमंत्री बने रहना कुछ उदाहरण हैं।

छोटे-छोटे देशों में भी ऐसे ही कुछ नेताओं का उदय देखने को मिला है जो पूरे विश्व में वामपंथ की घटती लोकप्रियता को दर्शाता है। पश्चिम में यह और सत्य है, विशेषकर ईसाई दुनिया में। पिछले तीन दशकों के अभूतपूर्व प्रवासन (अधिक गैर-ईसाइयों का वहाँ बसना), वैश्वीकरण का प्रसार (जो गैर-ईसाई देशों तक पैसा ले जाता है) और तकनीक का लोकतांत्रीकरण (जो गैर-ईसाइयों को दूर रहते हुए भी उनकी जड़ों से जोड़े रखता है) देखा गया है।

पश्चिमी समाज जिनकी जनसंख्या घटती जा रही है, वे 21वीं सदी की इन नई चुनौतियों से भयभीत हैं। वे अपने ही देश में (कम से कम देश के कुछ भागों में) स्वयं को भविष्य में धार्मिक अल्पसंख्यक बनता देख रहे हैं। इसलिए वैश्विकरण और वैश्विक शक्तियों का विरोध हो रहा है। यह जनसांख्यिकी की बात है, अर्थव्यवस्था की नहीं।

इसलिए वामपंथ जौ वैश्विक(वादी) बनता जा रहा है, अपनी प्रासंगिकता खो रहा है और राष्ट्रवादियों से लगातार हार रहा है। परंतु यह एकमात्र कारण नहीं है। न्यू न्यू लेफ्ट (न्यू लेफ्ट वह है जो 1960 के दशक में प्रगतिशील माना जाता था) के उदय के साथ वामपंथ में कुछ मौलिक त्रुटियाँ आ गई हैं।

जो विचारधारा स्वयं को कभी अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य, महिला अधिकार और सेक्युलरवाद की योद्धा, बौद्धिकों का समर्थन, विविधता को मनाती और लोकतंत्र की वकालत करती थी, वह अब प्रगतिशील एजेंडा को भस्म करने पर तुली हुई है।

वामपंथ एक ही बात में अब उत्कृष्ट दिखता है- पाखंड। इसके वैश्विक होने का अर्थ है कि स्थानीय प्रकृति के प्रति मुखर दक्षिणपंथ को अब एक ही संरचना, एक ही संस्कृति से लड़ना होगा। वामपंथ व्यक्तियों के लिए सुरक्षित स्थान चाहता है, वहीं लिंग-तटस्थ शौचालयों की माँग करते है जो सबसे निजी स्थान को महिलाओं के लिए असुरक्षित बना देगा।

निरंकुश अप्रवासन (अवैध समेत) का वामपंथ समर्थन करता है जो न सिर्फ व्यक्तियों बल्कि पूरे समाज के सुरक्षित स्थानों के लिए खतरा है। क्या सुरक्षित स्थानों की वकालत करने वाले वामपंथी मुस्लिम-बहुल कश्मीर में हिंदुओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ का समर्थन करेंगे? आप स्वयं समझदार हैं।

स्वयं के लिए वामपंथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात करता है लेकिन इससे असहमत होने वालों को ‘निरस्त’ करने की राजनीति का भी समर्थन करता है। वामपंथ दक्षिणपंथी की असहिष्णुता को दोष देता है परंतु स्वयं से थोड़ा भी मतभेद रखने वालों के प्रति उत्साही असहिष्णुता अपनाता है और उनपर शारीरिक हमला करने में भी संकोच नहीं करता।

वामपंथ नहीं चाहता कि लोग अपने घरों में बंदूकें रखें क्योंकि इसका मानना है कि हिंसा पर पुलिस का एकाधिकार हो लेकिन वह इसी पुलिस को कोष से वंचित रखना चाहता है। लोकतंत्र और लोगों की इच्छा को लेकर वामपंथ उन्मादी है लेकिन उसी सरकार से घृणा करता है जिसे लोगों को बहुमत से चुना गया है।

इन्हीं बहुसंख्यकों की सिनेमा से लेकर खान-पान की आदत में पसंद, से लेकर विश्वासों तक से वामपंथ घृणा करता है। वामपंथ महिला अधिकारों का समर्थन करता है लेकिन साथ ही एक पुरुष भी यदि स्वयं को महिला कहकर उनके शौचालयों में घुसना चाहे, उनसे खेल में प्रतिस्पर्धा करना चाहे और क्या कुछ नहीं, तो उसका भी समर्थन करता है।

जो वामपंथ दावा करता है कि दशकों तक इसने महिला की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए कार्य किया है, वह अब इन्ही विजयों की नींव को धूमिल करने पर तुला है यह कहकर कि बेहतर लिंग के प्रति लिंग-भेद हो रहा है। यही वामपंथ ‘सांस्कृतिक परंपरा’ और ‘धार्मिक संवेदना’ मानकर बुरक़ा का समर्थन करता है लेकिन पवित्र गाय की बात आते ही यह धार्मिक संवेदना हवा हो जाती है।

मुस्लिमों के बुरक़ा के प्रति जो स्वीकार्यता है, वह अचानक गाय और गौमूत्र की बात आते ही हिंदुओं के उपहास और अपशब्द का स्थान ले लेती है। वामपंथ दमन के चिह्नों को मिटाना चाहता है जैसे पश्चिमी दुनिया से नस्लभेदियों की मूर्ति।

जो चिह्न पूर्वजों की गुलामी के सूचक हैं, वामपंथियों को वे अस्वीकार हैं लेकिन यही वामपंथी उनके विरोध में खड़े हो जाते हैं जो भारत के सहस्रों मंदिरों को तोड़कर बनाई गई संरचनाओं के विध्वंस की बात करते हैं।

पश्चिम में नस्लभेदियों के नाम पर बने सार्वजनिक स्थानों में तोड़फोड़ करके वामपंथियों को आनंद मिलता है लेकिन वे उन भारतीयों का उपहास करते हैं जो शहरों, स्थानों या सड़कों के नाम से नरसंहार करने वाले इस्लामी शासकों का नाम हटाना चाहते हैं।

भारत और अन्य लोकतंत्रों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए वामपंथ विशेष व्यवहार (उन्हें अधिक लाभ देने के पक्ष समेत) के पक्ष में है लेकिन इस्लामिक गणराज्यों (और तानाशाही चीन) में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों पर मूक है। हिंदू-बहुल भारत में वामपंथ अल्पसंख्यक अधिकारों की बात करता है लेकिन मुस्लिम या ईसाई-बहुल देशों में अल्पसंख्यक हिंदुओं के अधिकारों को लेकर चुप है।

वामपंथ सेक्युलरिज़्म में मानता है यानी कानून से धर्म अलग रहे लेकिन जामिया मिलिया इस्लामिया, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी या सेंट स्टीफन्स कॉलेज जैसे सांप्रदायिक शैक्षिक संस्थानों, जहाँ धर्म के आधार पर सीटें आरक्षित हैं, के करदाताओं के पैसे से वित्तपोषित होने में इसे विडंबना नहीं दिखती है।

जिन संस्थानों में यह स्वयं अल्पसंख्या में है, वहाँ बहुसंख्यावाद का वामपंथ भरपूर विरोध करता है लेकिन अपने वैचारिक गढ़ों जैसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, जादवपुर यूनिवर्सिटी, आदि में अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए किसी भी हद तक जाने में इसे कोई पछतावा नहीं है।

सांस्कृतिक समायोजन (अप्रोप्रिएशन) का वामपंथ विरोध करता है लेकिन अनुसूचित जातियों, मुस्लिमों, जनजातियों और अन्य समुदायों के अभियोगों को समायजित करने में संकोच नहीं करता है। इसका समायोजन इतना विषैला है कि यदि कोई मुस्लिम या दलित या किसी और समुदाय का व्यक्ति वामपंथ के विरुद्ध जाए तो उसे शीघ्र ही अस्वीकृत कर ‘अंकल टॉम’ का दर्जा दे दिया जाता है।

निस्संदेह ही वामपंथ भेद्य जातीयताओं और नस्लों का (वास्तविक सदस्यों को बाहर करके स्वयं बाहरी होने के बावजूद नेतृत्व करके) समायोजन करता है जो सांस्कृतिक समायोजन से अधिक खतरनाक है।

वामपंथ स्वयं को अकादमिक उत्कृष्टता और बौद्धिकों का उपकार करने वाला दर्शाता है लेकिन यही वामपंथ विश्वविद्यालय के प्रशासन को फिरौती पर रखता है, महीनों तक अध्ययन बाधित करता है और जिनके लिए लड़ने का दावा करता है, उन्हीं निर्धन एवं पिछड़े परिवार से आने वाले छात्रों को नुकासन पहुँचाता है।

एससी/एसटी/ओबीसी के लिए आरक्षण को वामपंथ तथाकथित उच्च जातियों का पश्चाताप बताता है जिन्होंने कई पीढ़ियों तक नीची जातियों के साथ भेदभाव किया। लेकिन यही वामपंथ मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा दमन की बात स्वीकार नहीं करता है, उसकी भरपाई तो दूर की बात।

जब भी कोई ऐसी माँग उठती है तो वामपंथ कहता है, “आज के मुस्लिमों को उनके पूर्वजों के कृत्यों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।” यह दंड के वल उच्च जाति वालों के लिए आरक्षित है।

वामपंथ को बहुत चुभता है जब उसे राष्ट्र-विरोधी, अर्बन (शहरी) नक्सल, प्रेस्टीट्यूट (प्रेस वेश्या), आदि कहा जाता है लेकिन हिटलर, संघी, भक्त, गोदी मीडिया, आदि घृणास्पद उपमाएँ किसी को देने के लिए उनकी पहली पसंद होती है।

सिर्फ उपमाओं तक ही वामपंथ नहीं रुकता बल्कि इसके कथानक (नैरेटिव) के विरुद्ध जाने वालों की नौकरी के पीछे भी पड़ जाता है। यह वास्तविक नुकसान पहुँचाने में विश्वास रखता है। सिर्फ व्यवसाय ही नहीं, कई अपना जीवन भी खो देते हैं- वामपंथियों के विरुद्ध जाने वाले कई इस्लामी गणराज्यों में आजीवन कारावास भोग रहे हैं।

वामपंथ दूसरों को फासीवादी कहना पसंद करता है लेकिन फासीवाद का जनक यही है जो मानता है कि मतभेद का विकल्प नहीं है और ‘एक सत्य’ के प्रति ‘पूर्ण समर्पण’ होना चाहिए। तुम मुझसे 10 में से नौ बातों पर सहमत नहीं हो सकते, तुम्हें सभी 10 बातों पर सहमत होना होगा नहीं तो तुम हमारे सहयोगी नहीं शत्रु होजिसे उखाड़ फेंकना है।

वामपंथ में लिंग, नस्ल, वर्ग और जाति की विविधताएँ हैं लेकिन विचार की विविधता स्वीकार नहीं है। यह नियम-विरुद्ध है। ये सारे विरोधाभास इसलिए उत्पन्न नहीं हुए हैं क्योंकि सत्ता में वे अलग रुख अपनाते हैं और विपक्ष में अलग।

न ही यह केवल पाखंड है। यह ‘उसका क्या’ (वॉट-अबाउटिज़्म) की बात भी नहीं है। वामपंथ में कोई मौलिक त्रुटि है। और जब तक वह इसे सुधार नहीं पाता, लामपंथ अपनी प्रासंगिकता खोता रहेगा।

अरिहंत स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं। वे @haryannvi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।