भारती
बुरा कर्म करने से पहले लगने वाला भय अमूल्य है, इसे संभालकर रखें- कुरल भाग 6

प्रसंग- सी राजगोपालाचारी द्वारा भावार्थ किए हुए कुरल की शृंखला के इस भाग में पढ़ें कि हमें बुरा करने से क्यों बचना चाहिए।

अंतःकरण

तीविनैयच्चं  बुरा करने के विचार से होने वाली घबराहट के लिए तमिल शब्द है।

कुछ बुरा करने का विचार ही अच्छे मनुष्य को भयभीत कर देता है। हालाँकि बुरे मनुष्यों को बुरा करने में कुछ भयानक नहीं लगता है।

बुरे मनुष्य नैसर्गिक भय और संकोच से ऊपर उठ चुके हैं और ऐसा करने के लिए अभ्यस्त हो गए हैं। पहली बार दोष के भय का अनुभव होना अमूल्य होता है और इसे कम नहीं होने देना चाहिए।

बुराई से एक नई बुराई उपजती है जो आग की तरह स्वयं को पुनर्जीवित करती है। मनुष्य को बुराई से उसी प्रकार संकुचित होना चाहिए जैसे आग के भय से आतंकित होते हैं।

आग की अजीब बात यह है कि जिसका उपभोग करके यह उपजती है उसी से लगातार जलती रहती है। जो आग लगने से नष्ट हो गया है वह फिर से आग लगाने के लिए एक वस्तु की तरह काम करता है। बुराई में आग की यही विशेषता है और वह भी अधिक भयानक स्वरूप में। इसलिए शुरू में ही इससे बचकर रहें, अन्यथा बाद में इससे बचना असंभव हो जाएगा।

बुरे के प्रतिकार में बुरा न करना सारी कलाओं में सबसे उच्च और अमूल्य है।

उच्चतर ज्ञान का उच्चतम स्वरूप सहनशीलता को माना गया है। इससे बुराई की शृंखला रुक सकती है और इसे नियंत्रित किया जा सकता है। आप दूसरे को नहीं रोक सकते लेकिन आप खुद को रोक सकते हैं इस बुराई की बढ़ती शृंखला में सम्मिलित होने से।

असावधानी में भी दूसरे को हानि पहुँचाने के कृत्य का विचार न आने दें। यदि आप किसी का भी बुरा करने का विचार करते हैं तो धर्म आपका ही नाश करेगा।

आप दूसरे शत्रुओं से बच सकते हैं लेकिन आपके बुरे कर्म जो आपका पीछा करते रहेंगे उनसे नहीं।

दोष एक दुष्ट मनुष्य का पीछा उसी तरह करते हैं जैसे काया के साथ हर जगह परछाई जाती है। जो बुरे कर्म करते हैं उन्हें इसका फल भी भुगतना होगा।

क्या आप खुद से प्रेम करते हैं? यदि हाँ तो ऐसा कुछ न करें जो गलत कर्म की श्रेणी में आता है, भले ही वह कितना ही छोटा हो।

एक कठोर विधान उन्हें हानि पहुँचाएगा जो दूसरों से दुर्व्यवहार करते हैं।